भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 68, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंधर्मजहाजवर्णन । ३५
जैसे इक दृष्टान्त सुनाऊं । कथा पुरानी कहि समुझाऊं ॥
महापुरुष इक स्वामी पूरा । ज्ञान ध्यान में था भरपूरा ॥
लक्षण सभी हुते वा माहीं । आठपहर हरिहीको ध्याहीं ॥
उनको शिष्य आन इक भयो । वहि उपदेश जु नीको दयो ॥
करिकै प्यार निकट जो राखो । प्रीतिकरी अरुसबकछुभाखो ॥
फिरि रामतकी आज्ञा लीन्ही । उनहूँ करि किरपातवदीन्ही ॥
पहुँचा एक नगर अस्थाना । ह्वांके नरन सिद्ध बड़जाना ॥
ठहराया अरु पूजा कीन्ही । बहुत नरन ने कण्ठीलीन्ही ॥
बहुतक प्राणी आवें जावें । संध्या भोर शीश बहु नावें ॥
महिमा देखि फूल¹ मनमाहीं । कहाकि हमसमगुरुभी नाहीं ॥
दो० गद्दी पर बैठा रहै, तकिया बड़े लगाय।
बहुत रहैं आज्ञा विषे, शिरपर चँवर दुराय ॥
गुरु परताप नहीं वह जानै । अपनीही बुधि बड़ी जुठानै ॥
मूरख आगे क्यों नहिं भया । दीन होय करि द्वारेगया ॥
थोड़ेहीसे बहु इतराना । गुरुकी कृपा प्यार ना जाना ॥
बार वार शोचै मन मोई । हमरो गुरु क्या ऐसो होई ॥
उनको तो नर कोइ कोइ जाने । हमको सिगरो देश वखानै ॥
दिन दिन बढ़ता दीखै आगे । मेरे भाग बड़ेही जागे ॥
मेरे मनमें ऐसी आवै । उनका शिष्य जु कौन कहावै ॥
वहीँ अचानक गुरु ह्वां आया । बैठेही शिर शिष्य नवाया ॥
दो० जैसे आते वैष्णव, करता वह दंडौत।
ऐसेही गुरु से किया, आदर किया न वहोत ॥
देखि गुरू मन हांसी ठानी । वाको जाना बहु अभिमानी ॥
मुखसोंकहि करि बहुझिड़कारा । कहा कि तू अभिमानी भारा ॥
१ आनन्द ॥