भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८४ चरणदासजीकाग्रन्थ ।
तन में क्रोध रहन नहिं पावै ऐसी पूजा चित्तदै कीजै ॥
सत यमुना संतोष सरस्वति गंगा धीरज धारो ।
झूठ पटकि निर्लोभ होय करि सबही बोझा शिरसों डारो ॥
दया तीर्थ कर्मनाशा कहिये परसे बदला जावै ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं चौरासी में फिरि नहिं आवै ॥
राग विभास ॥
घट में तीरथ यों तुम न्हावो ।
तिनकेन्हान अमरपद पहुँचौ आदि पुरुष निश्चय करिपावो ॥
काशी सो तत करणी कीजै कलिमल सकल नशावो ।
रहनि गहनि पुष्कर को जानौ यामें मज्जन क्यों न करावो ॥
ध्यान द्वारका दृढ़ करि परसो हितकी छाप लगावो ।
इन्द्रीजित सोइ बदरीनाथा यह गति सतकरि चिन्हमें लावो ॥
भँवर गुफा में है तिर्बेणी सुरति निरति लै धावो ।
योग युक्ति सों डुबकी लेकरि काग पलटि हंसा ह्वै जावो ॥
तन मथुरा अरु मन वृन्दावन तामें रास रचावो ।
हिरदयकमल खिले परकाशादरशन देखि अधिकहुलसावो ॥
गुरु चरणन में सबही तीरथ सिमिटि सिमिटि तहाँ आवों ।
चरणदास शुकदेव कहत हैं अपनो मस्तक भेंट चढ़ावो ॥
राग पर्ज ॥
सुधारस कैसे पइये हो ।
कूप¹ कहां केहि ठौर है कैसे करि लहिये हो ॥
नेजू कित कित गागरि कित भरने वारी हो ।
कैसे खुलै कपाट ही को ताला ताली हो ॥
कौन समै किस गृह बिषे अँचवै किन माहीं हो ।
१ कुवाँ