भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३७६
बिन दामन चमकार बहुतही सीप बिना लर मोती ।
दीपमालिका बहु दरसावैं जगमग जगमग ज्योती ॥
ध्यान फलै तब नभके माहीं पूरण हो गति सारी ।
चन्द घने सूरज अणकी ज्यों सू भर भरिया भारी ॥
यहतो ध्यान प्रत्यक्ष बतायो श्रद्धा होय तौ कीजै ।
कहि शुकदेव चरणहींदासा सो हमसों सुनि लीजै ॥
राग केदारा ॥
अवधू सहस दल अब देख ।
श्वेत रंग जहां पंखरी छवि अग्र डोर विशेख ॥
अमृत वरषा होत अतिझरि तेज पुंज प्रकास ।
नाद अनहद बजत अद्भुत महाब्रह्म विलास ॥
घंट किंकिणि मुरलि वाजै शंखध्वनि मनसान ।
ताल भेरि मृदंग वाजत सिन्धुगर्जन जान ॥
कालको जहाँ पहुँच नाहीं अमर पदवी पाव ।
जीति आठौ सिद्धि ठाढ़ी गगन मध्ये आव ॥
करै गुरु परताप करणी जाय पहुँचे सोय ।
चरणदास शुकदेव कृपा जीव ब्रह्मै होय ॥
राग धनाश्री ॥
सो गुरुगम इहि विधि योग कमायो ।
आसन अचल मेर कियो सीधो कसि बँध मूल लगायो ॥
संयम साधि कला वश कीन्ही मन पवना घर आयो ।
नो दरवाजे पट दै राखे अद्धूं ऊर्ध्व मिलायो ॥
नाभि तलै पैंड़ो करि पैठे शक्ति पताल गई है ।
कांप्यो शेष कमंठ अकुलायो सायर थाह दई है ॥
१ आकाश २ कछुवा ॥