भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३८३
मतवारैं ज्यों शब्द समायौ अन्तर भीज कनी ।
भर्म्म कर्म्म के बन्धन छूटैं दुबिधा बिपति हनी ॥
आपा बिसरि जक्त को बिसरो कितरहिं पांच जनी ।
लोक भोग सुधि रही न कोई भूलो ज्ञान गुनी ॥
हो तहाँ लीन चरणहिंदासा कहैं शुकदेव मुनी ।
ऐसो ध्यान भाग्य सों पहूये चढ़ि रहे शिखर अनी ॥
राग बिलावल ॥
घट में खेलि ले मन खेला ।
सकल पदारथ घटही माहीं हरिसों होय जुमेला ॥
घट में देवल घट में जाती घट में तीरथ सारे ।
वेगहि आव उलटि घटमाहीं बीतैं परबीनहारे ॥
घट में मानसरोवर सू भर मोती और मराला ।
घट में ऊंचा ध्यान शब्द का सोहं सोहं माला ॥
घट में बिन सूरज उजियारा राति दिना नहिं सूझै ।
अमृत भोजन भोग लगंत है बिरलाजन कोइ बूझै ॥
घट में पापी घट में धर्मी घट में तपसी योगी ।
गुण अवगुण सब घटही माहीं घटमें वैद्य अरु रोगी ॥
रामभक्ति घटही में उपजै घट में प्रेम प्रकासा ।
शुकदेव कहैं चौथापद घट में पहुँचे चरणहिंदासा ॥
राग विलास ॥
घट में तीरथ क्यों न नहावो ।
इतउंत डोलो पथिक बनेही भरमि भरमि क्यों जन्म गंवांवो ॥
गोमती कर्म सुकारथ कीजै अधरम मैल छुटावो ।
शील सरोवर हितकरि न्हइये काम अग्निकी तपनि बुझावो ॥
रेवा सोई क्षमा को जानौ तामें गोता लीजै ।