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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

शब्दवर्णन । ३५६
नवल लाड़िलो मोहन सोहन सोई वर वरलीन्होरी ॥
प्रभुको छांड़ भजूं औरनको तौ कहियो बुधिहीनौरी ।
चरणदासको है सुखदायी श्यामसुंदर रँगभीनोरी ॥
वा मुरलियाने हेली मेरे प्राणहरे ।
जब वाजत पियके मुख लागी सुनि धुनि तनकी सुधि बिसरे ॥
ऐसो जप तप कहा कियो है मोहन सोहनलाल बरे ।
जाके रसबस भये श्यामजी ताबिन पलछिन कल न परे ॥
तीनलोक बिच धूम मचाई सुर मुनि ऋषि के ध्यानटरे ।
चरणदास शुकदेव दयासों मनवांछित सब काजसरे ॥
वा मुरलियाके बोल मेरे हिये कसकै ॥
बाजत मान गुमान गरवले करि राखो हरिकों बसकै ॥
बाँकी तान वान ज्यों लागत चुभत कलेजे में धसकै ।
नेक न होत पिया सों न्यारी अधरन के रसके चसकै ॥
कहाकरूं कुछ यतन न दीखै कोई उपाय न होयसकै ।
चरणदास शुकदेव पियारे कवहूँतो वोलेंगे हँसकै ॥
वंशीवारे तू साडी गली आ जावो ।
तैंडे कारण भई बावरी टुक मुख छवि दिखला जावो ॥
व्याकुल प्राण धरत नहिं धीरज तनकी तपत सिरा जावो ।
चरणदास तलफत दर्शन विन शुकदेव दुःख मिटा जावो ॥
राग परज ॥
तुम्हारे रूप लोभानी हो ।
जाति बरन कुल खोयके भइ प्रेम दिवानी हो ॥
खान पान सब सुधि गई और अकबक बानी हो ।
तुम्हरे चरण कमल मन मेरो रहो लिपटानी हो ॥
सुन्दर सूरति सोहनी मेरे नैन समानी हो ।
२५

३६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तुम बिन चैन नहीं दिन राती सुनि पिय जानी हो ॥
दरश दिखावो साँवरे जब हिये सिरानी हो ।
नातर वह गति है है हमरी मीन ज्यों पानी हो ॥
सुख देवो दुख सब हरो काहे बिसरानी हो ।
चरणदासि यह सखी तिहारी मिलजा छानी हो ॥
राग विहागरा ॥
सुधि बुधि सब गई खोयरी मैं इश्क दिवानी ।
तरफतहूँ दिन रैन सखीरी जैसे जल बिन मीननी ॥
बिन देखे मोहिं कल न परत है देखत आंख सिरानी ।
सुधि आये हिय में दव लागै नैनन वर्षत पानी ॥
जैसे चकोर रटत चन्दा को जैसे पपीहा स्वाती ।
ऐसे हम तरफत पिय दर्शन विरह व्यथा इहिभांती ॥
जबते मीत बिछोहा हूवा तबते कछु न सुहानी ।
अंग अंग अकुलात सखीरी रोम रोम मुरझानी ॥
बिन मनमोहन भवन अंधेरो भरि भरि आवै छाती ।
चरणदास शुकदेव मिलावो नैन भये मोहिं घाती ॥
भईहूं प्रेममें चूरहो मोहिं दरशन दीजै ।
हूं तो दासि तिहारी मोहन बेगि खबरिआ लीजै ॥
ज्ञान ध्यान और सुमिरन तेरो तो चरणन चित राखूं ।
तेरोहि नाम जपूं दिन राती तो बिन और न भाखूं ॥
तन व्याकुल जिय रूंधोहि आवत परी प्रीति गलफांसी ।
तुमतो निठुर कठोर महा पिय तुमको आवै हांसी ॥
विरह अग्नि नख शिख सूं लागी मन में कल्पना भारी ।
गिरोहि परत तन सँभरत नाहीं रहत भवन में डारी ॥
कै विष खाय तजों यह काया कै तुम्हरे सँग रहसूं ।

शब्दवर्णन । ३६१
चरणदास शुकदेव बिछोहा तेरी सूं नहिं सहसूं ॥
राग कान्हड़ा ॥
तुम बिन अति व्याकुल भइयाँ ।
मोहूंकों दर्श दिखावरे मोहन प्यारे ।
चितवन नैन हँसन दसनन की अटक रही हिय महयां ॥
वह लटकन मटकन चटकन पट मोरमुकुट की छविछइयां ।
अधर मधुर मुरली सुर गावत टेरि बुलावत गइयां ॥
हाहा खाऊं शीश नवाऊं और परूं तोरे पइयां ।
वारीहूं वारी मुख ऊपर दोउ कर लेहुँ बलइयां ॥
अब तौ धीर रहो नहिं रंचक हो शुकदेव गुसइयां ।
चरणदासी भइ प्रेम बावरी आनि गहो क्यों न बहियां ।
राग पर्ज ॥
तुम बिन कैसे जीऊं प्यारे नँदलाल ।
भूख प्यास कछु लागत नाहीं तन की सुधि न सँभाल ॥
कल न परत कल कल अकुलावौं छिन छिन छिन बेहाल ।
विरह व्यथा को रोग बढ़ो है पीर महा बिकराल ॥
कहा री करूं कित जाऊंरी सजनी को मेटै जंजाल ।
लटक चलन बाँकी चितवन की चुभत कलेजे भाल ॥
भइ ऐसे यह देह दूबरी सूझ परो नस जाल ।
तरफत हूं हिय में दव लागी नैना बरत मशाल ॥
चरणदासी यह सखी तिहारी हो शुकदेव दयाल ।
आय कृपा करि दर्शन दीजै कीजै वेगि निहाल ॥
राग बिलावल ॥
लागीरी मौहनसों डोरी ।
आनि कानि कुलकी तजि दीन्ही कोऊ कैसी बात कहोरी ॥

भक्ति-पदारथ, ब्रह्मज्ञान, अमरलोक एवं पञ्चोपनिषद् भाषा

३६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
श्याम सलोने के रँगराती मगन भई कोइ परी ठगोरी ।
निरखत छवि तनकी सुधि बिसरी प्रेम प्रीति रसमें भइ वौरी ॥
ऐसो रूप उजारो प्यारो शोभा वर्णत शेष थकोरी ।
तीनि लोक ब्रह्माण्ड सकल सब जाकी मायासों दरशोरी ॥
कान कुण्डल गलमाल बिराजै शीश मुकुट माथे तिलक फंबोरी ।
नखशिख भूषण कर लिये लकुटी कांधे सोहै पीत पिछोरी ॥
कल न परत निशि दिन बिन देखे रोम रोम मेरे वही रमोरी ।
कान्ह सुजान सदा सुखदायी चरणदास के हिये बसोरी ॥
राग झँझोटी ॥
आया मैंडा मोहन मदनगोपाल ।
मानौ रङ्क अष्टसिधि पाईं निरखत भई निहाल ॥
बलिबलि जांदियां अँगन समांदियां मोहिं दरश दियोलाल ।
कोटि भानु छवि मुखपर वारूं बदा सोहै भाल ॥
अद्भुत रूप अनूप सांवरो सुन्दर नैन विशाल ।
घूँघरवारी अलकैं झलकैं चिकने लंबे बाल ॥
चितवत तीषी भौंह मरोरत कर लिये वेणु रसाल ।
गावत तान आनि बांकी सों चलत अनोखी चाल ॥
श्रीशुकदेव दया के सागर नटनागर नँदलाल ।
चरणदास को किरपा करिकै रीझ दई उरमाल ॥
राग काफी ॥
लटकरी चालपै मैं वारी-वारी जांदियां ।
रैन दिना सानूं ध्यान 'तुसाडो मन वच के हूँदी बांदिया ॥
कुण्डल कान मुकुट शिर सोहै शोभा अधिक सुहाँदियां ।
अलबेली छवि बाँके नैना निरखत नैन लुभाँदियां ॥

जब बाजी प्यारे तेंडी बंशी खान पान बिसरा दियां ।
भूलगई घर काज साज सब लाज छोड़ उठआदियां ॥
चरणदासी हम भई तिहारी फूली अंगन समादियां ।
राखि शरण शुकदेव पियारे चरणकमल लिपटादियां ॥
कोई समझावोरी मोहनलालकूं ।
ग्वालबाल सबही सँग लेकर सूने घर धँसिआवै ।
याकी घाली मोरी आली माखन रहन न पावै ॥
लेकर मटुकी चटदे झटकै गटकै माखन सारो ।
चटपट चाटपोंछ धरि पटकै नट ज्यों सटकै प्यारो ॥
जबहीं जाँव गगरिया भरने ठाढ़ो रहै बिहारी ।
आगे आकर कांकर मारे भीजै मोरी सारी ॥
जो अपने घर बठिरहूं तो अँगना धूम मचावै ।
जो कवहूँकै सोऊं सजनी स्वप्ने में दर्श दिखावै ॥
मेरे पीछे लांगो आली जित जाऊं तित डोलै ।
कहाँ लगि कहूँ ढीठता वाकी बात अटपटी बोलै ॥
बांको छैल महाँलबेलो प्रकट्यो है ब्रज माहीं ।
चरणदास शुकदेव पियारो सदा रहौ या ठाहीं ॥
कोइ आनि मिलावोरी श्याम सुजान को ।
नन्ददुलारो मोहन सोहन अजब अनोखो छैला ।
मदनगुपाल मुकुन्द मुरारी मेरो जीवनप्रानरी ॥
नैनन नींद न आवै सजनी कल न परै दिन रैना ।
व्याकुल भई फिरतहूँ बौरी भूली खान अरु पानरी ॥
जोकोउ हित ह्वैहै मेरो आली लालनकी सुधिलावै ।
दर्श दिखाय हरै सब बांधा मोको दे जीदानरी ॥
छिन छिन छिन, गति और होत हैलगो बिरहको बानरी ।

३६४ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।

चरणदास की पीर मिटावैं सुन्दर सुखके निधानरी ॥
राग सोरठ ॥
हमारे घर आयेहो सुन्दर श्याम ।
तनकी तपन मिटी देखतही नैनन भयो अराम ॥
अँगन लिपाऊं चौक पुराऊं फूल बिछाऊं धाम ।
आनँद मंगलचार गवाऊं ⌞ हूये पूरणकाम ॥
अब जागे सखि भाग हमारे मन पायी विश्राम ।
चरणदास शुकदेव पियाकुं हितसों करूं प्रणाम ॥
सो अब घर पाया हो मोहनप्यारा ।
लखो अचानक अज अविनाशी उघरि गये दृगतारा ।
झूमरहो मेरे आंगन में टरत नहीं कहुं टारा ॥
रोम रोम हिय माहीं देखो होत नहीं छिन न्यारा ।
भयो अचरज चरणदास न पहुंये खोज कियो बहुबारा ॥
वह घरी कौनसी लागे मोरे नैना ।
छोटी उमर भोलापन भारी जानूं एक न बैना ॥
जब लागे तब कछून जानी अबलागे दुख दैना ॥
चरणदास शुकदेवकुँ देखै तब पावै सुख चैना ॥
राग मलार ॥
सो बिथा मोरी जानत होअ कि नाहीं ।
नखशिख पावक विरह लगाई बिछुरन दुख मनमाहीं ॥
दिननहिं चैन नींद नहिं निशिकूं निश्चल बुधि नहिंमेरी ।
कासूं कहूं कोउ हितु न हमारो लग्न लहरि हरि तेरी ॥
तन भयो क्षीन दीन भये नैना अजहूं सुधि नहिं पाई ।
छतियां धरकत कर्क हिये में प्रीति महा दुखदाई ॥
जल बिनमीन पियाबिन बिरहिनि इन धीरज कहुकैसी ।

शब्दवर्णन ३६५

पक्षी जरै दवलगी वन में मेरी गति भई ऐसी ॥
तरफतहूँ जिय निकसत नाहीं तनमेंअतिअकुलाई ।
चरणदास शुकदेव बिनायों दर्शन द्यौ सुखदाई ॥
राग सोरठ ॥
हमारे नैना दर्श पियासाहो ।
तनगयो सूखि हाय हियबाढ़ी जीवतहूँ वहिआसाहो ॥
बिछुरन थारो मरण हमारो मुखमें चलै न गासा हो।
नींद न आवै रैनि बिहावै तारे गिनत अकासाहो ॥
भये कठोर दर्श नहिं जानो तुमकूं नेकन सांसाहो ।
हमरीगति दिनदिन औरेहीविरह बियोग उदासाहो ॥
शुकदेव पियारे मत रहु न्यारे आनि करो उर बासाहो ।
रणजीता अपनोकरिजानो निजकरि चरणनदासाहो ॥
ऊधोजी कहां रहे भगवान ।
हम जानी काहूने मोहे मोहन चतुर सुजान ॥
तबसूं नैनन नींद न आवै धीरज धरत न प्रान ।
उमगि उमगि हियरो हुलसत है वह सुन्दर मुसकान॥
योग कथा तुम काहि सुनावां हमकूं नाहीं ज्ञान ।
प्रेम प्रीति की रीति अनोखी कापै होत बखान ॥
ऐसो हितू न कोऊ देखो जाय सुनावै कान ।
बाढ़ी व्यथा बिरहकी तन में सुधिलो कृपानिधान ॥
आवो दर्श दिखावो प्यारे देहु हमें जी दान ।
चरणदास शुकदेव श्याम बिन तज्योंखान अरु पान ॥
राग सारंग ॥
ऊधो क्या जानै हमरे जीवकी ।
चातक बूंद चकोर चन्दकूं ऐसे हमकूं पीवकी ॥

.३६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नेह कमान बिलुरकै खैंची मारि गये हरि तीरकी ।
भाल वियोग हिये बिच खटकै सुधिन लई या पीर की ॥
चरणदाससखिनिशिदिनतलफैंज्यों मछली बिन नीरकी।
कहैं कुछ और करें कुछ औरे आखिर जात अहीर की ॥
रेखता ॥
फ़रज़न्द नन्दजी का दिल बीच भावदाँ ।
बरपायँ खूब नूपुर सुन्दर सुहावदाँ ॥
वह सांवला सलोना महबूब यार मन ।
आहिस्ता लटक चाल मटक मेरे आँवर्दों ॥
टीका संदलका खैंचिकै माथे पै अदासों ।
बरसर बिराजै अफ़सरे हीरे जरावदाँ ॥
कुण्डल झलकते हैं दर हर दो गोश में ।
आवाज़ बांसुरीकी शीरीं बजावदाँ ॥
नीमा ज़री का गलमें कटि काछनी बनी ।
पीले दुपट्टे वाला बीड़े चबावदाँ ॥
करता है नृत्य नादर घुँघुरू कि झनकसों

शब्दवर्णन । ३६७
कंचन खंभ जटित हीरनसों नग लागे तामाहिं ।
पटुली अधिक अनूपम सोहै डोरी सुरंग सुहाहिं ॥
चहूँओर बदरा घेरिआये उमड़ घुमड़ गहराहीं ।
गरजत मेघ पवन झकझोरत दामिनि दमक दुराहीं ॥
गावत गीत मलार सहेली मिल मिल दै दै तार ।
झोंटा देत विशाखा ललिता आनंद बढ़ो अपार ॥
बोलत मोर पपीहा कोयल दादुर हंस चकोर ।
हरी भूमि ऋतु भई सुहाई भौंर करत अतिशोर ॥
भीजत रंगरंगीले प्यारे शोभा कही न जाय ।
चरणदास शुकदेव श्यामकी दोउ कर लेत बलाय ॥
झूलत कोइ कोइ संत लगन हिंडोलने ।
पौन उमाह उछाह धरती शौच सावन मास ।
लाजके जहाँ उड़त बगले मोर हैं जगहास ॥
हरष शोक दोउ खंभ रोपे सुरत डोरी लाय ।
बिरह पटरी बैठि सजनी उमंग आवै जाय ॥
सकल विकल तहाँ देत झोंके विपति गावनहार ।
सखी बहुतक रंगराती रँगी पाँचौ नार ॥
नैन बादल उमगि बरसें - दामिनी दमकात ।
बुद्धिको ठहराव नाहीं नेह की नहि जात ॥
शुकदेव कहैं कोई बली झूलै शीश देत अकोर ।
चरणदासा भये बौरे जति वरण कुल छोर ॥
हेली ॥
मो बिरहिन की बात हेली बिरहिन होय सोइ जानिहै।
मैंन बिछोहा जानतीरी अरीहेली बिरहैं कीन्हो घात ॥
या तनकुं बिरहा लगोरी अरीहेली ज्यों घुनलागो काठ।

३६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
निशि दिन खाये जात है देखूं हरि की बाट ॥
हिरदे में पावक जलैरी अरीहेली ताप नैनाभये लाल ।
आंसू पर आंसू गिरैं यही हमारो हाल ॥
प्रियतमबिन कलनापरैरी अरीहेली कलकल सबअकुलाहिं ।
डिगीपरूं सत ना रहो कब पिय पकरैं बाहिं ॥
गुरु शुकदेव दया करैं री अरीहेली मोहिं मिलावैं लाल ।
चरणदास दुख सब भजैं सदारहूं पति नाल ॥
तरसैं मेरे नैन हेली राममिलन कब होयगो ।
पिय दर्शनबिन क्यों जिऊंरी अरीहेली कैसे पाऊं चैन॥
तीर्थ बर्त बहुतै कियेरी अरीहेली चितदै सुने पुरान ।
बाट . निहारतही रहूं छांड़ दई कुलकान ॥
लगी उमाहेही रहूँरी अरीहेली सुधि नहिं लीनी आय ।
यह योबन योंही चलो चालो जन्म सिराय ॥
बिरहादल साजेरहैरी अरीहेली छिन छिन में दुखदेह ।
मन लालन के वश परो भई भाखसी देह ॥
गुरु शुकदेव कृपा करोजी अरीहेली दीजै बिरहछुटाय ।
चरणदास पियसूं मिलैं शरण तुम्हारी धाय ॥
तिनकूं कछुन सोहाय हेली प्रीतिलगी घनश्यामसूूं ।
जो सुखहै संसारकेरी अरीहेली सो सब दिये बहाय ॥
भवनतजोअरुधनतजोरीअरीहेलीतजीकुलनकीरीत ।
मान बड़ाई सब तजी रहा एक हरि मीत ॥
भूखप्यासनिद्रातजीरीअरीहेलीतजिदियोवादविवाद ।
राग दोष दोऊ तजे तजो पाँच को स्वाद ॥
बहुत डरै सकुची रहैरी अरीहेली कहै न काहू बात ।
लगी रहै हरि ध्यान में ऐसे रैनि बिहात ॥

शब्दवर्णन । ३६६
श्रीशुकदेव भले कहीरी अरीहेली बारम्बार सँभार ।
चरणदासहो श्याम की वही निबाहनहार ॥
मोमन कछु न सुहाय हेली प्रीतिलगी प्यारेलाल सूं ।
हँसिहँसिकै टोना कियोरी अरीहेली दैगयो मुरली गहाय ॥
जबहीं सूं चेटक लगोरी अरीहेली ढूंढूं कुंजनमाहिं ।
बौरीहो दौरौ फिरूं वह छवि दीखै नाहिं ॥
मोहिं मिलावै सांवरोरी अरीहेली ताके बलि बलि जावैँ ।
जन्म जन्म दासी रहूं कबहुं न छोड़ों पावैँ ॥
है कोइ पूरी रामकीरी अरीहेली मोहिं बतावै ठौर ।
जहाँ बिराजै श्यामजी वह बड़भागी पौर ॥
चरणदास घायल भईरी अरीहेली मोहन मारो बान ।
श्रीशुकदेव दिखाइये मेरो जीवन प्रान ॥
वह छवि करूं बखान हेली जा छावसौं नैनालगे ।
हितू देखि तोसूं कहूँरी अरीहेली और न पावैं जान ॥
मोर मुकुट माथे दियेरी अरीहेली कुण्डल सरवन माहिं ।
अलकें बल खाई रहें योगी देखि लुभाहिं ॥
भौंहन मधि बेंदा दिपेरी अरीहेली सुन्दर नैन विशाल ।
मोतीनासा सोहनो अरु बैजन्ती माल ॥
नीमोअङ्ग पीरो खुभोरी अरीहेली घूम घुमारो फेर ।
लाल खराऊं पावँ में मोमन राखत घेर ॥
पहुंचन में पहुंची कड़ेरी अरीहेली अँगुरिन मुँदरीछाप ।
अधरनपै मुरली धरे गावत रीझत आप ॥
चरणदास तिनकी भईरी अरीहेली तनमन डारोवार ।
गुरु शुकदेव सराहिया बुरो कहै परिवार ॥
बंशीबट की छांहिं हेली लाल लाड़िली मैं लखे ।

३७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दोउ खड़े गावैं हँसैं री अरीहेली अरु डारे गलवाहिं ॥
मोर मुकुट माथे दिपेरी अरी हेली सुन्दर नैन विशाल ।
पीताम्बर पट सोहनो कर मुरली उरमाल ॥
वाके विराजैं चन्द्रिकारीअरीहेली लीलवसन जरतार ।
नखशिख भूषण सोहने अरु फूलनके हार ॥
गुरु शुकदेव बताइयारी अरीहेलीजवहमलिये पिछान ।
चरणदासी तिनकी भई लगोरहै वहि ध्यान ॥
अथ सन्त शूरका अंग ॥
दो० सन्त समान न शूरिमा, कहैं रणजीत विचार ।
टेक गहैं सम्मुख चलैं, बांधि प्रेम हथियार ॥
राग सोरठ ॥
सन्त समान नहीं कोई शूरा ।
मोह सहित सब सेना मारी ऐसो साँवत पूरा ॥
क्षमा कि ढाल गही कर अपने बांधे सत तरवारा ।
कर्म भर्म के दलको पेलै पल पल वारंवारा ॥
सुरत को तीर हृदय को तरकस ध्यान कमान बनावै ।
प्रेमहाथ सूं खैंचनलागे चोट निशाने लावै ॥
बुद्धि विवेक कटारी बांधै वचन विलास की बरछी ॥
सतपुरुषों के हियरे बेधै कहिकहि बतियां तिरछी ॥
चितमें चाव चौगुनो उनके सुन सुन अनहद तूरा ।
अगम पंथसों पग न डिगावै होयजाय चकचूरा ॥
मन हुलास आसधर पीकी सुन्न खेत में धावै ।
चरणदास शुकदेव कहतहैं अमर लोक पद पावैं ॥
राग सोरठ वा आसावरी ॥
साधू- पैज गहै सोइ शूरा ।

शब्दवर्णन । ३७१
काके मुख पर नूर है जब बाजै मारू तूरा ॥
कलँगी अरु गजगाह बनावै इसका परन दुहेला ।
सांवत भेष बनाय चलत है यह नहिं सहज सुहेला ॥
या बानेको नेम यही है पगधरि फिरि न उठावै ।
जो कछुहोय सो आगेहि आगे आगेहीं को धावै ॥
रणमें पैठि झड़ाझड़ खेलै सम्मुख शस्तर खावै ।
खेत न छोड़ै हाई जूझै तबहीं शोभा पावै ॥
गुरु शुकदेव दियोहै हेला ऐसा होय सो आवै ।
चरणदास बाना संतन का तौले शीश चढ़ावै ॥
साधौ टेक हमारी ऐसी ।
कोटि जतन करि छूटै नाहीं कोउ करौ अब कैसी ॥
यह पग धरो संभाल अचल हो बोल चुके सोइ बोली ।
गुरु मारगमें लेन न दीन्हो अब इत उत नहिं डोली ॥
जैसे शूर सती अरु दाता पकरी टेक न टारैं ।
तन करि धनकरि मुख नहिं मोड़ैं धर्मन अपनो हारैं ॥
पावक जारो जल में बोरो टूक टूक करि डारो ।
साध संगति हरि भगतिन छाँडूं जीवन प्राण हमारो ॥
पैज न हारूं दाग न लागे नेक न उतरै लाजा ।
चरणदास शुकदेव दयासूं सबविधि सुधरे काजा ॥
राग सारंग ॥
हमारे राम नामकी टेक टारी ना टरै ।
लाखकरो कोइ कोटि करोजी काहूतैं कुछ ना सरै ॥
ज्यों कामीकूं तिरिया प्यारी ज्यों लोभी को दाम ।
अलमदार कूं अमल पियारो ऐसे हमकूं राम ॥
दुष्ट छुटावै गहि गहिकै पकरों हारिलकी लकड़ी भई ।

३७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अब कैसे करि छूटै मोसों रोम रोम तन मन मई ॥
ज्यों प्रहलाद पैज दृढ़ कीन्ही हरणाकुश से बहुअरे ।
उबरोसंत असुर गहिमारो परगटहो हरि आखरे ॥
गुरु शुकदेव सहाय करि है अब पग पाछे क्यों परै ।
चरणहिदास वचन नहिं मोड़ै सूरसती मूये टरै ॥
साधौ टेकगई जाको सबगयो ।
लाजगई अरु काजगये सब वचन धर्म कछु ना रह्यो ॥
जगमें हांस फांस हियमाहीं कायरपन यों दहिगयो ।
अब पछिताये होत कहा है वह पानपतेरो बहिगयो ॥
पैज तजी मुखकारो हूवो धिक धिक जीवन तासको ।
बोझगयो ओछेकी संगति यह प्रताप कुबासको ॥
चरणदास शुकदेव कहै यों टेक न देवो शिर देवो ।
बार बार नर देहन पइये अपयश जगमें क्यों लेवो ॥
राग सोरठ ॥
साधौ भेष वही जामें टेक है ।
टेक नहीं तौ कहा भरोसो टेक विना नरतेकहै ॥
टेक विना कैसी सतवंती टेक विना नहिं सूरमां ।
टेक विना दाता भी नाहीं टेक विना योगी बूबना ॥
टेक विना नहिं भक्ता हरिको टेक विना नहिं सिद्धिहै ।
टेक विना सब भ्रर्मत डोलैं टेक विना नहिं ऋद्धिहै ॥
साधु संत अरु वेद कहत हैं टेक पकरि चढ़ु धाम कूं ।
चरणदास शुकदेव बतावैं टेक मिलावै राम कूं ॥
साधौ जो पकरी सो पकरी ।
अब तौ टेक गही सुमिरण की ज्यों हारिल की लकरी ॥
ज्यों शूरा ने शस्तर लीन्हो ज्यों बनिये ने तखरी ।

शब्दवर्णन । ३७३
ज्यों सतवंती लियो सिंधौरा तार गह्यो ज्यों मकरी ॥
ज्यों कामी कूं तिरिया प्यारी ज्यों किरपिणकूं दमरी ।
ऐसे हमकूं राम पियारे ज्यों बालककूं ममरी ॥
ज्यों दीपककूं तेल पियारो ज्यों पावककूं समरी ।
ज्यों मछलीकूं नीर पियारो बिछुरे देखै यमरी ॥
साधौ के संग हरिगुण गाऊं ताते जीवन हमरी ।
चरणदास शुकदेव दृढ़ायो और छुटी सब गमरी ॥
अरे ले गुरुके बचन चितधररे ।
छिन छिन तेरी आय घटत है बेगि सँभारो घररे ॥
शील क्षमायत दृढ़करि राखो गरब गुमान निवारो ।
पांचौइन्द्री वशकरि अपने मन गनीम को मारो ॥
काया कोटि बुहारि युक्तिसूं सतसिंहासन धरिये ।
तापर बैठि अमर पदवी लै राज अभैपुर करिये ॥
सबपर अमल चलै जब तेरो तो सम और न कोई ।
सेवक साहिब लोहा कञ्चन बूंद समुन्दर होई ॥
विघ्न कलेश आपदा नाशै निर्मल आनंद पावै ।
चरणदास शुकदेव दयासूं रहनि गहनि समुझावै ॥
जब गुरुशब्द नगारे बाजैं ।
पांच पचीसों बड़े मवासी सुनिकै डंका भाजैं ॥
दृढ़ दस्तकले ज्ञान सजावल जाय नगर के माहीं ।
हरि के धाम भजन करि मांगै चित्त चौधरी पाहीं ॥
कानोगोय लोभ के खोटे छलबल पाहीं झूठे ।
काम किसानरु मोह मुकद्दम सबै बांधिकरि लूटे ॥
तृष्णा आमिल मदको मातो पकरि गांवसूं काढै ।
मन राजाको निश्चल झण्डा प्रेमप्रीतिहित गाड़ै ॥

३७४ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
सुबुधि दिवान शीलको बक्सी यतको हाकिम भारी ।
धर्म्म कर्म्म सन्तोष सिपाही जाके आज्ञाकारी ॥
सांच करिन्दा पटवारी धीरज नेम बिचारै ।
दया क्षमा अरु बड़ी दीनता पूरी जमा सँभारै ॥
मगन होय चौकस कण करिकै सुमति मेवड़ी मांपै ।
दर्शन द्रव्य ध्यानको पूरण वांटापावै आपै ॥
श्रीशुकदेव अमल करिगाढ़ो सूवस देश बसावै ।
चरणदास हूं तिनको नायव तत परवाना पावै ॥
जोनर इकछत भूप कहावै ।
सतसिंहासन ऊपर बैठे यतही चँवर दुरावै ॥
दया धर्म्म दोउ फौज महालै भक्ति निशान चलावै ।
पुण्य नगारा नौबति बाजै दुर्जन सकल हलावै ॥
पाप जलाय करै चौगाना हिंसा कुबुधि नशावै ।
मोह मुकद्दम काढ़ि मुलकसों लावै राग बसावै ॥
साधन नायब जित तित भेजै दे दे संयम साथा ।
राम दुहाई सिगरै फेरै कोइ न उठावै माथा ॥
निर्भय राजकरै निश्चल है गुरु शुकदेव सुनावै ।
चरणदास निश्चयकरि जानौ बिरलाजन कोइपावै ॥
राग कल्याण ॥
वह राजा सो यह विधि जानै । काया नगर जीतिबो ठानै ॥
काम क्रोध दोउ बल के पूरे । मोह लोभ अति सांवत शूरे ॥
बल अपनो अभिमान दिखावै । इनको मारि राहगढ़ धावै ॥
पांचौ थाने देह उठाई । जब गढ़में कूदै मनलाई ॥
ज्ञान खङ्ग लै द्वन्द मचावै । कपट कुटिलता रहन न पावै ॥
चुनि चुनि दुर्जनहनि सब डारै । रहते सहते सकल विडारै ॥

शब्दवर्णन । ३७५
मन सों ब्रह्म होय गति सोई । लक्षण जीव रहै नहिं कोई ॥
अचल सिंहासन जब तू पावै । मुक्तिखवासी चँवर दुरावै ॥
आठौसिद्धि जहां कर जोरैं । सौहीं ताके मुख नहिं मोरैं ॥
निश्चल राज अमल करै पूरा । बाजै नौबत अनहद तूरा ॥
तीन तीन अरु कोटि अठासी । वै सब तेरी करें खवासी ॥
गुरु शुकदेव भेद दियो नीको । चरणदास मस्तक कियो टीको ॥
रणजीता यह रहनी पावै । थोथी करनी कथनि वहावै ॥
अथ योग का अंग ॥
राग करखा ॥
साधौ गुरु दया योग इह विधि कमायो ।
मूलको शोधि संकोच करि शङ्खिनी खैंचि आपान उलटो
चलायो ॥ बन्ध पर बन्ध जब बन्ध तीनों लगेँ पवन भइ
थकित नभ गर्जिज आयो । द्वादशा पलटि करि सुरति दो दल
धरी दशौ परकार अनहद बजायो ॥ रोंक जब नवन को द्वार
दशवें चढ़ो शून्य के तख्त आनँद बढ़ायो । सहस दल कमल
को रूप अद्भुत महा अमीरस उमँग आ झरि लगायो ॥ तेज
अतिपुञ्ज परलोक जहँ जगमगे कोटि छवि भानु परकाश
लायो । उनमनी और चित हेत करि बसिरहो देखि निज
रूप मनुवां मिलायो ॥ काल अरु ज्वाल जग व्याधि सब मिटि
गई जीवसों ब्रह्मगति वेगि पायो । चरणदास रणजीत शुक-
देव की दयासों अभयपद परशि अविगत समायो ॥ साधो
पिण्ड ब्रह्माण्ड की शैल गुरु गमक्री परसिया युक्तिसों अल-
खराई । सहजही सहज पग धरा जब अगम को दशौपरकार
झागड़ बुझाई ॥ खोलि कापाट अरु वज्रद्वारे चढ़ो कलाके
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३७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
भेद कुंजी लगाई । पहल के महलपर जाय आसनकिया दूसरे
महलकी खबरि पाई ॥ तीसरे महलपर सुरति जा बसिरही
महल चौथे दुही अमीगाई । पांचवें महल को साधु कोइ पाइहै
महल छठवां दिया गुरु बताई ॥ सातवें महलपर कोटि सूरज
दिये आठवें महल अविगति गोसाईं । रूप अद्भुत तहां देखि
अचरज जहां देखिया दरश सब बिपति जाई ॥ शुकदेवकी
सहासों धारण गहासो आपने पीवके भवन आई । चरणदास
आपा दिया प्रेम प्याला पिया शीश सदके किया पूजि पाई ॥
साधो परसिया देश जहँ भेश नाहीं ।
घाट तिसलखि जहां बाट सूझै नहीं सुरतिके चांदने सन्त
जाई ॥ चन्द षोड़शदिपै गंग उलटीबहैं सुषमना सेज पर लम्ब
दमकै । तासुके ऊपरै अमी का ताल है झिलमिली ज्योति
परकाश झमकै ॥ चारि योजन परे शून्य अस्थान है तेज
अति पुंज परलोक राजै । द्वार पश्चिम धँसे मेरही दण्डहो
उलटिकर आय छाजै विराजै ॥ नूर जगमग करै खेल अ-
गाध है वेदकत्तेब नहिं पार पावैं । गुरुमुखी जायहैं अमरपद
पाय हैं शीश का लोभतजि पन्थधावैं ॥ तीनसुन्न छेदि रण-
जीत चौथे बसै जन्म अरु मरण फिरि नाहिं होई । चरणदास
करि बास शुकदेव बकसीस सों पूज बेगमपुरी अमरसोई ॥
राग सोरठ ॥
ऐसा देश दिवानारे लोगो जाय सो माताहोय ।
बिन मदिरा मतवारे झूमें जन्म मरण दुख खोय ॥
कोटि चन्द सूरज उजियारो रविशशि पहुंचत नाहीं ।
बिना सीप मोती अनमोलक बहुदामिनि दमकाहीं ॥

शब्दवर्णन ३७७
बिन ऋतु फूले फल रहत हैं अमृत फल रस पागो।
पवन गवन बिन पेवन बहतहै बिन बादर झरि लागो ॥
अनहद शब्द भँवर गुंजारैं शंख पखावज बाजैं ।
ताल घंट मुरली घनघोरा भेरि दमामें गाजैं ॥
सिद्धगर्जना अतिही भारी घुंघुरू गति झनकारैं ।
रम्भा नृत्यकरैं बिन पगसों बिन पायल ठनकारैं ॥
गुरु शुकदेवकरैं जब किरपा ऐसो नगर दिखावैं ।
चरणदास वा पग के परसे आवागमन नशावैं ॥
राग सारंग व विलावल व सोरठ ॥
साधो अजब नगर अधिकाई ।
औघट घाट वाट जहाँ बांकी उस मारग हम जाई ॥
श्रवण विना बहु वाणी सुनिये बिन जिह्वा स्वर गावैं ।
बिना नैन जहां अचरज दीखै विना अंग लपटावैं ॥
विना नासिका बास पुष्पकी विना पावँ गिरि चढ़िया ।
विना हाथ जहँ मिलो धायकै बिन पाधा जहँ पढ़िया ॥
ऐसा घर बड़भागी पाया पहिरि गुरूका बाना ।
निश्चल ह्वैकै आशा मारी मिटिगा आवनजाना ॥
गुरू शुकदेव करी जब किरपा अनभय बुद्धि प्रकासी ।
चौथे पद में आनंद भारी चरणदास जहाँ वासी ॥
राग सोरठ ॥
सो गुरु बिन वह घर कौन दिखावै ।
जिहिघर अग्नि जलै जलमाहीं यह अचरज दरशावै ॥
कामधेनु जहाँ ठाढ़ी सोहैं नैन हाथ बिन दुहना ।
धाये दूधा थोड़ा देवै भूखे दे पै दूना ॥

३७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
पीवैं जन जगदीश पियारे गुरुगम बहुत अघावैं ।
मूरख कायर और अयोगी सोवै नेक न पावैं ॥
अमृत अँचवै वा पद पहुँचे महातेजको धारै ।
होय अमर निश्चल ह्वै बैठे आवागमन निवारै ॥
भेद छिपावै तौ फल पावै काहू से नहिं कहिये ।
वह अद्भुत है ठौर अनूठी बड़भागन सों लहिये ॥
या साधन के बहु रखवारे ऋषि मुनि देवत योगी ।
करन न देवैं बुधि हरि लेवैं होय न गोरस भोगी ॥
लोभी हलके को नहिं दीजै कहै शुकदेव गुसाईं ।
चरणदास त्यागी वैरागी ताहि देहु गहि बाहीं ॥
सो गुरु गम मगन भया मन मेरा ।
गगन मण्डल में निज घर कीन्हो पंच विषय नहिं घेरा ॥
प्यास क्षुधा निद्रा नहिं व्यापी अमृत अँचवन कीन्हा ।
छूटी आस बास नहिं कोई जग में चित नहिं दीन्हा ॥
दरशी ज्योति परम सुख पायो सबही कर्म जलावै ।
पाप पुण्य दोऊ भै नाहीं जन्म मरण बिसरावै ॥
अनहद आनँद अति उपजावै कहि न सकूं गतिसारी ।
अति ललचावै फिरि नहिं आवै लगी अलख सों यारी ॥
हंस कमलदल सतगुरु राजै रुचि रुचि दरशन पाऊं ।
कहि शुकदेव चरणहींदासा सब बिधि तोहिं बताऊं ॥
राग मलार ॥
चहूँदिशि झिलमिल झलक निहारी ।
आगे पीछे दहिने बायें तल ऊपर उजियारी ॥
दृष्टि पलक त्रिकुटी है देखे आसन पद्म लगावै ।
संयम साधै दृढ़ आराधै जब ऐसी सिधि पावै ॥