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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 690 में से

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पृष्ठ 343

३०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
इड़ा पिंगला सुषमना, केलि करै परबीन ॥
करतै प्राणायाम के, पावै आतम भेख ।
अनहद ध्वनि के बीचमें, देखै शब्द अलेख ॥
पूरक करि कुंभक करै, रेचक पवन उतार ।
ऐसे प्राणायाम करि, सूक्ष्म करै अहार ॥
धरती बन्ध लगाय करि, दशौ वायु को रोक ।
मस्तक प्राण चढ़ायकै, करै अमरपुर भोग ॥
पांचौ मुद्रा साधिकै, पावै घट को भेद ।
नाड़ी शक्ति चढ़ाइये, षटौ चक्रको छेद ॥
नासाध्यान दृष्टिभ्रुकुटी में, सुरति श्वासके माहिं ।
आतम देखो जातहै, यामें संशय नाहिं ॥
योगयुक्ति कै कीजिये, कै आतम को ध्यान ।
आपा आप विचारिये, परम तत्त्व को ज्ञान ॥
शूद्र वैश्य शारीर है, ब्राह्मण और रजपूत ।
बूढ़ा बाला तू नहीं, चरणदास अवधूत ॥
काया माया जानिये, जीव ब्रह्म है मित्त ।
काया छुटि सूरति मिटै, तू परमातम नित्त ॥
पाप पुण्य आशातजौ, तजौ मान अरु थाप ।
काया मोह विकारतजि, जपै सु अजपा जाप ॥
आप भुलानो आपमें, बँधो आपही आप ।
जाको ढूंढ़त फिरतहौ, सो तुम आपहि आप ॥
इच्छा दुई बिसारिकै, क्यों न होय निर्वास ।
तूतो जीवन्मुक्त है, तजौ मुक्तिकी आस ॥
आपा खोजै आपलखि, आप अपनको देख ।
चरणदास तुहि ब्रह्महै, तूही पुरुष अलेख ॥