भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
योग युक्ति करि लेहि हेली जो चाहै हरिसों मिलो ।
आसन संयम साधि कैरी गगनमंडल करि गेह ॥
उलटी दृष्टि चढ़ाइयेरी होय सूरज परकाश ।
करम भरम सबही जरैं सहजछुटै जग आश ॥ १ ॥
प्राण अपान मिलायकेरी मूलबन्धको बांधि ।
रसना उलटि लगाइये सुरति उर्ध्व को साधि ॥ २ ॥
बङ्क सुधारस पीजिये अनहदहो गलतान ।
भँवर गुफा दृढ़ बैठिके शून्य शिखर को ध्यान ॥ ३ ॥
सुषमन मारग ह्वै चलौरी जब पहुँचौ निजधाम ।
अचल सिंहासन श्वेत है जहां विराजैं राम ॥४॥
यह साधन शुकदेव कीरी जो कोई जानैं साध ।
चरणदास अविगति लहै देखै खेल अगाध ॥ ५ ॥
अथ वैराग का अंग ॥
राग मंगल ॥
चला चली जगठाट अचल हरिनाम है ।
माल मुल्क चलि जाय जाय रज धाम है ॥
तेल फुलेल लगाय बहुत सुन्दर गए ।
नानाकरते भोग सोभी नर ना रहे ॥
तेज तमक और रूप जाय योवन धना ।
सकल बराती जायँ जायँ दुलहिनि बना ॥
रोगी रोग अरु वैद्यजाय औषधि भले ।
ज्योतिषपुस्तक तूट बिनस रज हो मिले ॥
ज्ञानी पण्डित पीर अधिक बेवश गले ।