भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
फुटकरपद । ५५७
ब्रह्मरूप अनूप मुनिवर पराशर कुलभूषणं ।
श्रीकृष्णचरित पुनीत वर्णत शुकमुनिचरण प्रणम्यहं ॥ ५ ॥
त्रिभुवन उजागर कृपासागर द्वंद्व संकट मोचनं ।
प्रेममद मातेरहें नित शुकमुनिचरण प्रणम्यहं ॥ ६ ॥
निरालंब निहभर्म निसिदिन स्थिर बुद्धि निकेतनं ।
धर्मधारी ब्रह्मचारी शुकमुनिचरण प्रणम्यहं ॥ ७ ॥
पतित पावन भर्म नसावन शरणागत सुखदायकं ।
मायाजीतं गुणातीतं शुकमुनिचरण प्रणाम्यहं ॥ ८ ॥
श्रीशुकदेव अष्टक परमसुंदर पठत पाप नशायकं ।
चरणदास शुकदेव स्वामी भक्ति मुक्ति फलदायकं ॥ ९ ॥
५५८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ओम् ॥
श्रीशुकदेव जी सहाय ॥
अथ श्री महाराज साहिब श्री स्वामिचरणदास
जी कृत नासकेत लीला प्रारम्भते ॥
दोहा ॥
जै जै श्रीमुनि व्यासजी, जै जै गुरु शुकदेव ।
तुम किरपा सूं कहत हूं, नासकेत को भेव ॥ १ ॥
आय बैठ हिरदै बिषै, मो मुख कहो बखान ।
तुमतो जानत हो सबे, मैं हूं मूढ़ अजान ॥ २ ॥
चरणदास हो कहत हूं, भाषा परम पुनीत ।
सुन सुन आवै नीत पर, छूटै सकल अनोत ॥ ३ ॥
नर नारी सुन लीजिए, अद्भुत कथा सुजान ।
पाप पुण्य की ओर सूं, जो कोइ होय अजान ॥ ४ ॥
त्रेतायुग की यह कथा, संस्कृत के माहिं ।
नासकेत ही नांव है, मैं भाषूं ले छाहिं ॥ ५ ॥
नीमपारहो के बिषे, कथा कही जो सूत ।
सौनक आदि रिषी सबै, सुन
नासकेतलीलावर्णन । ५५६
सोरठा ॥
ब्राह्मण ऋषों समेत, बैशंपायन पासही ।
गया जु करि बहु हेत, कछु पूछन की आसधरि ॥१०॥
पांडव वंश मझार, उपजा हुवा जु भूप यह ।
बोला वचन सँभार, बैशंपायन साथही ॥११॥
जनमेजय उवाच ॥
चौपाई ॥
करि डंडौत बचन यों भाषा । अरुचरनन परि मस्तक राखा ॥
सीस उठा मुख तका सुभागे । फिर यों अस्तुति करने लागे ॥
हे बुधवान बड़े तुम चतुर । भक्ति तपस्या में अति आतुर ॥
सर्व शास्त्र तुम नीके जानों । धरम दया नीके पहिचानों ॥
व्यासदेव के शिष बहु प्यारे । जोगी महा जगत सूं न्यारे ॥
दिव्य कथा पूछत हूं तोही । पाप संपूरन काटन सोई ॥
किरपा करि संदेह मिटावो । भिन्न भिन्न करि सभी सुनावो ॥
जनमेजय यों पूछन कीना । रणजीत कहैं ऋषि उत्तरदीना १२
वैशंपायन उवाच ॥
दोहा ॥
सुन राजा अद्भुत कथा, कहूं तुम्हारे हेत ।
इस में संशय है नहीं, सर्व पाप हरि लेत ॥१३॥
राजा कथा पुरान की, शुभ है सुनने जोग ।
और ऋषीश्वर भी सुनों, तन मन नासैं रोग ॥१४॥
चौपाई ॥
एक ऋषि जो पहिले भया । धर्मनीक उज्ज्वल मन छया ॥
उद्दालक जिंह नाम बखानों । तपसी ब्रह्मा का सुत जानों ॥
वेद अर्थ का जाननवारा । इंद्रीजित जोगेश्वर भारा ॥
५६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हिरदा शुद्ध ब्रह्म बुध जाकी । तेजवंत सुंदर छबि ताकी ॥
जाका आश्रम सुन्दर नीका । ऋषि मुनि करकर शोभतटीका ॥
भांति अनेक वृक्ष जहा सोहैं । फूलन भरे अधिक मनमोहें ॥
हरि हरी बेल रही लिपटाई । बोलत भँवर महा सुखदाई ॥
हंस आदि पक्षी बहु सोहत । मोर चकोर कोकिला मोहत १५
दोहा ॥
अरु पक्षी ह्यां बसत हैं, शुभ शुभ भांति अनेक ।
शोभा सब बरनूं कहा, अधिक एक तें एक ॥१६॥
चौपाई ॥
उड़ि बैठे पक्षी जहां तरवर । कँवल भरे सोहैं तहां सरवर ॥
आश्रम सुखदाई बरनां सो । उद्दालक उस ठौर रहें सो ॥
तेजवंत सूरज ज्यों राजैं । जिनके दरशन पातक भाजैं ॥
तपकी शोभा दस दिस छाई । देवलोक में भई बड़ाई ॥
अठासी बरस सहस तप कीनों । लोक वेद में नां चितदीनों ॥
एक पांव सूं ठाड़े रहै। जाड़ा गर्मी पावस सहैं ॥
अधिक तपस्या गाढ़ी कीन्हीं । जाकूं सुरपति सुन अरुचीन्हीं ॥
ईन्द्र भूप डरा मन माहीं । तन में धीरज रहा जु नाहीं १७
दोहा ॥
सकल विकल बहुतै भई, धीरज रहा जु नाहिं ।
कांप कांप बेगी गया, ब्रह्मलोक के माहिं ॥१८॥
चौपाई ॥
जां ब्रह्मा का दरशन लीना । साष्टाङ्ग परनाम जु कीना ॥
फिर बिरंचि आदर बहु कीया । अरघ और आसन जोदीया ॥
भय करि दुखी इंद्र हो रहा । ब्रह्मा आगे अस्थिर भया ॥
नैन उदास दीन मुख कीयें । बिरंच और को तनमनदीयें ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६१
ब्रह्मोवाच ॥
हे इन्दर तू कैसे आया। दुखी दीन मुख क्यों जु बनाया ॥
भय उपजा कासों तोहि भारी । आसन क्यों कांपा बलकारी ॥
इन्द्रउवाच ॥
इन्दर कहै सुनों विधि करता । तुमही या जग के हो भरता ॥
वही कहूं जासूं भय खाया । तुम्हरे चरन निकट ज्यों आया ॥१९॥
दोहा ॥
मुनि उदालक पुतरतो, तिरलोकी विख्यात ।
तप जु करै भू लोक में, एक पांव दिन रात ॥२०॥
तप करतें बहुचिर भया, तातें हिया डरात ।
आसन कांपत है घनों, धीरज नाहिं धरात ॥ २१ ॥
यातें कहो उपावही, कित जाऊं मैं भाज ।
अमरावती नगरी सहित, सोंपा ह्यां का राज ॥ २२ ॥
अरु सोंपूं तिरलोक हू, कहां रहूं मैं जाय ।
कहा करूं रिषि तेज सूं, भय व्यापो अधिकाय ॥ २३ ॥
सूतउवाच ॥
[L
५६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
ब्रह्मा ही के बचन सुनि, खुसी होय सुख पाय ।
गया जु इन्दर लोक में, आनन्द अधिक बढ़ाय ॥२८॥
चौपाई ॥
अब सुन ब्रह्मा जू की दाया । पिप्पलादिको निकट बुलाया ॥
सभी भांत कर वह समझाया । उद्दालक के पास पठाया ॥
तप निरबर्त करन के काजे । पिप्पलादि मुनि आय बिराजे ॥
उद्दालक उठि आदर कीना । बड़े भाव सूं आसन दीना ॥
चरन धोय कर पूजा कीन्ही । नमस्कार कियो कर आधीनी ॥
और कही तुम ह्यां पग धारे । कौन हेत कहिये मुनि प्यारे ॥
पिप्पलादकउवाच ॥
पिप्पलाद कही सुन रिषिराये । सहजें हम दरशन कूं आए ॥
बड़ी तपस्या का धन तेरे । पै संदेह उठा इक मेरे ॥ २६ ॥
दोहा ॥
नारी सुधारी रिषि सबै, तप करें अधिक अत्यन्त ।
तप धनही के जोर सूं, रहें जु सदा अचिन्त ॥३०॥
चौपाई ॥
सबके आश्रम में सुतनारी । सुन्दर भवन महा सुख भारी ॥
तुम्हरे तिरिया ना संताना । यह हम अचरज बहुतक माना ॥
पुत्र बिना कुल बंस न चालै । सोत बिना सूखै ज्यों तालै ॥
बंश नष्ट सूं आगै नाहीं । पित्र देवता रीते जांहीं ॥
होहिं न परसन नीकै जानौ । तातें उपजावन सुत ठानौ ॥
जीवत मरतैं काज संवारै । भला पुत्र हो दो कुल तारै ॥
दीपक सूं दीपक ज्यों लागे । ऐसे वंश चलै यौं आगे ॥
जो कोई पुत्र बिनाहै हीना । वाका जगत सुन्न अरु छीना ॥
दोहा ॥
वाकूं घरसूं काम क्या, खोवन वंश अऊत ।
नासकेतलीलावर्णन । ५६३
मूयें किरिया को करै, अगत जाय हो भूत ॥ ३२ ॥
चौपाई ॥
वेद माहिं ऐसे लिख राखा । ब्रह्माजूने परगट भाखा ॥
याकूं समझ जतन अब कीजे । उपजावन पुत्तर मन लीजे ॥
ब्राह्मण श्रेष्ठ तोहि मैं जानौं । मेरे बचन सांच करि मानौं ॥
उद्दालकउवाच ॥
मुनि उद्दालक ऐसे कहिया । ब्यासी सहसबरस तप रहिया ॥
रहूं अस्थिर मन में नहिं आवे। तिरिया पुत्तर को उपजावे ॥
हे पिप्पलादिक चितना धरूं । तिरिया का संग कैसे करूं ॥
नेम बर्तकों कैसे हारूं । भवसागर में मन क्यों डारूं ॥
नरकमाहि वेही नर जावें । टेक बर्त कूं जो विसरावें ॥ ३३ ॥
दोहा ॥
जिन छोड़ा है नेम कों, खोया तप का मूल ।
छोड़ छोड़ फिर जग लिया, ताके मूंहडे धूल ॥ ३४ ॥
चौपाई ॥
लिखा वेद में नरकों जैहै । दुनिया तज दुनिया फिर लैहै ॥
कई भांत के दुख उठि लागैं। आवत हैं वाही कै आगैं ॥
हो अतीत फिर घर में आवैं । तीन लोक में भरमत धावैं ॥
मुकति ठिकाना वाकूं नाहीं । जाय परै चौरासी माहीं ॥
नारी सुत कछु काम न आवैं । अंत समय ह्यांई रह जावैं ॥
कोई किसी का संगी नाहीं । मारगमें मिल मिल उठजाई ॥
तातें जग कूं मिथ्या देखा । सुत नारी का झूठा लेखा ॥
यातें करूं न मन में आवे । धोखे में अब को भरमावे ॥ ३५ ॥
दोहा ॥
मैंने तप धारन किया, कैसे छांडूं ताहि ।
५६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हांसी होवे जगत मैं, अपकीरति हो जाहि ॥ ३६॥
पिप्पलादकउवाच ॥
चौपाई ॥
फिर पिप्पलाद जु बोला ऐसैं। आप स्वारथी भाषै जैसैं ॥
हे उदालक यह सुन लीजे। जुक्ति अजुक्ति बिचारही कीजे ॥
जो कोइ संतति सूं है हीना। वाका धर्म सदा है छीना ॥
अरु जिनकी तपसूं रुचि नासी । सो वे भिष्टल नरक निवासी ॥
हम तेरा तप नाहिं छुटावैं। बलकी उलटा धर्म बढ़ावैं ॥
सुत उपजावन ही के हेता। नारी संग करै जो जेता ॥
इन्द्री स्वाद सदा नहिं धावै । रितु के समय दान दे आवै ॥
वाकूं पाप दोष नहिं लागै । ब्रह्माबचन जु भाष आगै ॥ ३७॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
ऐसे कहि पिप्पलाद मुनि, गए ब्रह्मा के पास ।
सभी सुनाई जो हुती, वाकी सभै सुबास ॥ ३८ ॥
ब्रह्मा की अज्ञा लई, और किया परनाम ।
रिषी गए अस्थान कूं, पूरन करि के काम ॥ ३९ ॥
हे राजा ऐसे भई, उदालक तप माहिं ।
विघ्न हुवो चिंता लगी, हिरदै तिरिया छाहिं॥ ४० ॥
दुखी रहै सोचत रहै, नित यों करै विचार ।
को कन्या कितसो लहूं, अरु जाऊं किस द्वार ॥ ४१ ॥
चौपाई ॥
इस कारन ब्रह्मा पै जाऊं। यह सब अपनी बात सुनाऊं ॥
मो भागन सुत है अकि नाहीं । ऐसे पूछूं जाय गुसाईं ॥
चल्यो चल्यो ब्रह्मापै आयो। हाथ जोर के शीश नवायो ॥
ब्रह्मा बहुतक आदर कीनो। बैठन कारन आयसु दीनो ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६५
कहो ऋषीश्वर कैसें आये । कौन अर्थ कारज क्यौं लाये ॥
इन्द्रीजीत अरु तुम निरवासी । कैसे आये हमरे पासी ॥
कहै उद्दालक सुनहो नाथा । पूछूँ बात नवाऊं माथा ॥
यह परसँग पूछन कौं आयो । मेरे संतति लिखी बतावो ॥४२॥
ब्रह्मोवाच ॥
दोहा ॥
तब ब्रह्मा भाषत भये, सुनहो यही बिचार ।
तेरे पुत्तर होयगा, वंश बढ़ावन हार ॥ ४३ ॥
बचन हमारा सांच हो, हिरदै राख निहार ।
पहिले पुत्तर आय है, ताके पीछे नार ॥ ४४ ॥
सोई सुता रघुवंश की, पतिबर्ता धर्म रूप ।
गोत बढ़ावन हारही, सुन्दर अधिक अनूप ॥ ४५ ॥
हे ब्राह्मण अब जाइए, अपने आश्रम माहिं ।
परजापति करतार मैं, तू चिंता कर नाहिं ॥ ४६ ॥
उद्दालकउवाच ॥
चौपाई ॥
रिषीने कही जोर कर दोई । नारी बिना पुत्तर कस होई ॥
ऐसी कहीं भई विपरीता । पाछे नारी पहिले पूता ॥
मिथ्या वचन करी तुम हांसी । मैं सकुचा मन भया उदासी ॥
उद्दालक के वचन सुने जब । विधि ह्वां अन्तर ध्यान भये तब ॥
गया देख ब्रह्मा को हाईं । रिषी आया अस्थलके माहीं ॥
अपने मनमें ऐसे ताकी । ब्रह्मा हम सूं झूठी भाषी ॥
कौन भांति बनिहै यह बाता । पहिले पुत्तर पाछे बनिता ॥
सोच सोच भया अधिक उदासा। उद्दालक कहैं चरणहीदासा ॥४७॥
इति श्रीनासकेतउपाख्याने श्रीरणजीतगुसांईजीकृत
उद्दालकचिंतावर्णनोनाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
५६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
वैशंपायन यों कही, हे राजा बड़भाग ।
जानत हो सब शास्त्र, भक्ति बिषै अनुराग ॥ १ ॥
वह ब्राह्मण अभिलाष सुत, फिर लागा तपध्यान ।
परम पुरुष का धांवना, हिरदै माहीं थान ॥ २ ॥
चौपाई ॥
नारी की मन आशा रहै । काहू से मन की नहीं कहै ॥
रात दिना चिन्ता मन माहीं । छिन इक तिरिया भूलत नाहीं ॥
सब तन काम जगै दुखदाई । जैसे सूता सिंह जगाई ॥
उसी वासना बीज खिसाहा । होनहार की यही दिसाही ॥
वह बीरज कर माहीं लीन्हा । कंवल फूल माहिं धर दीन्हा ॥
मुंद गया कुशामांहि लिपटाया । फिर वह गंगा बीच बहाया ॥
ब्रह्मा जू की आज्ञा दया । तैरा कंवल जू बहता भया ॥
आगे सुनों कहैं रणजीता । जैसे कारज भया पुनीता ॥३॥
दोहा ॥
नग्गर एक सुहावना, गंगा निकट सुथान ।
राजा रघु हां का धनी, तेजवंत ज्यों भान ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
सतजुग बीत जु त्रेता लागा । तब राजारघु भया सुभागा ॥
कुल में पूरा धर्म उजागर । दयावंत अरु किरपा सागर ॥
जाकी परजा सब सुख पावै । नितही समां काल नहिं आवै ॥
धनवन्ते सुन्दर नर लोई । बड़ी उमर के रोग न कोई ॥
राजा जितका रघु सतवादी । निहकंटक निरभय जिंहगादी ॥
सूर बीर दाता सुखदाई । जाकी जग में बहुत बड़ाई ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६७
चंद्रवती थी पुत्री ताकी । धुर सूं कथा कहूं मैं वाकी ॥
जन रणजीत कहैं सुन लीजै । सबही श्रोता ह्यां चित दीजै ॥५॥
दोहा ॥
सुंदर मंदर सोहना, दिपत विराज हुलास ।
चूने लीपा सेतही, जित कन्या का बास ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
रंग महल जहां चित्तर कारी । ऊंचा महल झरोखे बारी ॥
महा सुन्दरी कंचनबरनी । सुघड़ चतुर देखत मनहरनी ॥
नख शिख ज्यों विधि आप सँवारी । गुनवंती अरु रूप उज्यारी ॥
दिवियों विषे न कन्या ऐसी । गंधर्वयों विषे न कहिये जैसी ॥
आसुरी बिषे जु देखी नाहीं । ना कहिये तिरलोकी माहीं ॥
वैसा रूप न हुआ न होगा । वा कन्या कै जोगन जोगा ॥
बड़ी अप्सरा चार पिछानों । रंभा और उरवसी मानों ॥
और तिलोतमा तीजी नारी । और मैनका चौथी प्यारी ॥७॥
दोहा ॥
ये जो चारों अप्सरा, स्वर्गही मांहि अनूप ।
उनसैं भी बहुतै सरस, वा कन्या का रूप ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
दस हजार जो कन्या ओरी । वाके पास रहें करजोरी ॥
सो वह कन्या सखियों साथी । परन बांधि गंगा नितन्हाती ॥
न्हाय सदाही भोजन करती । सखियों सहित सुखी जोरहती ॥
एक दिना ऐसी गति भई । चढ़ि सुखपाल गंग कूं गई ॥
भांत भांत के भूषन साजैं । मुतियन के गलहार बिराजैं ॥
आगे पीछे दहिने बावैं । चढ़ि तुरंगन कन्या जावैं ॥
कोइ कोइ धुजा चंवर कर धारैं । बस्तर भूषण रूप सँवारैं ॥६॥
३८
५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
वैशंपायन यों कही, हे राजा बड़भाग ।
जानत होसब शास्त्र, भक्ति बिषै अनुराग ॥ १ ॥
वह ब्राह्मण अभिलाष सुत, फिर लागा तपध्यान ।
परम पुरुष का धांवना, हिरदै माहीं थान ॥ २ ॥
चौपाई ॥
नारी की मन आशा रहै। काहू से मन की नहीं कहै ॥
रात दिना चिन्ता मन माहीं। छिन इक तिरिया भूलत नाहीं ॥
सब तन काम जगै दुखदाई। जैसे सूता सिंह जगाई ॥
उसी वासना बीज खिसाहा। होनहार की यही दिसाही ॥
वह बीरज कर माहीं लीन्हा। कंवल फूल माहिं धर दीन्हा ॥
मुंद गया कुशामांहिं लिपटाय। फिर वह गंगा बीच बहाया ॥
ब्रह्मा जू की आज्ञा दया। तैश कंवल जू बहता भया ॥
आगे सुनों कहैं रणजीता। जैसे कारज भया पुनीता ॥३॥
दोहा ॥
नग्गर एक सुहावना, गंगा निकट सुथान ।
राजा रघु ह्वां का धनी, तेजवंत ज्यों भान ॥ ४ ॥
चौपाई ॥
सतजुग बीत जु त्रेता लागा । तब राजारघु भया सुभागा ॥
कुल में पूरा धर्म उजागर । दयावंत अरु किरपा सागर ॥
जाकी परजा सब सुख पावै । नितही समां काल नहिं आवै ॥
धनवन्ते सुन्दर नर लोई । बड़ी उमर के रोग न कोई ॥
राजा जितका रघु सतवादी । निहकंटक निरभय जिंहगादी ॥
सूर बीर दाता सुखदाई । जाकी जग में बहुत बड़ाई ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६७
चंद्रवती थी पुत्री ताकी । धुर सूं कथा कहूं मैं वाकी ॥
जन रणजीत कहैं सुन लीजै । सबही श्रोता ह्यां चित दीजै ॥५॥
दोहा ॥
सुंदर मंदर सोहना, दिपत विराज हुलास ।
चूने लीपा सेतही, जित कन्या का बास ॥ ६ ॥
चौपाई ॥
रंग महल जहां चित्तर कारी । ऊंचा महल झरोखे बारी ॥
महा सुन्दरी कंचनबरनी । सुघड़ चतुर देखत मनहरनी ॥
नख शिख ज्यों विधि आप सँवारी। गुनवंती अरु रूप उज्यारी ॥
दिवियों विषे न कन्या ऐसी । गंधर्व्यों विषे न कहिये जैसी ॥
आसुरी विषे जु देखी नाहीं । ना कहिये तिरलोकी माहीं ॥
वैसा रूप न हुआ न होगा । वा कन्या कै जोगन जोगा ॥
बड़ी अप्सरा चार पिछानों । रंभा और उरवसी मानों ॥
और तिलोत्तमा तीजी नारी । और मैनका चौथी प्यारी ॥७॥
दोहा ॥
ये जो चारों अप्सरा, स्वर्गही मांहि अनूप ।
उनसैं भी बहुतै सरस, वा कन्या का रूप ॥ ८ ॥
चौपाई ॥
दस हजार जो कन्या ओरी । वाके पास रहैं करजोरी ॥
सो वह कन्या सखियों साथी । परन बांधि गंगा नितन्हाती ॥
न्हाय सदाही भोजन करती । सखियों सहित सुखी जोरहती ॥
एक दिना ऐसी गति भई । चढ़ि सुखपाल गंग कूं गई ॥
भांत भांत के भूषन साजैं । मुतियन के गलहार बिराजैं ॥
आगे पीछे दहिने बावैं । चढ़ि तुरंगन कन्या जावैं ॥
कोइ कोइ भुजा चंवर कर धारैं । बस्तर भूषण रूप सँवारैं ॥९॥
३८
५६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोहा ॥
बाजे बहुतक संग बजत, अरु गावत ही गीत ।
नंगार सैनिक सी चली, ज्यों थी नितकी रीत ॥१०॥
चौपाई ॥
जा पहुंची गंगा तट ठांहीं। क्रीड़ा करन लगी जलमाहीं ॥
ब्रह्मचारन शुभ लक्षण धारी। रूप प्रकाश रही है भारी ॥
गंगा जी में ठाढ़ी भई । उसी पद्म कूं देखत भई ॥
दिव्य सुगंध जु तैरत जावे । सूरज चंद किरन सरमावे ॥
नर क्या छूयसकै सो वाकों। कंवल जु तेजवंत है ताकों ॥
कन्या देख अचंभै रही। निज सखियन सों ऐसे कही ॥
इसी फूल के निकटै जावो । पकड़ हाथ सूं मोपै लावो ॥
अज्ञा सूं कन्या गहि ल्याई। चन्द्रवती लीनों हरषाई ॥११॥
दोहा ॥
कुशा माहिं सूं खोलकर, सूंघा नाक लगाय ।
उसमें जो बीरज हुता, पैठा नाभ मंझाय ॥ १२ ॥
चौपाई ॥
सखियों सहित नहाय कर आई। जानी ना हरिकी चतुराई ॥
पहल महीने फूलन आये । दूजे मांस अंग पलटाये ॥
मांस तीसरे मोटी काया। चौथे उदर बड़ा होय आया ॥
पंचवें रोम पलट जो गए । अस्थन कछू श्याम जो भए ॥
छठै सातवैं ऐसा भया । पेट जो बड़ा बहुत हो गया ॥
कन्या उदर देख भई बौरी । तेज भ्रिष्टभया गति मति औरी॥
सकल विकल मन व्याकुल नैना। शोक सिंधुमें परी अचैना ॥
धीरज तजकै रोवन लागी। चरनदास कहैं दुखमें पागी ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५६६
दोहा ॥
निज कन्या पूछन लगी, हे शुभ क्यों रोवंत ।
सुख दीन्हे करतारने, दुख कहु क्यों होवंत ॥ १४ ॥
हमें बतावो बेगही, तन मनमें उकलन्त ।
तुम कूं रोवत देखके, हमकूं कष्ट अत्यन्त ॥ १५ ॥
सखियों के सुन बचन ही, रोवत उत्तर दीन ।
कहूं अचम्भे की सभी, अचरज ही कूं चीन ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
मैं कुलमाहिं अकीरतवारी । भई सुनौरी सखी पियारी ॥
अरु दूषन रघुवंश मँझारी । अदिष्टगर्भमोहिभयो विकारी ॥
मैं नहीं जानूं क्या हो गया । भारी दुख हिये माहीं छया ॥
अरु देखो रघु महलों माहीं । देवत आय सकै कोइ नाहीं ॥
गंध्रव असुर न आवन पावै । मनुषों की तो कौन चलावै ॥
वड़ा अचंभा भारी भय है । तीन लोक में हुई न है है ॥
सुनिकै सखी सबै मुरझानी । पीरे बदन भई सब स्यानी ॥
मींढनलगी जू करसूं करही । इकदांतोंबिचअंगुलीधरही॥१७॥
दोहा ॥
व्याकुल होकै तुरत ही, गई रानी के पास ।
हाथ जोड़ ठाढ़ी भई, होकर बहुत उदास ॥ १८ ॥
और कही जी दान द्यो, तो हम कहैं सुनाय ।
अचरज कीसी बात हीं, कहतें जीव डराय ॥ १६ ॥
रानीउवाच ॥
चौपाई ॥
रघुरानी कही कन्या जानौ । अभैदान दियो निहचै मानौ ॥
जथा जोग कहु कन्या अबही । कछु मत राखो भाखो सबही ॥
जब कन्या ऐसे करि बोली । कहिनांह सकै कहा कहैं खोली ॥
५७० - श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रोम खड़ेहों सब तन कांपै । अचरज बात कहा कहूं तापै ॥
चन्द्रवती के महलों माहीं। गंध्रबदेवत सकै न आई ॥
मानुष की तो साम्रथ क्या है। उन महलों में आया चाहै ॥
ऐसी ठोर अचंभा भया। तुम्हरी कन्या कों गर्भ रहा ॥
जब कन्याओं ऐसे कही। रानीसुनदुखिया बहु भई ॥२०॥
दोहा ॥
व्याकुल हो धरनी गिरी, रही न कछु संभार ।
शोकमाहिं पीड़ित भई, रघुराजा की नार ॥ २१ ॥
चौपाई ॥
उन कन्याओं ताहि उठाया। धीरज दे ताकूं बैठाया ॥
रानी कन्या रुक़सत कीनौ । आप गवन राजा मन दीनौ ॥
जा राजा पै बचन उचारे । सकल शास्त्रके जानन वारे ॥
स्वामी अभैदान जो पाऊं। तौ अचरज की बात सुनाऊं ॥
राजोवाच ॥
राजाकही अभै तुम पावो। यथा योग्य सब बात सुनावो ॥
भूप बचन सुन रानी बोली। डरप सकुचती मुखसों खोली ॥
रानीउवाच ॥
कन्या तुम्हरी दूषित जानौ । चन्द्रावती ऐसे पहिचानौ ॥
जाके गर्भ अदिष्ट भया है। मोपै कछून जात कहाहै॥२२॥
दोहा ॥
क्रोधवन्त राजा भया, सुन रानी के बैन ।
और कही उन क्या कियो, रक्त बरन भये नैन ॥ २३ ॥
चौपाई ॥
राजा सेवक लिए बुलाई। क्रोधवन्त हो बात सुनाई ॥
वा कन्या कों ले तुम जावो। जंगल माहिं छोड़ि कै आवो ॥
नासकेतलीलावर्णन । ५७१
सुनकर सेवक आयसु लीनों । बनोबास कन्याकूं दीनों ॥
भयानक जंगल अधिक उदासा । व्याघ्र सिंघान का जहां बासा ॥
दसों दिशा तक व्याकुल भारी । कहैकि विधिक्या विपता डारी ॥
यों अधीर हो रही कुंवारी । ज्यों हिरनी संग सूं भईन्यारी ॥
कहै रनजीत हिये के माहीं । ऐसी दुखी कहसकूं नाहीं ॥२४॥
इति श्रीनासकेतोपाख्याने चन्द्रवतीकन्यात्यागोनाम
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
दोहा ॥
ऐसे कन्या दुखित थी, इतने ही के माहिं ।
फिरता आया एक ऋषि, करी दया की छांहिं ॥ १ ॥
चौपाई ॥
सच धर्म में था वह पूरा । तप के मांहीं अधिकी सूरा ॥
हुता जु श्रेष्ठ मुनियों के माहीं । लैन फूल फल आया व्हांहीं ॥
उलटा जब आश्रम कूं चाला । लिये फूल फल कुशा कृपाला ॥
रोवत कन्या दिष्ट निहारी । चक्रित भया कौन यह बारी ॥
जाग्यवलक चिंता करि देखा । मनमें किए विचार अनेका ॥
यह दमयन्ती कै घिरताची । कै रंभा है सुन्दर आछी ॥
कै तिलोत्तमा चित्तरलेखा । कै इन्द्राणी है जु मैनिका ॥
देव सुता कै राज कुमारी । ऐसैं सोचकियो ऋषिभारी ॥२॥
दोहा ॥
छबि गुण रूप अधिक तहां, ससिवदनी अधिकाय ।
अंग अंग सुन्दर सबै, शोभा कही न जाय ॥३॥
सुन्दर कन्या देख कर, अचरज -मन में लाय ।
जाग्यवलक पूछत - भये, ऐसे वचन सुनाय ॥४॥
५७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चौपाई ॥
हे कन्या तू कित सूं आई। है तू कौन पिता को माई ॥
कौन काज जंगल के माहीं। आप अकेली संग कोई नाहीं ॥
सिंघ जरक भेढ़ा इहि ठाईं। सो तोकूं भक्षन करि जाईं ॥
फिर कन्या वह ऐसे बोली। अपनी बिपता कही सबखोली ॥
हे ब्राह्मण क्या पूछै मेरी। मैं कुल बैरन दुखी घनेरी ॥
राजा रघु की मैं हूं बेटी। पिछले पापन मोहिं लपेटी ॥
बिन जानैं भयो गरभ दुखारी। पिता मोहिं निरजल बनडारी ॥
शोकवान सों आतुर भारी। दुखमें पीडत हिये मझारी ॥५॥
दोहा ॥
यों कन्या के बचन सुन, दुखी भयो ऋषिराय ।
सब अंगन संतप्त हो, बोला फिर दुहराय ॥ ६ ॥
ऋषिरुवाच ॥
हे देवी तू धर्मकी, बेटी मैं करी आज ।
मेरै आश्रम के बिषे, चल के सदा विराज ॥ ७ ॥
परमेश्वर हित सेवहीं, तहां करूं चितलाय ।
कंद साग फल लायकै, आगे धरूं बनाय ॥ ८ ॥
जब प्रसन्न होय संग भई, आई आश्रम माहिं ।
चरणदास कहैं रहने लगी, कोई अँदेसो नाहिं ॥ ६ ॥
बहुत दिना रहते हुए, गरभ भयो दसमास ।
जब उकताई देहसों, दुख मानौं बहु तास ॥१०॥
जब जान्यों परसूत का, समां जु पहुंचा आय ।
भवन बिसारो सकुच सों, पहुंची बन में जाय ॥११॥
चौपाई ॥
गंगा जी पुनी हांई बिराजै । निर्मल जल शुध अधिकी राजै ॥
: नासकेतलीलावर्णन । ५७३
नमस्कार जाकर उन कीनों । सरन लई चित नीकें दीनों ॥
पार ब्रह्म कूं लिया संभारी । अरु कही तुमपर जाऊं वारी ॥
फिर सूरज कूं नीकै धाया । जग पांलन तुम दिनके राया ॥
अरुकही विष्णु जगत के स्वामी । घट घट के तुम अंतरजामी ॥
महादेव अरु गौरा माई । सभी देव मम करो सहाई ॥
जो मैं शुद्ध वंश में उपजी । हूं मैं शुद्ध शुद्धही शुभजी ॥
रघु मम पिता मात सतवंती । उनकी पुत्री मैं कुलवंती ॥१२॥
दोहा ॥
जो मेरी या देह में, पाप नहीं है मूर ।
तो जैसे गर्भ रहा है, उस मारग हो दूर ॥ १३ ॥
अहो विधाता जगतपति, यही अरज सुन लेह ।
मेरा वचन जु सांच है, तोसिताब सुख देह ॥ १४ ॥
वैशंपायनउवाच ॥
कन्या की करुना सुनी, जगजीवन करतार ।
तबै गर्भ वह उदर सों, आया कंठ मझार ॥ १५ ॥
कंठ सूं आया सीस में, छींक भई तिह बार ।
तबहीं निकसा बाहरे, नासाही के द्वार ॥ १६ ॥
चौपाई ॥
आई छींक सभी दुख टारे । बालक जनम्यों नासा द्वारे ॥
तातैं नासकेत भया नाऊं । द्योस घड़ी धन धन वह ठाऊं ॥
भूमि परतही बालक बोला । अपना भेद सभी तिन खोला ॥
हे माता सतवंती धरमी । मन में धीरज रख सुख करमी ॥
नासकेत मम नाम बखानौं । जोग सिद्ध मैं पूरन जानौं ॥
विधि के बचन जु पूरे भये । उद्दालक सूं आगे कहे ॥
ब्रह्मा का सुत है उद्दालक । ताही का जो मैं हूं बालक ॥
५७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
उपजा वाके बीरज सेती। कही सांच मानियो जेती॥
बालक बचन सुने जब माई। वह बहुती अचरज में आई॥१७॥
दोहा॥
जबै मोह बश होय कै, गोदी लिया उठाय।
फिर मुख में अस्तन दियो, खुशी भई अधिकाय ॥ १८॥
चौपाई॥
बालक शोभा कहा बखानूं। रूपवंत अरु धुर सूं ज्ञानूं॥
ऋषि के आश्रमही के माहीं। पालन लगी जिसी के ताईं ॥
लज्या दुख लियें रहै सुभागा। इकदिन बालक रोवनलागा॥
थांभा थमै न क्योंही कैसे। कीया क्रोध सुभांगी जैसे॥
हे पुत्तर रोवत क्यों भारी। तोही कारन बनमें डारी॥
वैशंपायनउवाच ॥
हूवा था जब एक बरस का। रूपवंत गुणवंत सरस का॥
क्रोध सहित माता मन आई। वहीं पिटारी एक बनाई॥
तामें बालक कूं पौढ़ाया। कुशाघासतापै लिपटाया॥१६॥
[दोहा॥
गही पिटारी आयकर, गंगा दिया बहाय।
तब कन्या उस पुत्रकूं, ऐसे कहा सुनाय॥२०॥
चौपाई॥
कौन गरभ का मैं नहीं जानूं। तेरे पिताकूं मैं न पिछानूं॥
जाके बीरज भया उपाधू। ताही के ढिग बहकर जातू॥
जब बालक वह बहता चला। आगे सुन होतबकी कला॥
बालक आया बहते बहते। जहां ऋषेश्वर बहुतक रहते॥
उद्दालक रहता था हांही। तेजवन्त तपसी अधिकाई॥
लखी पिटारी आवत सबही। पर लीनी उद्दालक तबेही॥