भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दवर्णन । ३७५
मन सों ब्रह्म होय गति सोई । लक्षण जीव रहै नहिं कोई ॥
अचल सिंहासन जब तू पावै । मुक्तिखवासी चँवर दुरावै ॥
आठौसिद्धि जहां कर जोरैं । सौहीं ताके मुख नहिं मोरैं ॥
निश्चल राज अमल करै पूरा । बाजै नौबत अनहद तूरा ॥
तीन तीन अरु कोटि अठासी । वै सब तेरी करें खवासी ॥
गुरु शुकदेव भेद दियो नीको । चरणदास मस्तक कियो टीको ॥
रणजीता यह रहनी पावै । थोथी करनी कथनि वहावै ॥
अथ योग का अंग ॥
राग करखा ॥
साधौ गुरु दया योग इह विधि कमायो ।
मूलको शोधि संकोच करि शङ्खिनी खैंचि आपान उलटो
चलायो ॥ बन्ध पर बन्ध जब बन्ध तीनों लगेँ पवन भइ
थकित नभ गर्जिज आयो । द्वादशा पलटि करि सुरति दो दल
धरी दशौ परकार अनहद बजायो ॥ रोंक जब नवन को द्वार
दशवें चढ़ो शून्य के तख्त आनँद बढ़ायो । सहस दल कमल
को रूप अद्भुत महा अमीरस उमँग आ झरि लगायो ॥ तेज
अतिपुञ्ज परलोक जहँ जगमगे कोटि छवि भानु परकाश
लायो । उनमनी और चित हेत करि बसिरहो देखि निज
रूप मनुवां मिलायो ॥ काल अरु ज्वाल जग व्याधि सब मिटि
गई जीवसों ब्रह्मगति वेगि पायो । चरणदास रणजीत शुक-
देव की दयासों अभयपद परशि अविगत समायो ॥ साधो
पिण्ड ब्रह्माण्ड की शैल गुरु गमक्री परसिया युक्तिसों अल-
खराई । सहजही सहज पग धरा जब अगम को दशौपरकार
झागड़ बुझाई ॥ खोलि कापाट अरु वज्रद्वारे चढ़ो कलाके
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