भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३८१
चरणदास रास सब पावैं मिलि है बिस्वेबीस ॥
राग सोरठ ॥
अवधू ऐसी मदिरा पीजै ।
बैठि गुफामें यह जग बिसरै चंद सूर सम कीजै ॥
जहाँ कलाल चढ़ाई भाठी ब्रह्म ज्वाल परजारी ।
भरि भरि प्याला देत कलाली बाढ़ै भक्ति खुमारी ॥
माता हो करि ज्ञान खङ्ग लै काम क्रोध को मारै ।
घूमत रहै गहै मन चंचल दुबिधा सकल बिड़ारै ॥
जो चाखै यह प्रेम सुधारस निज पुर पहुँचै सोई ।
अमर होय अमरापद पावै आवागमन न होई ॥
गुरु शुकदेव किया मतवारा तीनि लोक तृण बूझा ।
चरणदास नहीं रही वासना आनँद आनँद सूझा ॥
राग सारंग ॥
पीवै कोई यह प्याला मतवारा ।
सुर नर मुनि जा मदको तरसैं गुरुबिन लहै न बारा ॥
शूदर के घर भाठी औटै ब्रह्मा अग्नि जलाई ।
शिव शोधैं अरु विष्णु चुवावैं पीवै साधु अघाई ॥
सीता प्याला भरि भरि देवैं हनूमान हंकारैं ।
व्यास शेष नारद सनकादिक किरिया नाहिं विचारैं ॥
नवधा नेम औ संयम पूजा बिसरी सब कहा कहिये ।
घूमत रहें महारस चाखे स्वर्गमुक्ति ना चहिये ॥
श्रीशुकदेव सुधारस अमृत नितप्रति अँचवन कीन्हा ।
चरणदास पर किरपा करिकै निज प्रसाद करि दीन्हा ॥