भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दूध मध्य ज्यों घीवहै, लकड़ी मध्य हुंतास १॥
थावर जंगम चर अचर, सबमें एकै होय ।
ज्यों मनको मैं डारि है, बाहर नाहा कोय ॥
एकडोरि मनका गुहै, अवरण वरण निहारि ।
आतम तौ निहरूप है, नित्य अनित्य विचारि ॥
माया यही स्वभावहै, उदय होय छिपि जाय ।
चंचल चपल सुहावनी, ओलं २ ज्यों गलिजाय ॥
परमातम तौ नित्यहै, ताको आदि न अन्त ।
सदाअचल चंचल नहीं, सब गुण रहत अनन्त ॥
सत चेतन आनन्दहै, आदि अन्त मधि हीन ।
आदि अन्त आकारको, सो तू झूठो चीन ॥
सुरति नाम आकारहै, ज्यों भूतनको नाच ।
मृगतृष्णाको नीर है, निकट गये नहिं सांच ॥
चितवत सांचीसी लगै, खोज किये मिटिजाय ।
दीखै है पर है नहीं, कौतुक सो दरशाय ॥
शिष्यवचन ॥
ब्रह्म बिना खाली नहीं, धरबेको इक पावँ ।
मायाको कहाँ ठौरहै, सत गुरु मोहिं बताव ॥
निर्विकार तौ ब्रह्म है, अद्वै अचल अपार ।
आई माया कहांते, सतगुरु कहौ विचार ॥
गुरुवचन ॥
आप ब्रह्म माया भयो, ज्यों जल पाला होय ।
पाला गलि पानी भयो, ऐसे नाहीं दोय ॥
झूठी माया सो कहैं, ज्ञानी पंडित लोय ।
१ अग्नि २ पत्थर ॥