भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 424, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन ३८५
तुम से जानै भेद को अरु बहुतक नाहीं हो ॥
पीकरि किस कारज लगै अरु स्वाद बताओ हो ।
फल याका कहि दीजिये सब खोलि जतावो हो ॥
शुकदेव सो पूछन करें यह चरणहिंदासा हो ।
किरपा करिकै कीजिये मेरि पूरी आशा हों ॥
गुरू हमारे प्रेम पिआयो हो ।
तादिन ते पलटो भयो कुल गोत नशायो हो ॥
अमल चढ़ो गगनै लगो अनहद मन छायो हो ।
तेज पुंजकी सेज पै प्रीतम गल लायो हो ॥
गये दिवाने देसड़े आनँद दर्शायो हो ।
सब किरिया सहजै छुटी तप नेम भुलायो हो ॥
त्रैगुणते ऊपर रहूं शुकदेव बसायो हो ।
चरणदास दिन रैन-नहिं तुरियापद पायो हो ॥
राग जैजैवंती ॥
ऐसी जो युक्ति जानै सोई योगी न्यारा। आसन जो सिद्धि
करै त्रिकुटी में ध्यान धरै बिना तेल दिया बरै ज्योति हूँ
उज्यारा ॥ संयम सँभाल साधै मूल द्वार बन्ध बांधै शंखनी
उलटि साधै कामदेव जारा । प्राण वायु हिये माहीं खैंचिकै
अपान लाहीं दोऊ नीके मिलि जाहीं ऐसा खेल धारा ॥ कुँभक
अथक राखै अनहद ओर ताकै सुषमन पैठि नाकै आगे जो
विचारा । खोलि कै कपाट सिरा कोऊ चढ़ शूरवीरा कामधेनु
जावै तीरा अमी को उतारा ॥ उनमनी जाय लागै निज गृह
माहीं जागै जन्म मरण भागै छूटै जग भारा । गुरुशुकदेव
कहै करणी यही विधि लहै चरणदास होय रहै आप को
सँभारा ॥