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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 690 में से

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पृष्ठ 413

३७४ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
सुबुधि दिवान शीलको बक्सी यतको हाकिम भारी ।
धर्म्म कर्म्म सन्तोष सिपाही जाके आज्ञाकारी ॥
सांच करिन्दा पटवारी धीरज नेम बिचारै ।
दया क्षमा अरु बड़ी दीनता पूरी जमा सँभारै ॥
मगन होय चौकस कण करिकै सुमति मेवड़ी मांपै ।
दर्शन द्रव्य ध्यानको पूरण वांटापावै आपै ॥
श्रीशुकदेव अमल करिगाढ़ो सूवस देश बसावै ।
चरणदास हूं तिनको नायव तत परवाना पावै ॥
जोनर इकछत भूप कहावै ।
सतसिंहासन ऊपर बैठे यतही चँवर दुरावै ॥
दया धर्म्म दोउ फौज महालै भक्ति निशान चलावै ।
पुण्य नगारा नौबति बाजै दुर्जन सकल हलावै ॥
पाप जलाय करै चौगाना हिंसा कुबुधि नशावै ।
मोह मुकद्दम काढ़ि मुलकसों लावै राग बसावै ॥
साधन नायब जित तित भेजै दे दे संयम साथा ।
राम दुहाई सिगरै फेरै कोइ न उठावै माथा ॥
निर्भय राजकरै निश्चल है गुरु शुकदेव सुनावै ।
चरणदास निश्चयकरि जानौ बिरलाजन कोइपावै ॥
राग कल्याण ॥
वह राजा सो यह विधि जानै । काया नगर जीतिबो ठानै ॥
काम क्रोध दोउ बल के पूरे । मोह लोभ अति सांवत शूरे ॥
बल अपनो अभिमान दिखावै । इनको मारि राहगढ़ धावै ॥
पांचौ थाने देह उठाई । जब गढ़में कूदै मनलाई ॥
ज्ञान खङ्ग लै द्वन्द मचावै । कपट कुटिलता रहन न पावै ॥
चुनि चुनि दुर्जनहनि सब डारै । रहते सहते सकल विडारै ॥