भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 428, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३८६
गौस कुतुब अब्दाल पैगम्बर सब चले ॥
एकके पीछे एक बहीर लगी चली ।
नरपति सुरपति जाहिं अन्त वाही गली ॥
ऋषिमुनि देवन सिद्ध योगेश्वर जाहिंगे ।
जिन वश कीन्हीं मौत सोभी न रहाँहिंगे ॥
पांच तत्त्व गुणतीनि नहीं ठहराहिंगे ।
स्वर्ग मृत्यु पाताल सभी रलि जाहिंगे ॥
धरती अम्बर जाय जाय शशि भान है ।
चरणदास शुकदेव दया लियो जान है ॥
रहै रामका नाम जपै सोभी रहै ।
वेद पुराणन माहिं सभी योंहीं कहै ॥
जन्म मरण नहिं होय न योनी आवई ।
सतसिंहासन बैठि अमरपुर पावई ॥
यम जालिमके दण्ड भर्म छुटिजाहिंगे ।
लखचौरासी बन्ध सबी कटिजाहिंगे ॥
नवग्रह लगे न देह गेह आनँद रहै ।
डाकिनि सर्पिनि सिंह भूत नाहीं दहै ॥
साधुसंग गुरुसेव आय घटमें वसै ।
कलह कल्पना जाय द्वन्द्व संकट नसै ॥
तिलक दिये लिलाट जु कण्ठी सोहनी ।
नौबिस लक्षण धारि सहज जीतै मनी ॥
ऊंची पदवी होय जगत सब पगलगै ।
दुष्ट जलैं मनमाहिं दूरिही सों तकैं ॥
पाप भगैं मुखदेखि दरश कोई करै ।