सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 338

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । २६६
राजस सों तामस बढ़ै, तामस सों बुधि नास।
रजगुण तमगुण छांड़िकै, करो सतोगुण वास ॥
सतगुणमें मन थिरकरो, करि आतम सों नेह।
आतम निर्गुण जानिये, गुण इन्द्री सँगदेह ॥
सात्त्विक राजस तामसी, त्रैगुण ते संसार।
तीन पांचको नाशहै, माया ब्रह्म विचार ॥
अहंतत्त्व ॐ भयो, जिनते तीनौ देव।
जिनके परे जु आतमा१, अगम अगोचर२ भेव ॥
उपजै सो माया सभी, विनशि नेकमें जाय।
छल मायासों कहतहैं, सपनो सकल बिहाय ॥
निराकार३ अद्वै अचल४, निर्वासी५ तू जीव।
निरालम्ब६ निर्वैर सो, अज७ अविनाशी सीव ॥
जिह्वा इन्द्री नीरकी, नभकी८ इन्द्री कान।
नासा इन्द्री धरणिकी, करि विचार पहिंचान ॥
त्वचासो इन्द्री वायुकी, पावक इन्द्री नैन।
इनको साधै साधु जो, पद पावै सुख चैन ॥
निद्रा संगम आलकस, भूख प्यास जो होय।
चरणदास पांचौ कही, अग्नितत्त्वसों जोय ॥
रक्त बिन्दु कफ तीसरो, मेद मूत्रको जान।
चरणदास प्रकृति यह, पानीसों पहिंचान ॥
चाम हाड़ नाड़ी कहौं, रोमजान अरु मांस।
पृथिवीकी प्रकृति यह, अन्त सबनको नास ॥
१ सच्चिदानन्दस्वरूपी यस्तिष्ठति स आत्मा २ जो दृष्टि में न आवै
३ जिसका आकार नहीं है ४ जो चल न सकै ५ जिसका कहीं वास नहीं
६ जिसको किसी वस्तुकी चाह नहीं ७ जो जन्म नहीं लेता ८ आकाश ॥