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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 690 में से

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पृष्ठ 340

ब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०१
आंख नाक जिह्वा कहूं, त्वचा जान अरु कान ।
पांचौ इन्द्री ज्ञान हैं, जानै संत सुजान ॥
जो जो इनसों जानिये, निश्चय ना ठहराय ।
कहै सुनै चाखै लखै, सो सोई मिटिजाय ॥
इन्द्री जानि सकै नहीं, मन बुधि लहै न ताय ।
ज्ञानदृष्टि पहिचानिये, वासों वाको पाय ॥
गुदा लिंग मुख तीसरो, हाथ पाँव लखि लेह ।
पांचौ इन्द्री कर्म हैं, यह भी कहिये देह ॥
देह मिटत है स्वप्न ज्यौं, जीव रहत है नित्त ।
देहकर्म बिसराय करि, आतमसों करि हित्त ॥
मन जीतै इन्द्री गहै, चित्त अस्थिर जब होय ।
आतम सों परचो रहै, राखै सुरति समोय ॥
पृथ्वी काल जे ठौर है, गुदै जानिये द्वार ।
पीरो रंग पहिचानिये, पीवन खान अहार ॥
जलको वासा भाल¹ है, लिङ्ग जानिये द्वार ।
मैथुन कर्म अहार है, रंग सफेद निहार ॥
पित्ते में पावक रहै, नैन जानिये द्वार ।
लालरंग है अग्नि को, मोह लोभ आहार ॥
पवन ना²भि में रहत है, नासा जानिये द्वार ।
हरो रंगहै वायु को, गन्ध सुगन्ध अहार ॥
अकाश शीशमें वास है, सरवन दुवारे जान ।
शब्द कुशव्द अहार है, ताको श्याम पिछान ॥
कारण सूक्ष्म लिंग है, अरु कहियत अस्थूल ।
शरीर तीनसों जानिये, मैं मेरी जड़मूल ॥
१ माथ २ तोंदी ॥