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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

धर्मजहाजवर्णन । ३५
जैसे इक दृष्टान्त सुनाऊं । कथा पुरानी कहि समझाऊं ॥
महापुरुष इक स्वामी पूरा। ज्ञान ध्यान में था भरपूरा ॥
लक्षण सभी हुते वा माहीं। आठपहर हरिहीको ध्याहीं ॥
उनको शिष्य आन इक भयो । वहि उपदेश जु नीको दयो ॥
करिकै प्यार निकट जो राखो। प्रीतकरी अरुसबकछुभाखो ॥
फिरि रामतकी आज्ञा लीन्ही । उनहूँ करि किरपातवदीन्ही ॥
पहुँचा एक नगर अस्थाना। ह्वाँके नरन सिद्ध बड़जाना ॥
ठहराया अरु पूजा कीन्ही । बहुत नरन ने कण्ठीलीन्ही ॥
बहुतक प्राणी आवैं जावैं । संध्या भोर शीश बहु नावैं ॥
महिमा देखि फूल१ मनमाहीं । कहाकि हमसमगुरुभी नाहीं ॥
दो० गद्दी पर बैठा रहै, तकिया बड़े लगाय ।
बहुत रहैं आज्ञा बिषे, शिरपर चँवर दुराय ॥
गुरु परताप नहीं वह जानै । अपनीही बुधि बड़ी जुठानै ॥
मूरख आगे क्यों नहिं भया । दीन होय करि द्वारेगया ॥
थोड़ेहीसे बहु इतराना । गुरुकी कृपा प्यार ना जाना ॥
बार वार शोचै मन सोई । हमरो गुरु क्या ऐसो होई ॥
उनको तौ नर कोइ कोइ जानै । हमको सिगरो देश बखानै ॥
दिन दिन बढ़ता दीखै आगे । मेरे भाग बड़ेही जागे ॥
मेरे मनमें ऐसी आवै । उनका शिष्य जु कौन कहावै ॥
वहीं अचानक गुरु ह्वां आया । बैठेही शिर शिष्य नवाया ॥
दो० जैसे आते वैष्णव, करता वह दंडौत ।
ऐसेही गुरु से किया, आदर किया न वहोत ॥
देखि गुरू मन हांसी ठानी । वाको जाना बहु अभिमानी ॥
मुखसोंकहीकरि बहुझिड़कारा । कहा कि तू अभिमानी भारा ॥
१ आनन्द ॥