भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन ३७७
बिन ऋतु फूले फल रहत हैं अमृत फल रस पागो।
पवन गवन बिन पेवन बहतहै बिन बादर झरि लागो ॥
अनहद शब्द भँवर गुंजारैं शंख पखावज बाजैं ।
ताल घंट मुरली घनघोरा भेरि दमामें गाजैं ॥
सिद्धगर्जना अतिही भारी घुंघुरू गति झनकारैं ।
रम्भा नृत्यकरैं बिन पगसों बिन पायल ठनकारैं ॥
गुरु शुकदेवकरैं जब किरपा ऐसो नगर दिखावैं ।
चरणदास वा पग के परसे आवागमन नशावैं ॥
राग सारंग व विलावल व सोरठ ॥
साधो अजब नगर अधिकाई ।
औघट घाट वाट जहाँ बांकी उस मारग हम जाई ॥
श्रवण विना बहु वाणी सुनिये बिन जिह्वा स्वर गावैं ।
बिना नैन जहां अचरज दीखै विना अंग लपटावैं ॥
विना नासिका बास पुष्पकी विना पावँ गिरि चढ़िया ।
विना हाथ जहँ मिलो धायकै बिन पाधा जहँ पढ़िया ॥
ऐसा घर बड़भागी पाया पहिरि गुरूका बाना ।
निश्चल ह्वैकै आशा मारी मिटिगा आवनजाना ॥
गुरू शुकदेव करी जब किरपा अनभय बुद्धि प्रकासी ।
चौथे पद में आनंद भारी चरणदास जहाँ वासी ॥
राग सोरठ ॥
सो गुरु बिन वह घर कौन दिखावै ।
जिहिघर अग्नि जलै जलमाहीं यह अचरज दरशावै ॥
कामधेनु जहाँ ठाढ़ी सोहैं नैन हाथ बिन दुहना ।
धाये दूधा थोड़ा देवै भूखे दे पै दूना ॥