भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
उलटि चले मठ फोरि इकीसौ गये अभय पद माहीं ।
अति उजियारो अद्भुत लीला कहन सुनन गम नाहीं ॥
जित भयेलीन सबै सुधि बिसरी छूटी जगत बियाधा ।
चरणदास शुकदेव दयासों लागी शून्य समाधा ॥
सो साधो ऐसी योग युक्ति गति भारी ।
मूलहि बंध लगाय युक्ति सों मूंदि लई नौनारी ॥
आसन पद्म महादृढ़ कीन्हो हिरदय चिबुकै लगाई ।
चंद सूर दोउ सम करि राखे निरति सुरति घर आई ॥
ऊपर खैंचि अपान सहज में सहजै प्राण मिलाई ।
पवन फिरी पश्चिम को दौरी मेरुँहि मेरु चलाई ॥
ऐसेहि लोक अमर पद पहुँचे सूरज कोटि उज्यारी ।
श्वेत सिंहासन सतगुरुपरशे करि दरशन बलिहारी ॥
आपा बिसरि परम सुख पायो उनमनी लागी तारी ।
चरणदास शुकदेव दया सों जन्म मरण छुटि बारी ॥
राग मलार ॥
वा पद रामसों करि नेह ।
विषकी बूंद न पह्ये जित हां बरषत अमृतमेह ॥
चमकत बिजुली गरजत गगना बाजत अनहद घोर ।
यहमन थकत गलतजित पाँचौ मिटिहैं निशि अरुभोर ॥
जाग्रत मिटि है स्वप्नौ मिटि है मिटिहु सुषोपत जाय ।
षट ऋतु पह्ये नाहिंन अवधू एकहि रस दर्शाय ॥
बिनहीं जोते बिनहीं बोये उपजत खेत है धीर ।
लागत अचरज फल महँ मुक्ता बिनहीं सींचे नीर ॥
राजा गुरु शुकदेव न बांटै सबहि करैं बकसीस ॥
१ दाढ़ी २ मेरुदंडनाड़ी वह है जो पृष्ठभाग से सीधी शिरतक चलीगई है।