भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
शब्दवर्णन ३७७
बिन ऋतु फूले फल रहत हैं अमृत फल रस पागो।
पवन गवन बिन पेवन बहतहै बिन बादर झरि लागो ॥
अनहद शब्द भँवर गुंजारैं शंख पखावज बाजैं ।
ताल घंट मुरली घनघोरा भेरि दमामें गाजैं ॥
सिद्धगर्जना अतिही भारी घुंघुरू गति झनकारैं ।
रम्भा नृत्यकरैं बिन पगसों बिन पायल ठनकारैं ॥
गुरु शुकदेवकरैं जब किरपा ऐसो नगर दिखावैं ।
चरणदास वा पग के परसे आवागमन नशावैं ॥
राग सारंग व विलावल व सोरठ ॥
साधो अजब नगर अधिकाई ।
औघट घाट वाट जहाँ बांकी उस मारग हम जाई ॥
श्रवण विना बहु वाणी सुनिये बिन जिह्वा स्वर गावैं ।
बिना नैन जहां अचरज दीखै विना अंग लपटावैं ॥
विना नासिका बास पुष्पकी विना पावँ गिरि चढ़िया ।
विना हाथ जहँ मिलो धायकै बिन पाधा जहँ पढ़िया ॥
ऐसा घर बड़भागी पाया पहिरि गुरूका बाना ।
निश्चल ह्वैकै आशा मारी मिटिगा आवनजाना ॥
गुरू शुकदेव करी जब किरपा अनभय बुद्धि प्रकासी ।
चौथे पद में आनंद भारी चरणदास जहाँ वासी ॥
राग सोरठ ॥
सो गुरु बिन वह घर कौन दिखावै ।
जिहिघर अग्नि जलै जलमाहीं यह अचरज दरशावै ॥
कामधेनु जहाँ ठाढ़ी सोहैं नैन हाथ बिन दुहना ।
धाये दूधा थोड़ा देवै भूखे दे पै दूना ॥
३७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पीवैं जन जगदीश पियारे गुरुगम बहुत अघावैं ।
मूरख कायर और अयोगी सोवै नेक न पावैं ॥
अमृत अँचवै वा पद पहुँचे महातेजको धारै ।
होय अमर निश्चल ह्वै बैठे आवागमन निवारै ॥
भेद छिपावै तौ फल पावै काहू से नहिं कहिये ।
वह अद्भुत है ठौर अनूठी बड़भागन सों लहिये ॥
या साधन के बहु रखवारे ऋषि मुनि देवत योगी ।
करन न देवैं बुधि हरि लेवैं होय न गोरस भोगी ॥
लोभी हलके को नहिं दीजै कहै शुकदेव गुसाईं ।
चरणदास त्यागी वैरागी ताहि देहु गहि बाहीं ॥
सो गुरु गम मगन भया मन मेरा ।
गगन मण्डल में निज घर कीन्हो पंच विषय नहिं घेरा ॥
प्यास क्षुधा निद्रा नहिं व्यापी अमृत अँचवन कीन्हा ।
छूटी आस बास नहिं कोई जग में चित नहिं दीन्हा ॥
दरशी ज्योति परम सुख पायो सबही कर्म जलावै ।
पाप पुण्य दोऊ भै नाहीं जन्म मरण बिसरावै ॥
अनहद आनँद अति उपजावै कहि न सकूं गतिसारी ।
अति ललचावै फिरि नहिं आवै लगी अलख सों यारी ॥
हंस कमलदल सतगुरु राजै रुचि रुचि दरशन पाऊं ।
कहि शुकदेव चरणहींदासा सब बिधि तोहिं बताऊं ॥
राग मलार ॥
चहूँदिशि झिलमिल झलक निहारी ।
आगे पीछे दहिने बायें तल ऊपर उजियारी ॥
दृष्टि पलक त्रिकुटी है देखे आसन पद्म लगावै ।
संयम साधै दृढ़ आराधै जब ऐसी सिधि पावै ॥
शब्दवर्णन । ३७६
बिन दामन चमकार बहुतही सीप बिना लर मोती ।
दीपमालिका बहु दरसावैं जगमग जगमग ज्योती ॥
ध्यान फलै तब नभके माहीं पूरण हो गति सारी ।
चन्द घने सूरज अणकी ज्यों सू भर भरिया भारी ॥
यहतो ध्यान प्रत्यक्ष बतायो श्रद्धा होय तौ कीजै ।
कहि शुकदेव चरणहींदासा सो हमसों सुनि लीजै ॥
राग केदारा ॥
अवधू सहस दल अब देख ।
श्वेत रंग जहां पंखरी छवि अग्र डोर विशेख ॥
अमृत वरषा होत अतिझरि तेज पुंज प्रकास ।
नाद अनहद बजत अद्भुत महाब्रह्म विलास ॥
घंट किंकिणि मुरलि वाजै शंखध्वनि मनसान ।
ताल भेरि मृदंग वाजत सिन्धुगर्जन जान ॥
कालको जहाँ पहुँच नाहीं अमर पदवी पाव ।
जीति आठौ सिद्धि ठाढ़ी गगन मध्ये आव ॥
करै गुरु परताप करणी जाय पहुँचे सोय ।
चरणदास शुकदेव कृपा जीव ब्रह्मै होय ॥
राग धनाश्री ॥
सो गुरुगम इहि विधि योग कमायो ।
आसन अचल मेर कियो सीधो कसि बँध मूल लगायो ॥
संयम साधि कला वश कीन्ही मन पवना घर आयो ।
नो दरवाजे पट दै राखे अद्धूं ऊर्ध्व मिलायो ॥
नाभि तलै पैंड़ो करि पैठे शक्ति पताल गई है ।
कांप्यो शेष कमंठ अकुलायो सायर थाह दई है ॥
१ आकाश २ कछुवा ॥
३८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
उलटि चले मठ फोरि इकीसौ गये अभय पद माहीं ।
अति उजियारो अद्भुत लीला कहन सुनन गम नाहीं ॥
जित भयेलीन सबै सुधि बिसरी छूटी जगत बियाधा ।
चरणदास शुकदेव दयासों लागी शून्य समाधा ॥
सो साधो ऐसी योग युक्ति गति भारी ।
मूलहि बंध लगाय युक्ति सों मूंदि लई नौनारी ॥
आसन पद्म महादृढ़ कीन्हो हिरदय चिबुकै लगाई ।
चंद सूर दोउ सम करि राखे निरति सुरति घर आई ॥
ऊपर खैंचि अपान सहज में सहजै प्राण मिलाई ।
पवन फिरी पश्चिम को दौरी मेरुँहि मेरु चलाई ॥
ऐसेहि लोक अमर पद पहुँचे सूरज कोटि उज्यारी ।
श्वेत सिंहासन सतगुरुपरशे करि दरशन बलिहारी ॥
आपा बिसरि परम सुख पायो उनमनी लागी तारी ।
चरणदास शुकदेव दया सों जन्म मरण छुटि बारी ॥
राग मलार ॥
वा पद रामसों करि नेह ।
विषकी बूंद न पह्ये जित हां बरषत अमृतमेह ॥
चमकत बिजुली गरजत गगना बाजत अनहद घोर ।
यहमन थकत गलतजित पाँचौ मिटिहैं निशि अरुभोर ॥
जाग्रत मिटि है स्वप्नौ मिटि है मिटिहु सुषोपत जाय ।
षट ऋतु पह्ये नाहिंन अवधू एकहि रस दर्शाय ॥
बिनहीं जोते बिनहीं बोये उपजत खेत है धीर ।
लागत अचरज फल महँ मुक्ता बिनहीं सींचे नीर ॥
राजा गुरु शुकदेव न बांटै सबहि करैं बकसीस ॥
१ दाढ़ी २ मेरुदंडनाड़ी वह है जो पृष्ठभाग से सीधी शिरतक चलीगई है।
शब्दवर्णन । ३८१
चरणदास रास सब पावैं मिलि है बिस्वेबीस ॥
राग सोरठ ॥
अवधू ऐसी मदिरा पीजै ।
बैठि गुफामें यह जग बिसरै चंद सूर सम कीजै ॥
जहाँ कलाल चढ़ाई भाठी ब्रह्म ज्वाल परजारी ।
भरि भरि प्याला देत कलाली बाढ़ै भक्ति खुमारी ॥
माता हो करि ज्ञान खङ्ग लै काम क्रोध को मारै ।
घूमत रहै गहै मन चंचल दुबिधा सकल बिड़ारै ॥
जो चाखै यह प्रेम सुधारस निज पुर पहुँचै सोई ।
अमर होय अमरापद पावै आवागमन न होई ॥
गुरु शुकदेव किया मतवारा तीनि लोक तृण बूझा ।
चरणदास नहीं रही वासना आनँद आनँद सूझा ॥
राग सारंग ॥
पीवै कोई यह प्याला मतवारा ।
सुर नर मुनि जा मदको तरसैं गुरुबिन लहै न बारा ॥
शूदर के घर भाठी औटै ब्रह्मा अग्नि जलाई ।
शिव शोधैं अरु विष्णु चुवावैं पीवै साधु अघाई ॥
सीता प्याला भरि भरि देवैं हनूमान हंकारैं ।
व्यास शेष नारद सनकादिक किरिया नाहिं विचारैं ॥
नवधा नेम औ संयम पूजा बिसरी सब कहा कहिये ।
घूमत रहें महारस चाखे स्वर्गमुक्ति ना चहिये ॥
श्रीशुकदेव सुधारस अमृत नितप्रति अँचवन कीन्हा ।
चरणदास पर किरपा करिकै निज प्रसाद करि दीन्हा ॥
३८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
साधौ यह प्याला मतवार है ।
अचवैगा कोइ योगयुगन्ता चित आस्थिरमन मारिहै ॥
चन्द सूर दोउ समकरि राखै ब्रह्मज्याल अन्तर बरै ।
मुद्रा लगै खेचरी जबहीं वङ्क नाल अमृत झरै ॥
भँवर गुफा में भाठी औटै भभक भभक सुषमन चुवै ।
सुगुरा पी पी रहित भये हैं बिन पीये उपजें मुये ॥
शिव सनकादिक नारद शारद और पिया नौ नाथहै ।
सिधि चौरासी हरिपदवासी मगन भया सव साथहै ॥
रामानन्द कवीर नामदे अमर हुये जिन जिन पिया ।,
गुरु शुकदेव करी जब किरपा चरणदासको सो दिया ॥
राग धनाश्री ॥
जो जन अनहद ध्यान धरै ।
पांचौ निर्बल चञ्चल थाके जीवतही जु मरै ॥
शोधे मूलबन्ध दै राखै ; आसन सिद्ध करै ।
त्रिकुटी सुरति लाय ठहरावै कुम्भक पवन भरै ॥
घन गरजै अरु बिजुली चमकै कौतुक गगन धरै ।
बहुत भांति जहां वाजन बाजें सुनि सुनि सन्ध अरै ॥
सहज सहज में हो परकाशा बाधा सकल हरै ।
जग की आस बास सब टूटैं ममता मोह जरै ॥
शून्य शिखर पर आपा बिसरै काल सों नाहिं डरै ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं सब गुण ज्ञान गरै ॥
तबते अनहद घोर सुनी ।
इन्द्री थकित गलित मन हूवो आशा सकल भुनी ॥
घूमत नैन शिथिल भइ काया अमल जु सुरति सनी ।
रोम रोम आनन्द उपजि करि आलस सहज बनी ॥
शब्दवर्णन । ३८३
मतवारैं ज्यों शब्द समायौ अन्तर भीज कनी ।
भर्म्म कर्म्म के बन्धन छूटैं दुबिधा बिपति हनी ॥
आपा बिसरि जक्त को बिसरो कितरहिं पांच जनी ।
लोक भोग सुधि रही न कोई भूलो ज्ञान गुनी ॥
हो तहाँ लीन चरणहिंदासा कहैं शुकदेव मुनी ।
ऐसो ध्यान भाग्य सों पहूये चढ़ि रहे शिखर अनी ॥
राग बिलावल ॥
घट में खेलि ले मन खेला ।
सकल पदारथ घटही माहीं हरिसों होय जुमेला ॥
घट में देवल घट में जाती घट में तीरथ सारे ।
वेगहि आव उलटि घटमाहीं बीतैं परबीनहारे ॥
घट में मानसरोवर सू भर मोती और मराला ।
घट में ऊंचा ध्यान शब्द का सोहं सोहं माला ॥
घट में बिन सूरज उजियारा राति दिना नहिं सूझै ।
अमृत भोजन भोग लगंत है बिरलाजन कोइ बूझै ॥
घट में पापी घट में धर्मी घट में तपसी योगी ।
गुण अवगुण सब घटही माहीं घटमें वैद्य अरु रोगी ॥
रामभक्ति घटही में उपजै घट में प्रेम प्रकासा ।
शुकदेव कहैं चौथापद घट में पहुँचे चरणहिंदासा ॥
राग विलास ॥
घट में तीरथ क्यों न नहावो ।
इतउंत डोलो पथिक बनेही भरमि भरमि क्यों जन्म गंवांवो ॥
गोमती कर्म सुकारथ कीजै अधरम मैल छुटावो ।
शील सरोवर हितकरि न्हइये काम अग्निकी तपनि बुझावो ॥
रेवा सोई क्षमा को जानौ तामें गोता लीजै ।
३८४ चरणदासजीकाग्रन्थ ।
तन में क्रोध रहन नहिं पावै ऐसी पूजा चित्तदै कीजै ॥
सत यमुना संतोष सरस्वति गंगा धीरज धारो ।
झूठ पटकि निर्लोभ होय करि सबही बोझा शिरसों डारो ॥
दया तीर्थ कर्मनाशा कहिये परसे बदला जावै ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं चौरासी में फिरि नहिं आवै ॥
राग विभास ॥
घट में तीरथ यों तुम न्हावो ।
तिनकेन्हान अमरपद पहुँचौ आदि पुरुष निश्चय करिपावो ॥
काशी सो तत करणी कीजै कलिमल सकल नशावो ।
रहनि गहनि पुष्कर को जानौ यामें मज्जन क्यों न करावो ॥
ध्यान द्वारका दृढ़ करि परसो हितकी छाप लगावो ।
इन्द्रीजित सोइ बदरीनाथा यह गति सतकरि चिन्हमें लावो ॥
भँवर गुफा में है तिर्बेणी सुरति निरति लै धावो ।
योग युक्ति सों डुबकी लेकरि काग पलटि हंसा ह्वै जावो ॥
तन मथुरा अरु मन वृन्दावन तामें रास रचावो ।
हिरदयकमल खिले परकाशादरशन देखि अधिकहुलसावो ॥
गुरु चरणन में सबही तीरथ सिमिटि सिमिटि तहाँ आवों ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं अपनो मस्तक भेंट चढ़ावो ॥
राग पर्ज ॥
सुधारस कैसे पइये हो ।
कूप¹ कहां केहि ठौर है कैसे करि लहिये हो ॥
नेजू कित कित गागरि कित भरने वारी हो ।
कैसे खुलै कपाट ही को ताला ताली हो ॥
कौन समै किस गृह बिषे अँचवै किन माहीं हो ।
१ कुवाँ
शब्दवर्णन ३८५
तुम से जानै भेद को अरु बहुतक नाहीं हो ॥
पीकरि किस कारज लगै अरु स्वाद बताओ हो ।
फल याका कहि दीजिये सब खोलि जतावो हो ॥
शुकदेव सो पूछन करें यह चरणहिंदासा हो ।
किरपा करिकै कीजिये मेरि पूरी आशा हों ॥
गुरू हमारे प्रेम पिआयो हो ।
तादिन ते पलटो भयो कुल गोत नशायो हो ॥
अमल चढ़ो गगनै लगो अनहद मन छायो हो ।
तेज पुंजकी सेज पै प्रीतम गल लायो हो ॥
गये दिवाने देसड़े आनँद दर्शायो हो ।
सब किरिया सहजै छुटी तप नेम भुलायो हो ॥
त्रैगुणते ऊपर रहूं शुकदेव बसायो हो ।
चरणदास दिन रैन-नहिं तुरियापद पायो हो ॥
राग जैजैवंती ॥
ऐसी जो युक्ति जानै सोई योगी न्यारा। आसन जो सिद्धि
करै त्रिकुटी में ध्यान धरै बिना तेल दिया बरै ज्योति हूँ
उज्यारा ॥ संयम सँभाल साधै मूल द्वार बन्ध बांधै शंखनी
उलटि साधै कामदेव जारा । प्राण वायु हिये माहीं खैंचिकै
अपान लाहीं दोऊ नीके मिलि जाहीं ऐसा खेल धारा ॥ कुँभक
अथक राखै अनहद ओर ताकै सुषमन पैठि नाकै आगे जो
विचारा । खोलि कै कपाट सिरा कोऊ चढ़ शूरवीरा कामधेनु
जावै तीरा अमी को उतारा ॥ उनमनी जाय लागै निज गृह
माहीं जागै जन्म मरण भागै छूटै जग भारा । गुरुशुकदेव
कहै करणी यही विधि लहै चरणदास होय रहै आप को
सँभारा ॥
३८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सोरठ व सारंग ॥
पांचन मोहि लियो बलिमा ।
नासा त्वचा और श्रवणीया नैनन अरु रसना ॥
एक एक ने बारी बांधी गहि गंहि लै लै जाहिं ।
निशिदिन उन्हीं के रस पागो घरमें ठहरतं नाहिं ॥
अलि पतंग गज मीन मृगा ज्यों होय रह्यो पराधीन ।
अपनो आप सँभारत नाहीं विषय वासना लीन ॥
हौं कुलवन्ती टोना सीखो अनहद सुरति धरूं ।
गगन मँडल में उलटा कूंवां तासों नीर भरूं ॥
भँवर गुफा में दीपक बारौं मन्तर एक पढूं ।
काम क्रोध मद लोभ मोहकर लालन चित्त हरूं ॥
यतन यतन करि पीव छुटाऊं फिर नहिं जाननदूं ।
चरणदास शुकदेव बतावैं निज मनहीं करलूं ॥
राग सोरठ ॥
तू सदा सोहागिनि नारी है ।
पियके संग मिली मद् पीवै ताते लागत प्यारी है ॥
भँवरगुफा में भँवनबनावो बिन घृत ज्योती जारी है ।
सुषमन सेज महा सुखदायी भोगत भोग दुलारी है ॥
वशकियो कंथा चलै न पंथा टोनाडारो भारी है ।
आठ पहर तुम्हरे रँग राचो हमको मिल न वारी है ॥
पति मनमानी सो पटरानी सोई रूप उजारी है ।
हम चारौ जो सौति तुम्हारी तुम गुणआगे हारी है ॥
चरणहिंदास भई त्वहिं सेवैं लगीरहै नितलारी है ।
शुकदेवा शिर छत्र हमारो सो वशभयो तुम्हारी है ॥
शब्दवर्णन । ३८७
राग बिलावल ॥
करणी की गति और है कथनी की औरै ।
बिन करणी कथनी कथै बकवादी बौरै ॥
करणी बिन कंथनाइसी ज्यों शशिबिन रजनी ।
बिन शस्तर ज्यों शूरिमा भूषण बिन सजनी ॥
ज्यों पण्डित कथि कथि भले वैराग सुनावैं ।
आप कुटुम्ब के फँद पड़े नाहीं सुरझावैं ॥
बांझ झुलावै पालना बालक नहीं माहीं ।
वस्तु विहीना जानिये जहाँ करणी नाहीं ॥
बहुडिंभी करणी बिना कथि कथि करि मूये ।
सन्तौ कथि करणी करी हरिकी सम हूये ॥
कहैं गुरू शुकदेवजी चरणदास विचारौ ।
करणी रहनी दृढ़ गहौ थोथी कथनी डारौ ॥
हेली ॥
पांचसखी ले लार हेली काया महल पगधारिये ।
योग युक्तिडोला करौरी अरी हेली प्रान अपान कहार ॥
कुंज कुंज सब देखियेरी अरी हेली नानाबाग बहार ।
मानसरोवर न्हाइये सदा वसन्त निहार ॥
बिनासीप मोतीबनेरी अरीहेली बिनागूंद फूलनहार ।
बिन दामिनिं चमकारहै बिन सूरज उजियार ॥
अनहद उत बाजे बजैंरी अचरज बहुतक ख्याल ।
तेजपुंज की सेजपै कागा होहिं मराल ॥
श्रीशुकदेव कृपा करें जब पावै यह भेद ।
चरणदास पियासों मिलै छुटैं जगत के खेद ॥
३८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
योग युक्ति करि लेहि हेली जो चाहै हरिसों मिलो ।
आसन संयम साधि कैरी गगनमंडल करि गेह ॥
उलटी दृष्टि चढ़ाइयेरी होय सूरज परकाश ।
करम भरम सबही जरैं सहजछुटै जग आश ॥ १ ॥
प्राण अपान मिलायकेरी मूलबन्धको बांधि ।
रसना उलटि लगाइये सुरति उर्ध्व को साधि ॥ २ ॥
बङ्क सुधारस पीजिये अनहदहो गलतान ।
भँवर गुफा दृढ़ बैठिके शून्य शिखर को ध्यान ॥ ३ ॥
सुषमन मारग ह्वै चलौरी जब पहुँचौ निजधाम ।
अचल सिंहासन श्वेत है जहां विराजैं राम ॥४॥
यह साधन शुकदेव कीरी जो कोई जानैं साध ।
चरणदास अविगति लहै देखै खेल अगाध ॥ ५ ॥
अथ वैराग का अंग ॥
राग मंगल ॥
चला चली जगठाट अचल हरिनाम है ।
माल मुल्क चलि जाय जाय रज धाम है ॥
तेल फुलेल लगाय बहुत सुन्दर गए ।
नानाकरते भोग सोभी नर ना रहे ॥
तेज तमक और रूप जाय योवन धना ।
सकल बराती जायँ जायँ दुलहिनि बना ॥
रोगी रोग अरु वैद्यजाय औषधि भले ।
ज्योतिषपुस्तक तूट बिनस रज हो मिले ॥
ज्ञानी पण्डित पीर अधिक बेवश गले ।
शब्दवर्णन । ३८६
गौस कुतुब अब्दाल पैगम्बर सब चले ॥
एकके पीछे एक बहीर लगी चली ।
नरपति सुरपति जाहिं अन्त वाही गली ॥
ऋषिमुनि देवन सिद्ध योगेश्वर जाहिंगे ।
जिन वश कीन्हीं मौत सोभी न रहाँहिंगे ॥
पांच तत्त्व गुणतीनि नहीं ठहराहिंगे ।
स्वर्ग मृत्यु पाताल सभी रलि जाहिंगे ॥
धरती अम्बर जाय जाय शशि भान है ।
चरणदास शुकदेव दया लियो जान है ॥
रहै रामका नाम जपै सोभी रहै ।
वेद पुराणन माहिं सभी योंहीं कहै ॥
जन्म मरण नहिं होय न योनी आवई ।
सतसिंहासन बैठि अमरपुर पावई ॥
यम जालिमके दण्ड भर्म छुटिजाहिंगे ।
लखचौरासी बन्ध सबी कटिजाहिंगे ॥
नवग्रह लगे न देह गेह आनँद रहै ।
डाकिनि सर्पिनि सिंह भूत नाहीं दहै ॥
साधुसंग गुरुसेव आय घटमें वसै ।
कलह कल्पना जाय द्वन्द्व संकट नसै ॥
तिलक दिये लिलाट जु कण्ठी सोहनी ।
नौबिस लक्षण धारि सहज जीतै मनी ॥
ऊंची पदवी होय जगत सब पगलगै ।
दुष्ट जलैं मनमाहिं दूरिही सों तकैं ॥
पाप भगैं मुखदेखि दरश कोई करै ।
३६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भक्ति परापत ताहिसु चरणों आपरै ॥
कहैं गुरू शुकदेव चरणहीं दाससों ।
सब मन्तर शिरमौर सुमिर हरिनांम को ॥
राग काफी ॥
क्या दिखलावै शान यह कुछ थिर न रहैगा ।
दारा सुत अरु माल मुल्कका कहा करै अभिमान ॥
रावण कुम्भकरण हिरणाकुश राजा कर्ण सँभार ।
अर्जुन नकुल भीमसे योधा माटी हुय निदान ॥
क्षणक्षण तेरो तन छीजत है सुंनु मूरुख अज्ञान ।
फिरि पछिताये कहा होयगा जब यम घेरैं आन ॥
विनशैं जल थल रवि शशि तारे सकल सृष्टिकीहानि ।
अजहूँ चेत हेतकरु हरिसों ताहीकी पहिंचानि ॥
नवधाभक्ति साधुकी संगति प्रेम सहित कर ध्यान ।
चरणदास शुकदेव सुमिरले जो चाहौ कल्यान ॥
राम नाम चितलाव अरु सब शोक निवारो ।
सकल बिकल सब मनके टारो निश्चय करि ह्यांआव ॥
तीरथ वर्त सभी फल देवैं राम नाम तुलनाहिं ।
पार लगावन मुक्ति करावन समझि देखु मनमाहिं ॥
पढ़ौ पढ़ावौ भेद न पावौ कछू न लागै हाथ ।
अर्थ विचारौ तौ तुम जानौ कै सन्तनको साथ ॥
उमिरि गवाँवै तुच्छ स्वादन में करि पाँचंन सों भोग ।
अन्तकाल दुख होहिं घनेरे तन मन लिपटैं रोग ॥
लोक परलोक महासुख पावै जो सुमिरै हरिनांम ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं होवैं पूरणकाम ॥
शब्दवर्णन ३६१
राग मालश्री ॥
थिर नहीं रहना है आख़िर मौतनिदान ।
देखत देखत बहुतक बिनशे आवत तुम्हरी बार ।
यतन करौ कोइ नाना विधि के बचै नहीं नरनार ॥
वे योगेश्वर वशकरि मौतै जड़िये वज्र किवाँड़ ।
ह्वै बैठे ज्यों मरना नाहीं माटी ह्वै गये हाड़ ॥
कित गये रावण कुंभकरणसे हरणाकुश शिशुपाल ।
शंकर दियो अमर वर जिनको सोभी खाये काल ॥
यह तन बर्तन कांचकोरे ठत्रक लगे खिलिजाय ।
आज मरै क कोटि वर्षलौं अन्त नहीं ठहराय ॥
बीतत अवधि अलावा आवै छोड़ि जगतकी आस ।
गुरु शुकदेव बतावै तोको समुझु चरणहींदास ॥
क्षणभंगी छलरूप यह तन ऐसारे ।
जाको मौत लगी बहु विधि सों नाना अंग ले बान ।
विष अरु शस्त्र रोग बहुतकहैं और बिघन बहुहान ॥
निश्चय बिनशै बचै न क्योंहीं यत्न किये बहुदान ।
ग्रह नक्षत्र अरु
३६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो बिछुरैं सो बहुरि न मिलि हैं जो युगजाहिं अनंत ॥
राम सँघाती नेक न बिछुरैं ताहि सँभारत नाहीं ।
अपनी काया सोऊ न अपनी समझि देखु मनमाहीं ॥
चरणदास शुकदेव चितावैं छाँड़ौ जग उरझेरा ।
अमर नगर पहिचान सिदौसी जितकर निश्चल डेरा ॥
जानै कोइ संत सुजान यह जग स्वपना है ॥
स्वप्न कुटुंबी आपा मानै स्वप्ना वैरागी लै ।
स्वप्नै लेना स्वप्नै देना स्वप्नै निर्भयभै ॥
स्वप्नै राजा राज करतहै स्वप्नै योगी योग ।
स्वप्नै दुखिया दुख बहुपावै स्वप्नै भोगी भोग ॥
स्वप्नै शूरा रणमें जूझै स्वप्नै दाता दान ।
स्वप्नै पियसँग पायकजरिया स्वप्न मान अपमान ॥
स्वप्नै ज्ञानी गुरुगम जागै अपना रूप निहारि ।
अज्ञानी सोवत स्वप्ने में डसे अविद्या नारि ॥
चरणदास शुकदेव चितावै स्वप्ना सो सब झूठ ।
अचरज समझ अगाध पुरानी मौन गहौ गहि मूठ ॥
राग ललित ॥
चेत सबेरे चलना बाट । यह सब जानौ झूठा ठाट ॥
जग सरायमें कहा भुलानो । भठियारी के मोह लुभानो ॥
तुझको तौ बहु कोसन जानो । करि हिसाब बनियें की हाट ॥
कुँटुब मित्र कोइ हितू न तेरा । अपने स्वारथ ही को घेरा ॥
ह्यां नहि तेरा निश्चल डेरा । उठिये हूजै वेगि उचाट ॥
चलने की तदबीर न कीन्हीं । खोंटी राह थाह नहिं चीन्हीं ॥
मंजिलों की खरची नहिं लीन्हीं । गाफिल सोवै अजहूँ खाट ॥
शब्दवर्णन । ३६३
मग माहीं ठग बाग लगाये । बहुत मुसाफिर जित परचाये ॥
अरु उनको बिष लड्डू खवाये । मारि लिये स्वादन के घाट ॥
सावधान कोइ हाथ न आये । बचकर चले सो निरभय धाये ॥
उनके छलके पेच न खाये । नेक न लागी तिनको आंट ॥
मन चंचलका घोड़ा कीजै । ध्यान लगाम ताहि मुखदीजै ॥
ह्वै असवार ताहि गहि लीजै । भवसागर का चौड़ा फांट ॥
चरणदास शुकदेव चितावै । अपना जानि तोहिं समझावै ॥
तेरे भले कि बात बतावै । बारबार कहुं तोको डांट ॥
राग आसावरी ॥
गुरु मुख यह जग झूठ लखाया ।
साधसंत अरु वेद कहतहैं और पुराणन गाया ॥
मृगतृष्णा के नीर लोभाना सीपी रूपा जाना ।
फटिक शिलापर पीक परी है मूरुख लाल लोभाना ॥
स्वप्ने में सब ठाट ठटो है कुल नाते परिवारा ।
दृष्टि खुली जब सबही नाशे रहो नहीं आकारा ॥
ताते चेत भजन कर हरिको हां मत मनको पागौ ।
वा घरगये बहुरि नहिं आवै आवागमन न लागौ ॥
या स्वप्नेमें लाभ यही है चरणदास सुखभाखो ।
योगेश्वर जापद मिलिरहिया तुरियाहित चितराखो ॥
राग बरवा ॥
या तनको कुहगर्व करतहै ओला ज्यों गलजावैरे ।
जैसे बर्तन बनो काँचको ठबकलगे बिगसावैरे ॥
झूठ कपट अरु छल बल करिकै खोंटे कर्म कमावैरे ।
बाजीगरके बांदर कीज्यों नाचत नाहिं लजावैरे ॥
३६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जबलौं तेरी देह पराक्रम तबलौं सबन सोहावैरे ।
माय कहै मेरा पूत सपूता नारी हुक्म चलावैरे ॥
पल पल पल पल पलटै काया क्षण क्षण माहिं घटावैरे ।
बालक तरुण होय फिरि बूढ़ा वृद्ध अवस्था आवैरे ॥
तेल फुलेल सुगन्ध उबटनो अम्बर अतर लगावैरे ।
नाना विधिसों पिण्ड सँवारै जरिबरि धूरि समावैरे ॥
वैद हकीम करे बहु औषध पंडित जाप सुनावैरे ।
कोटि यत्न सों बचै न क्योंहीं देवी देव मनावैरे ॥
जिनको तू अपनेकरि जानै दुख में पास न आवैरे ।
कोई झिड़कै कोइ अनखावै कोई नाक चढ़ावैरे ॥
यह गति देखि कुटुँब अपने की इन में मत उरझावैरे ।
जबहीं यमसों पाला परिहै कोई नाहिं छुटावैरे ॥
औसर खोवै परके काजे अपनो मूल गवाँवैरे ।
बिन हरिनाम नहीं छुटकारो वेद पुराण बतावैरे ॥
चेतन रूप बसै घट अन्तर भर्मभूल बिसरावैरे ।
जो टुक ढूंढ़ खोज करि देखै आपेही में पावैरे ॥
जो चाहै चौरासी छूटै आवागमन नशावैरे ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं सतसंगति मनलावैरे ॥
राग बरवा ॥
तनका तनक भरोसा नाहीं काहे करत गुमानारे ।
ठोकर लगे नेकहू चलतै करिहैं प्राण पयानारे ॥
ऐंठ अकड़ सब छोड़ बावरे तेज तमक इतरानारे ।
रंचक जीवन जगत अचम्भा क्षणमाहीं मरजानारे ॥
मैं मैं मैं मैं क्यों करताहै माया माहिं लुभानारे ।
शब्दवर्णन । ३६५
बहु परिवार देखिकै फूली मूरुख मूढ़ अयानारे ॥
टेढ़ो चलै मरोरत मुच्छैं, बिषयबास लपटानारे ।
आपनको ऊंचो करिजानै मातो मद अभिमानारे ॥
पीर फकीर औलिया योगी रहें न राजा रानारे ।
धरणि अकास सूरशशि नाशैं तेरा क्या उनमानारे ॥
ठाढ़े घातकरैं शिरपै यम ताने तीर कमानारे ।
पलक पैंड़पै तकितकिमारैं काल अचानक बानारे ॥
श्वासनिकसि फटि आंखिजाहिं जब कायाजरै निदानारे ।
तोको बांधि नरक लै जैहैं करिहैं अगिनि तपानारे ॥
अजहूं चेत सीखिले गुरुकी करिले ठौर ठिका नारे ।
अमर नगर पहिंचान सिदौसी तब नहिं आवन जानारे ॥
हरिकी भक्ति साधुकी संगति यह मत वेद पुरानारे ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं परम पुरातन ज्ञानारे ॥
राग सोरठै ॥
यह तन बालू का सा डेरा ।
जैसे दामिनि दमक चमकको क्षणनहिं रहत उजेरा ॥
मैड़ी मण्डप मुल्क खजानो अरु परिवार घनेरा ।
सो सब कौतुक सों दीखतहै राम सँभार सबेरा ॥
गज घोड़ा अरु चाकर चेरा आखिर कोई न तेरा ।
जिनके कारण भ्रर्मत डोलै करता मेरा मेरा ॥
थोड़े से जीवनके काजे बहुतक करत बखेरा ।
कालबलीकी खबरि नहीं है करहि अचानक घेरा ॥
कहैं शुकदेव समझ नर भोंदू छांड़ि विषय उरझेरा ।
चरणदास हरिनाम भजन बिन कैसे होय निबेरा ॥
३६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दम का नहीं भरोसारे करिले चलनेका सामान ।
तन पिंजरेसों निकसि जायगो पलमें पक्षी प्रान ॥
चलतै फिरतै सोवत जागत करत खान अरु पान ।
क्षण क्षण क्षण क्षण आयु घटतिहै होत देहकी हान ॥
माल मुलुक अरु सुख सम्पतिमें क्यों हूवां गलतान ।
देखत देखत बिनशि जायगो मति करु मान गुमान ॥
कोई रहन न पावै जगमें यह तू निश्चय जान ।
अजहूं समुझि छांडु कुटिलाई मूरुख नर अज्ञान ॥
टेरि चितावैं ज्ञान बतावैं गीता वेद पुरान ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं रामनाम उरआन ॥
राग काफी ॥
वह बोलता कितगया काया नगरि तजिकै ।
दशदरवाजे ज्योके त्योंहीं कौन राह गयो भजिकै ॥
सूनादेश गाँव भया सूना सूने घरके बासी ।
रूपरंग कछु औरै हूवा देहीभई उदासी ॥
साजन थे सो दुर्जन हूये तनको बांधि निकारा ।
चितासँवारि लिटाकरि तामें ऊपर धरा अँगाारा ॥
ढहगया महल चहलथी जामें मिलिगया माटी माहीं ।
पुत्र कलत्र भाइ अरु बांधव सबही ठोंक जलाई ॥
देखतहीका नाता जगमें मुये संग नहिं कोई ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं हरि बिन मुक्ति न होई ॥
समझौरे भाई लोगो समझौरे हम कहत पुकारे ।
अरे हां नहि रहना करना अन्त पयाना ॥
मोह कुटुंबके औसर खोयो हरिकी सुधि बिसराई ।