भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 342, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मज्ञानसागरवर्णन । ३०३
राजस सों इन्द्री भई, तामस सों तत्त्व पांच ।
सात्त्विक सों चारौ भये, चरणदास कहैं सांच ॥
तीनौ गुणसे है परे, सो आतम को रूप ।
सो वह दृष्टि न आवई, अगम अगोचर भूप ॥
दश इन्द्री तत्त पांच है, तन्मात्रा भी पांच ।
चारौ अन्तःकरण हैं, ये चौबीसौ बांच ॥
पन्द्रह कों अस्थूल है, नौको लिंग शरीर ।
कारण झीनी वासना, तुरिया निर्मल धीर ॥
जाग्रत में चौबीस हैं, स्वप्ने में नौ जान ।
सुषुप्ति में सब लीन है, ये अँग जड़के मान ॥
तुरिया इकरस आतमा, निर्मल अचल अनाद ।
घटै बढ़ै उपजै नहीं, तहां न वाद विवाद ॥
घटै बढ़े उपजै मिटै, जड़को यही स्वभाव ।
सो सब कौतुक कररही, नाना किये उपाव ॥
चेतन ज्यों को त्यों सदा, सदा अकर्त्ता जोय ।
सब कर्मन सों रहित है, आतम ऐसो होय ॥
काहू ते उपजौ नहीं, वाते भयो न कोय ।
वह न मरै मारै नहीं, राम कहावै सोय ॥
योगयुगतकरि खोजि ले, सुरतिनिरति करिचीन ।
दशप्रकार अनहद बजै, होय जहां लवलीन ॥
तीन बंध नौ नाड़िका, दश बाई को जान ।
प्राणअपान समान है, और कहत उदान ॥
व्यानवायु अरु किरकिरा, कूरम बाई जीत ।
नाग धनंजय देवदत्त, दश बाई रणजीत ॥
नवो द्वारको बंधकरि, उत्तम नाड़ी तीन ।