भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 425, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
राग सोरठ व सारंग ॥
पांचन मोहि लियो बलिमा ।
नासा त्वचा और श्रवणीया नैनन अरु रसना ॥
एक एक ने बारी बांधी गहि गंहि लै लै जाहिं ।
निशिदिन उन्हीं के रस पागो घरमें ठहरतं नाहिं ॥
अलि पतंग गज मीन मृगा ज्यों होय रह्यो पराधीन ।
अपनो आप सँभारत नाहीं विषय वासना लीन ॥
हौं कुलवन्ती टोना सीखो अनहद सुरति धरूं ।
गगन मँडल में उलटा कूंवां तासों नीर भरूं ॥
भँवर गुफा में दीपक बारौं मन्तर एक पढूं ।
काम क्रोध मद लोभ मोहकर लालन चित्त हरूं ॥
यतन यतन करि पीव छुटाऊं फिर नहिं जाननदूं ।
चरणदास शुकदेव बतावैं निज मनहीं करलूं ॥
राग सोरठ ॥
तू सदा सोहागिनि नारी है ।
पियके संग मिली मद् पीवै ताते लागत प्यारी है ॥
भँवरगुफा में भँवनबनावो बिन घृत ज्योती जारी है ।
सुषमन सेज महा सुखदायी भोगत भोग दुलारी है ॥
वशकियो कंथा चलै न पंथा टोनाडारो भारी है ।
आठ पहर तुम्हरे रँग राचो हमको मिल न वारी है ॥
पति मनमानी सो पटरानी सोई रूप उजारी है ।
हम चारौ जो सौति तुम्हारी तुम गुणआगे हारी है ॥
चरणहिंदास भई त्वहिं सेवैं लगीरहै नितलारी है ।
शुकदेवा शिर छत्र हमारो सो वशभयो तुम्हारी है ॥