भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मजहाजवर्णन । ३३
दूजे निन्दा नाहीं करिये। पर के औगुण चित्त न धरिये ॥
निन्दाका भारी है पाप। यासों भी निष्फल है जाप ॥
तीजे कड़ुआ वचन न भाखै। सबजीवन सों हितही राखै ॥
खोटा वचन महा दुखदाई। जो साधै सो अतिबलदाई ॥
खोटा वचन तपस्या खोवै। नरक माहिं लै जाय समोवै ॥
मीठे वचन बोलि सुखदीजै। उनके मनका शोक हरीजै ॥
कहि शुकदेवा चौथा सुनिये। चरणदास लै मनमें गुनिये ॥
दो० चौथे मौन गहे रहे, लक्षण अधिक अमोल।
कर्म लगै जग वात सों, हरि चरचा में खोल ॥
तन सों तीनि कर्म जो लागे। जो मैं कहूं तुम्हारे आगे ॥
चोरी जारी अरु हिंसा है। इन पापन सों भारी भय है ॥
कर्म छुटै जाकी विधि गाऊं। भिन्न भिन्न तोको समझाऊं ॥
तन सों चोरी कबहुँ न कीजै। काहूकी नहिं वस्तु हरीजै ॥
चोरी त्यागै सो सतवादी। तापर रीझैं राम अनादी ॥
जारीके क्रम ऐसे भानों। परतिरिया को माता जानों ॥
तीजी हिंसा त्यागहि कीजै। दया राखि जीवन सुख दीजै ॥
दया बराबर तप नहिं कोई। आतम पूजा तासों होई ॥
कर्म छुटन का भारी गैला। ज्यों साबुन उजला पट मैला ॥
शुकदेवा कहै तन के कहे। तीनि करम अब मनके रहे ॥
दो० कहौं जु मनके तीनि अब, झीनी जिनकी बात।
गुरू दिखाये दीखई, विधि औरी न दिखात ॥
खोटी चितवन वैरही, अरु तीजा अभिमान।
इन सों कर्म लगैं घने, मेटैं संत सुजान ॥
खोटी चितवनि खोलि दिखाऊं। जासों कहिये सो समझाऊं ॥
कवहूं चितवै परनारी को। कवहूं चितवै फलवारी को ॥