सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 418, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 418

शब्दवर्णन । ३७६
बिन दामन चमकार बहुतही सीप बिना लर मोती ।
दीपमालिका बहु दरसावैं जगमग जगमग ज्योती ॥
ध्यान फलै तब नभके माहीं पूरण हो गति सारी ।
चन्द घने सूरज अणकी ज्यों सू भर भरिया भारी ॥
यहतो ध्यान प्रत्यक्ष बतायो श्रद्धा होय तौ कीजै ।
कहि शुकदेव चरणहींदासा सो हमसों सुनि लीजै ॥
राग केदारा ॥
अवधू सहस दल अब देख ।
श्वेत रंग जहां पंखरी छवि अग्र डोर विशेख ॥
अमृत वरषा होत अतिझरि तेज पुंज प्रकास ।
नाद अनहद बजत अद्भुत महाब्रह्म विलास ॥
घंट किंकिणि मुरलि वाजै शंखध्वनि मनसान ।
ताल भेरि मृदंग वाजत सिन्धुगर्जन जान ॥
कालको जहाँ पहुँच नाहीं अमर पदवी पाव ।
जीति आठौ सिद्धि ठाढ़ी गगन मध्ये आव ॥
करै गुरु परताप करणी जाय पहुँचे सोय ।
चरणदास शुकदेव कृपा जीव ब्रह्मै होय ॥
राग धनाश्री ॥
सो गुरुगम इहि विधि योग कमायो ।
आसन अचल मेर कियो सीधो कसि बँध मूल लगायो ॥
संयम साधि कला वश कीन्ही मन पवना घर आयो ।
नो दरवाजे पट दै राखे अद्धूं ऊर्ध्व मिलायो ॥
नाभि तलै पैंड़ो करि पैठे शक्ति पताल गई है ।
कांप्यो शेष कमंठ अकुलायो सायर थाह दई है ॥
१ आकाश २ कछुवा ॥