भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
दो० देह मरै तू है अमर, पारब्रह्म है सोय।
अज्ञानी भटकत फिरै, लखै सो ज्ञानी होय ॥
देह नहीं तू ब्रह्म है, अविनाशी निर्वान।
नित न्यारो तू देहसों, देह कर्म सब जान ॥
डोलन बोलन सोवना, भक्षण करन अहार।
दुख सुख मैथुन रोग सब, गर्मी शीत निहार ॥
जाति वरण कुल देहकी, सूरति मूरति नांव।
उपज विनशै देह सों, पांच तत्त्वको गांव ॥
पावक पानी वायु है, धरती अरु आकास।
पांचतत्त्व के कोट में, आय कियो तैं वास ॥
पांच पचीसौ देह सँग, गुण तीनों हैं साथ।
घट उपाधि सों जानिये, करत रहें उतपात ॥
तामस अरु हिंसा १ करै, वचन चलन विपरीति।
आलस अरु निन्दाकरै, तामसगुण की रीति ॥
डिंभ कपट छल छिद्र बहु, खोटे सब व्यवहार।
झूठ वचन ऐंठो रहै, तामस के गुण धार ॥
मान बड़ाई नामना, सिद्धि चहैं भजि राम।
भोजन नाना स्वादके, राजसगुण के काम ॥
खेल तमाशे राजसी, अरु सुगन्धकी वास।
आपनको ऊंचों गिनै, औरनकी कर हास ॥
दया क्षमा आधीनता, शीतल हिरदय धाम।
सत्य वचन गुण सात्त्विकी, भजन धर्म निहकाम ॥
दुखी न काहू कों करै, दुख सुख निकट न जाय।
समदृष्टी धीरज सदा, गुण सात्त्विकको पाय ॥
१ मारना ॥