भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
१८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अनन्य¹ भक्त वहि जानिये, सुमिरण भूलै नाहिं ॥
आन धरम मानै नहीं, आन देव नहिं ध्यान ।
ऐसे भक्त अनन्य कूं, कोई पावै जान ॥
पतिव्रता वह जानिये, आज्ञा करै न भंग ।
पिय अपने के रँग रतौ, और न सून ढंग ॥
अपने पियकूं सेइये, आन पुरुष तजिदेह ।
परघर नेह निवारिये, रहिये अपने गेह ॥
आज्ञाकारी पीव की, रहै पिया के संग ।
तन मनसूं सेवा करै, और न दूजो रंग ॥
रंग होय तौ पीव को, आन पुरुष विषरूप ।
छाहँ बुरी परधर्मकी, अपनी भली जु धूप ॥
अपने घरका दुख भला, परघरका सुख छार ।
ऐसे जानै कुलवधू, सो सतव²न्ती नार ॥
पतिकी ओर निहारिये, औरन से कह काम ।
सबै देवता छोड़करि, जपिये हरिका नाम ॥
खसम तुम्हारो राम है, इत उत झख मत मारि ।
चरणदास यों कहत हैं, यही धारणा धारि ॥
यह शिर नवै तो रामकूं, नाहीं गिरियो टूट ।
आन देव नहिं परसिये, यह तन जावो छूट ॥
पतिव्रता को व्रत गहौ, व्यभिचारिणि अँगटार ।
पति पावै सब दुख नसै, पावै सुख अपार ॥
जब तू जानै पीवही, वह अपनी करि लेहि ।
परमधाम मैं राखि करि, बाँह पकरि सुख देहि ॥
यही सिखाये देतहूँ, धारो हिरदय माहिं ।
१ जो दूसरे को न जानै २ पतिव्रता ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १८६
ऐसा पौधा बोईये, ताकी बैठो छाहिं ॥
सतवादी संतसूं रहो, सतही मुखसूं बोल ।
एक ओर हरिनाम रख, एक ओर जग तोल ॥
सभी निचोरे कहतहूं, भक्ति करो निष्काम ।
कोटि तपस्या यही है, मुखसूं कहिये राम ॥
रामनाम मुखसूं कहै, रामनाम सुन कान ।
रोम रोम हरिकूं रटो, ऐसी गहिये बान ॥
विद्या माहीं वाद है, तपके माहीं ऋद्धि ।
राम नाम में मुक्त है, योगमाहिं यों सिद्धि ॥
ताते त्यागो वासना, राखो रामहिं नाम ।
कोटिबन्ध छुटि जायँगे, पहुँचो हरि के धाम ॥
राम नाम में ये सबै, ऋद्धि सिद्धि अरु मोक्ष ।
ऐसा इष्ट सँभारिये, चरणदास कहि सोच ॥
जाका कीया सब बना, सात द्वीप नवखण्ड ।
चरणदास यों कहत हैं, तीन लोक ब्रह्माण्ड ॥
तवकारण सब कुछ किया, नाना विधि सुख दीन ।
तैं वाकूं जाना नहीं, नाम न कबहूं लीन ॥
अबकै औसर फिरिबन्यो, पाई मानुष देह ।
चरणदास यों कहत हैं, राम नामहीं लेह ॥
राग केदारा ॥
सुनौ भाई नाम की महिमा ।
मुक्ति चारों सिद्धि आठों बसत हैं तहिमा ॥
बालमीकि सो बनके बासी किये थे जिन पाप ।
भयो है सब ऋषिशिरोमणि जपे उलटे जाप ॥
गणिका सी अति महापापी सो पढ़ावत कीर ।
१६० श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
नामके परताप सेती कियो हरिपुर सीर ॥
अजामिल से पतित कामी वेश्यासों रति कीन ।
चढ़ि विमानै गयो सुरपुर नाम सुतहित लीन ॥
और बहुतै पतित तारे गिने कापै जाहिं ।
दान जप तप योग संयम नाम सम तुल नाहिं ॥
व्यास नारद शिव ब्रह्मादिक रटत जाकूं शेष ।
गुरू शुकदेव नाम को चरणदासकूं उपदेश ॥
कवित्त ॥
नामके प्रताप नन्दलाल आप भये प्रभु नामके प्रताप सुत दशरथ को कहायो है ।
नामके प्रताप पैज राखी प्रहलादजूकी नामके प्रताप दौरो द्वारका सूं धायो है ॥
नामके प्रतापकी न महिमा मोपै कहीजात नामके प्रताप सब सन्तन सहायो है ।
सोई नाम वास सब आस लगो चरणदास सोई नाम चारवेद विमल २ गायो है ॥
नामके प्रताप शबरी सुरन तैं सरस करी नामके प्रताप अधम लोककूं पठायो है ।
नामके प्रताप अजामीलकूं विमान आयो नामके प्रताप गज ग्राहसूं छुटायो है ॥
नामके प्रताप सब दीनन को दुख हरो नामको प्रताप शुकदेवजी दृढ़ायो है ।
सोई नाम वास अब आस लगो चरणदास सोई नाम चारवेद विमलं २ गायो है ॥
दो० नामअंगमहिमाअधिक, मोपै कही न जाय ।
पांच प्रेत अब कहत हूं, जाकूं सुनिचितलाय ॥
योग तपस्या भक्ति कूं, ज्ञान बिगाड़न पांच ।
जीवत दुखदै जगत में, मुये नरक दै आंच ॥
काम क्रोध मोह लोभसे, और पांचवां गर्व ।
राज करै वसुधा बिषे, इन वश कीने सर्व ॥
काम बली वर्णन करूं, जिन मारे बलवन्त ।
जाका बकसी नारि है, जीते गुणी महन्त ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १६१
राग सोरठ ॥
साधो नारि सबलरे भाई । नहिं मान राम दुहाई ॥
बांदर ज्यों पकरि नचावै । हरिजी सूं नेह छुटावै ॥
दया धर्म सब खोवै । जब नैनकजल भरि जोवै ॥
जिनका चित चोरा रांड़ी । तिनकी जग थू थू भांडी ॥
उन सबही सरवस खोया । नरशीशपकरि करि रोया ॥
जनम पदारथ छीना । स्याही का टीका दीना ॥
दोनों मुखसों खाया । फिर फिरकै गरभ दिखाया ॥
काम कटक में सूरी । वह सांवत कहिये पूरी ॥
बड़े बड़े योधा मारे । अरु बहुतक शूर पछारे ॥
गुरु शुकदेव बतावै । बटमारन तोहिं दिखावै ॥
चरणदास कहे जानौ । तुम छलवल कला पिछानौ ।
नारी ने हरि सुमिरण सूं खोये ।
राजा परजा मुंडत चुंडत नैनकटाक्षन मोहे ॥
राती चूनर चटक मटकले भूषण काजल साधै ।
मुड़ मुसकावै मधुरी वाणी प्यार प्रीतकर बांधै ॥
बहुतनको उन योग छुटाया बहुतनकोतप छीन्हों ।
बहुतनकी उन भक्ति बिगारी अंग विषयरस दीन्हों ॥
बंधुवां करि बहु नाच नचायो फंदा मोह लगायो ।
याते सावधानही रहियो मैं तुमकूं समुझायो ॥
गुरु शुकदेव बतावै साधो निश्चय ठगिनी जानौ ।
चरणदास कहैं हाथ न आवो नीकै ताहि पिछानौ ॥
साधौ परतिरिया सूं डरियो ।
जाके दरश परशके कीये जीवत नरकमें परियो ॥
गौतम घर¹नीसुन्दरि सुनिकै इन्द्रासन तजिआयो ।
१ स्त्री ॥
१६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो गति भई जगत मैं जानी भलो कलंक लगायो ॥
श्रृङ्गी ऋषि वन में तप कीन्हों सुरपति देखि डरायो ।
रंभा¹ भेजि हरो सत जाको सबही तेज सिरायो ॥
दैंयत देवत नर जो हुये नारी देख लुभाये ।
ताको फल ऐसोही पायो अजहूं कुयश सुनाये ॥
चरणदास शुकदेव गुरूने दे उपदेश बचाये ।
यती सती कोइ हाथ न आयो कामी पकरि नचाये ॥
अरे नर परनारी मत तक रे ।
जिन जिन ओर तको डायनकी बहुतन कूं गई भखरे ॥
दूध आक² को पात कटइया झाल अँगनकी जानौ ।
सिंह मुखारे विष कारेको ऐसे ताहि पिछानौ ॥
खोनि नरककी अतिदुख दाई चौरासी भरमावै ।
जनम जनमकूं दाग लगावै हरिगुरु तुरत छुटावै ॥
जगमें फिटिफिटि महिमा खोवै राखै तन मन मैला ।
चरणदास शुकदेव चितावै सुमिरो राम सुहेला ॥
दो० नर नारी सब चेतियो, दीन्हो प्रकट दिखाय ।
परतिरिया परपुरुष हो, भोग नरकको जाय ॥
परनारी कै आपनी, दोनों बुरी बलाय ।
घर बाहर का आग ज्यों, देवै हाथ जलाय ॥
चटक मटक सब छोड़दे, देही रूप बिगार ।
देख न कोई रीझ हैं, ना होवै लगवार ॥
यही ढाल है जत्तकी, लगै न शस्तर काम ।
आठ अंग हैं काम के, तासूं रहु निष्काम ॥
काम कान में आय करि, फिर आवत है नैन ।
बहुरि हिये में आय करि, लगै बहुत दुख दैन ॥
१ अप्सरा २ मदार ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १४३
वह काम बुरारे भाई । सब देवै तन बौराई ॥
पंचों में नाक कटावै । वह जूती मार दिलावै ॥
मुँह काला गधे चढ़ावै । बहुलोग तमाशे आवै ॥
झिड़का ज्यों डोलै कूता । सबही के मन सूं ऊता ॥
कोई नीके मुख नहिं बोलै । शरमिंदा¹ जग में डोलै ॥
वह जीवत नरक मँझारी । सुन चेतौ नर अरु नारी ॥
काम अंग तजि दीजै । सतसंगतिही करि लीजै ॥
कहैं चरणहीं दासा । हरि भक्तन में कर वासा ॥
दो० तन मन जारै कामहीं, चित करै डावांडोल ।
धरम करम सब खोय कै, रहै आप हिय खोल ॥
वह दया क्षमा को मारै । जत सतको पकरि पछारै ॥
शुचि² नेमको दूरि कढ़ाबै । मुख ऊपर धूरि उड़ावै ॥
जग भीतर महिमा खोवै । पापों की माला पोवै ॥
वह धीरज नाहीं राखै । वह मुखसों झूठी भाखै ॥
वह चाल चले विपरीता³ । करि विषय भोगकी चीता ॥
काम बली जहँ आवै । अरु बहुतक औगुण लावै ॥
यह मैनखोट का पूरा । कोइ जीतै गुरुमुख शूरा ॥
साधु भक्ति वह गुनियां । जिन कामदुष्ट को हनियां ॥
चेत कही शुकदेवा । सब चरणदास सुनिलेवा ॥
दो० सुनिकै जो चित में धरै, फेरि चलै वह चाल ।
खांड़ा पकरे शीलका, काम हनै ततकाल ॥
अथ क्रोध अंग ॥
क्रोध महाचण्डाल है, जानत है सब कोय ।
जांके अँग वरणन करूं, सुनियो सुरतिसमोय ॥
- १ लज्जित २ पवित्र ३ उलटी ॥
१६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
रागभैरवँ ॥
क्रोधभूतके चरित सुनाऊं । भिन्न भिन्न पैरगट दिखलाऊं ॥
क्रोध भूत जब तापर आवै । तन मनकी सब सुधि बिसरावै ॥
नैनालाल वदन सब कारो । रोम रोम व्यापै हत्यारो ॥
महाचण्डाल नीच अतिघोरी । अति विपरीत बुद्धि करिऔरी ॥
अपने हाथ आपको मारै । अपने कपड़े आपहि फारै ॥
मुहंड़े १ झाग मरोड़ै हाथा । कहै बहकती फूहड़ बाता ॥
हाफै बहुत आपको गाली । जेंवत आवै पटकै थाली ॥
कबहुँ शस्त्र सों मारन लागै । कवहूं कूंये पड़ने भागै ॥
भली कहै ताहि भोग सुनावै । बुरे भले पर ईंट चलावै ॥
सबल देख शीला हो जावै । निवल देखि बहु दुन्दि मचावै ॥
याका यतन करो मन भावै । चरणदास शुकदेव बतावै ॥
दो० जिहि घट आवै घूमरू, करै बहुतही खुमार ॥
पति खोवै बुद्धिकूं हनै, कहा पुरुष कह नारि ॥
वह बुद्धि भ्रष्ट करि डारै । वह मारहि मार पुकारै ॥
वह सब तन हिंसा छावै । कहिं दया न रहने पावै ॥
वह गुरु से बोलै बेंड़ा । साधों सूं डोलै ऐंडा ॥
वह हरसूं नेह छुटावै । वह नरक माहिं लेजावै ॥
वह आतमघाती जानौ । वह महामूढ़ पहिचानौ ॥
सोंटोंकी मार दिलावै । कबहुँ कै शीश कटावै ॥
वह नीच कमीना कहिये । ऐसे सूं डरता रहिये ॥
वह निकट न आवन दीजै । अरु क्षमा अंकै २ भर लीजै ॥
जब क्षमा आय किया थानौँ ३ । तब सबही क्रोध हिराना ॥
कहैं गुरु शुकदेव खिलारी । सुनु चरणदास उपकारी ॥
१ मुखको कहते हैं २ गोदी ३ मुकाम ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १६५
—अथ मोहअंग ॥
दो० क्रोध अंग पूरो कियो, कहूं मोहका अंग ।
जाहि लगै दुखदे घना, कवहूं न छोड़ै संग ॥
माया मोह बिछाइया, जाल संभारि सँभारि ।
आय आय तामें फँसे, बहुत पुरुष बहुनारि ॥
फँसे आय करि चावसूं, लेन गया नहिं कोय ।
चरणदास यों कहत हैं, पछिताये कह होय ॥
छूट सकै नहिं जालसूं, मिरगा ज्यों अकुलाय ।
कूद कूद निकसो चहै, ज्यों ज्यों उरझत जाय ॥
मोह शहदसम जानिये, मक्खी सम जिय जान ।
लालच लागे जितफँसे, शीश धुनै अज्ञान ॥
बन्दी खानो भवन' है, सब दिन धंधे जाइ ।
मोह छुटावै राम सूं, डारै नरक मँझाइ ॥
लख चौरासी योनि में, फिर वह भरमें जाय ।
हाँसे निकसै कठिन सूं, कबहूं औसर पाय ॥
तिरिया मोह महाबलदायी । मोह संतान सदा दुखदायी ॥
मोह कुटुंब अरु भाई बंधा । समझै नहीं मूढ़ मति अंधा ॥
देव भूत जिहि कारण धावै । ठग चोरी करि खोट कमावै ॥
वस्तर भूषण वाहन मोहा । सबामलि किया जीव संद्रोहा² ॥
द्रव्य लाल अरु हीरा मोतो । सब मिलि मोह लगावैं गोती ॥
मोह महल धरती¹ अरु गाऊं । बड़ा मोह जू अपना नाऊं ॥
जामें फँसे रंक³ अरु राजा । तिहिकारण धंधा दुखसाजा ॥
परकाजैं बहुतै दुख पाया । अपना सबही मूल गवाँया ॥
बड़े बड़े खेद उठाये सबहीं । भूले ध्यान राम का जपहीं ॥
घर २ बैर ३ दरिद्री ॥
१६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जोते मोह शूरमा कोई । मिलै रामकूं साधू सोई ॥
होय मुक्ति जग बहुरि न आवै । चरणदास शुकदेव बतावै ॥
दो० मोह बड़ा दुख रूप है, ताकूं मार निकास ।
प्रीति जगतकी छोड़ दे, जब होवै निरवासं१ ॥
जग माहीं ऐसे रहो, ज्यों जिह्वा मुखमाहिं ।
घीव घना भक्षण करै, तौभी चिकनी नाहिं ॥
जग माहीं ऐसे रहो, ज्यों अम्बुज सर२ माहिं ।
रहै नीर३ के आसरे, पै जल छूवत नाहिं ॥
ऐसा हो जो साधु हो, लिये रहै वैराग ।
चरण कमल में चित धरै, जगमें रहै न पाग ॥
मोहबली सब सूं अधिक, महिमा कही न जाय ।
जाको बांधो जग सबै, छूटै ना बौराय ॥
अथ लोभअंग ॥
लोभ नीच वर्णन करूं, महापाप को खानि ।
मंत्री जाका झूठ है, बहुत अधर्मी जानि ॥
तृष्णा जाकी जोयँ४ है, सो अंधा करि देय ।
घटी बढ़ी सूझै नहीं, महा कालका भेय ॥
दम्भ मकर छल भगल जो, रहत लोभके संग ।
मुये नरक लै जायँगे, जीवत करै उदंग ॥
देवैं धर्म छुटाय ही, आन धर्म ले जाय ।
हरि गुरु ते बेमुख करें लालच लोभ लगाय ॥
चहूं देश भरमत फिरै, कलह५ कलपना साथ ॥
लोभ काज उठउठ लगैं, दोउ पसारै हाथ ॥
लोभी भक्त होय नहिं कबहीं । साधु पुराण कहत हैं सबहीं ॥
१ वासना से रहित २ तालाब ३ जल ४ स्त्री ५ लड़ाई ॥
भक्तिपदार्थवर्णन :१६७
लोभी सती न होवै शूरा। लोभी दाता सन्त न पूरा॥
लोभी हितू न हौव सांचा। लोभी रहै जगत में रांचा॥
लोभी रहै द्रव्य के माहीं। तन छूटै पै निकसै नाहीं॥
लोभी करै जीवकी घाता¹। लोभी करै कपटकी बाता॥
लोभी पाप न करता डरै। लोभी जाय कष्ट में परै॥
लोभी बेचै अपना शीसा। लोभी डूबै बिसवैबीसा॥
गुरु शुकदेव बतावै हमकूं। सो यह कथा कही मैं तुमकूं॥
चरणदास कहैं लोभ न कीजै। हरि के पदपंकज मनदीजै॥
दो० चींटी बांदर खगंन कूं, लोभ बहुत दुखदीन।
याकूं तजि हरि कूं भजैं, चरणदास परबीन॥
लोभ घटावै मानकूं, करै जगत आधीन।
बोझघटा भिष्टल करै, करै बुद्धिको हीन॥
लोभ गये ते आवई, महाबली संतोष।
त्याग सत्यकूं संगले, कलह निवारण शोक॥
घट आवै सन्तोषही, कहा चहै जग भोग।
स्वर्गादिलो सुखजिते, सब कूं जानै रोग॥
संतोषी निश्चल दिशा, रहै राम लवलाय।
आसन ऊपर दृढ़रहै, इत उतकूं नहिं जाय॥
काहूसे नहिं राखिये, काहूविधि की चाह।
परमसंतोषी हूजिये, रहिये बेपरवाह॥
चाह जगतकी दासहै, हरि अपना न करै।
चरणदास यों कहतहैं, ब्याधा नाहिं टरै॥
अथ अभिमानअंग॥
चार अंग पूरे किये, कहूं गर्व गुण गाय।
१ मारना २ पक्षी॥
३६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बहुत सिकंडी मारिया, शिरपर छत्र फिराय ॥
अभिमानी चढ़िकरिगिरे, गये वासनामाहिं ।
चौरासी भ्रमत भये, क्योंहीं निकसै नाहिं ॥
अभिमानी मींजेगये, लूट लिये धन वा१म ।
निरअभिमानी होचले, पहुंचे हरिके धाम ॥
चरणदास कहै आपाथपै, गिनै आपको पांच ।
मान बड़ाई कारने, सहै जगतकी आंच ॥
करै बड़ाई कारने, परपंची छल धूत ।
अभिमानी फूले फिरै, ज्यों मर्कटका भूत ॥
अभिमानीकी मुक्ति न होई । अभिमानी मति अपनी खोई ॥
ऐंठ अकड़ अभिमानी माहा । अभिमानी नीचा हो नाहीं ॥
बिन 'नान्हापन सुख नहिं पावै । आनंदपदकूं कैसे जाव ॥
झूठ कपट अभिमानी खेलै । कंचन बरतन माटी मेलै ॥
भगल दंभ नितहि मन माहीं । निकट सांच कभु आवै नाहीं ॥
हूँ हूँ हूँ करताही डोलै । काहूते सीधा नहिं बोलै ॥
इन लक्षण जीवत दुख पावै । नरक माहिं तन छूटै जावै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । पूरा सो अभिमान नशावै ॥
दो० चरणदास यों कहत हैं, सुनियो सन्त सुजान ।
मुक्तिमूल आधीनता, नरकमूल अभिमान ॥
रूपवन्त गरबावै । कोइ मोसम दृष्टि न आवै ॥
तरुणापा गरवाना । वह अंधरा होवै राना ॥
कहै धन मधि में परबीना । सब मेरेहो आधीना ॥
कहै कुल अभिमानी सूचा । मैं सब जातिनमें ऊंचा ॥
वह विद्या गर्व जु भारी । करै वाद विवाद अनारी ॥
१ स्त्री ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १६६
अरु भूप करै अभिमाना। उन आपैही कूं जाना॥
उन काल नहीं पहिंचाना। सो मार करै घमसाना॥
गुरु (शुकदेव चितावै। तोहिं परगट नैन दिखावै॥
यम वांधि पकरि, लेजावैं। वै बहुतै त्रास१ दिखावैं॥
जब कहां जाय अभिमाना। मेरा नीका सुन यह ताना॥
फिर डारै नरक मँझारी। सुनि चेतौ नर अरु नारी॥
तौ मद मत्सरता२ तजि दीजै। साधों के चरण गहीजै॥
हरि भक्ति करौ चितलाई। जब सकल व्याधि छुटिजाई॥
कर जाति वरणकुल दूरा। हो सतसंगति में पूरा॥
जब मुक्तधामकूं पावै। फिर गर्भ योनि नहिं आवै॥
कहैं गुरु शुकदेव बखानौ। यह चरणदास मन आनौ॥
दो० मनमें लाय विचारकूं, दीजै गर्व निकार।
नान्हापन जब आय है, छुटै सकल विकार॥
पांचौ उतरै भूत जब, ह्वैहौ ब्रह्म अरूप।
आनँद पद कूं पायहौ, जितहै मुक्तस्वरूप॥
पांच-प्रेत जो ये कहे, सतगुरुके परताप।
शील अंग अब कहतहूँ, जासूं छूटै पाप॥
अथ शीलअंग वर्णन ॥
दो० अब मैं गाऊँ शीलकूं, येहो सन्त सुजान।
नर नारी सबही सुनौ, दै दै चित बुधिकान॥
रूपगुणी कुलवंत जो, अरु होवै धनवन्त।
शील बिना शोभा नहीं, भिष्टै नरक पड़न्त॥
शील विना जो तप करै, करै शील बिन दान।
योग युक्तिकरै शील विन, सो कहिये अज्ञान॥
१ डर २ काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य ॥
१५
२०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
शील बड़ोही योगहै, जो कर जानै कोय ।
शीलविहीनो चरणदास, कवहूँ मुक्ति नहिं होय ॥
सब गुण लक्षणतो विषे, शील न आया एक ।
जपतप निष्फल जाहिंगे, चरणहिं दास विवेक ॥
पूजा संयम नेम जो, यज्ञ करै चितलाय ।
चरणदास कहैं शील बिन, सबी अकारथ जाय ॥
सोइ सती सोइ शूरमा, सोइ दाता अधिकाय ।
शील लिये नितही रहै, तौनिष्फल नहिंजाय ॥
शील अंग ऊंचो अधिक, उन तीसों के बीच ।
जाघट¹ शील न आइया, सो घट कहिये नीच ॥
शील न उपजै खेत में, शीलन हाट बिकाय ।
जो हो पूरा टेक का, लेवै अँग उपजाय ॥
शील बिना नरकै परै, शील बिना यम दण्ड ।
शील बिना भरमत फिरै, सात द्वीप नौ खण्ड ॥
शील बिना भटकत फिरै, चौरासी के माहिं ।
पहिले होवै प्रेत ही, यामें संशय नाहिं ॥
सब तजि सेवो शील कूं, राम नाम लौलाय ।
जीवत शोभा जगत में, मुये मुक्ति है जाय ॥
जाको शील सुभाव है, ताकी दूर बलाय ।
ताकी कीरंति² जगत में, सुनहो कान लगाय ॥
शील रहते सब रहें, जेते हैं शुभ अंग ।
ज्यों राजा के रहते, रहै फौज को संग ॥
सत्यगया तौ क्या रहा, शील गया सब झाड़ ।
भक्त खेत कैसे बचै, टूट गई जब बाड़ ॥
१ शरीर २ यश ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २०१
ज्वानी शील न राखिया, बिगड़ गई सब देह।
अब पछितावा क्या करै, मुख पर उड़िया खेह¹ ॥
शील गये शोभा घटै, या दुनिया के माहिं ।
कूकरज्यों झिड़क्यों फिरै, कहीं भी आदर नाहिं ॥
शील गये गुरू सूं फिरै, हरि सों बेमुख होय ।
चरणदास कहाँ लौं कहैं, सर्वस डारै खोय ॥
धिक जीवन संसार में, ताको शील नशाय ।
जग में फिट फिट होत है, मुये ताचना पाय ॥
शील कसैला आँवला, और बड़ों के बोल ।
पाछे देवै स्वाद वै, चरणदास कहि खोल ॥
शील निरोगी नींबसा, औगुण डारै खोय ।
पहिले करुवा दुख लगै, पाछे गुण सुख होय ॥
लाख यही उपदेश है, एक शील कूं राख ।
जन्म सुधारौ हरि मिलौ, चरणदास की साख ॥
शीलवंत के चरण का, जो चरणोदक² लेय ।
रोग दोष मिटि जायँ सब, रहै न यमका भेय ॥
आठ अंग सूं शीलही, जाघट माहीं होय ।
चरणदास यों कहत हैं, दुर्लभ दर्शन सोय ॥
शीलवंत दर्शन बड़े, देखत पातक जाय ।
वचन सुनै मन शुद्ध हों, खोटी दृष्टि³ सिराय ॥
शील सरोवर न्हाय करि, करौ राम की सेव ।
यासम तीरथ और ना, कहिया गुरु शुकदेव ॥
शील अंग पूरो कियो, महिमा अधिक अपार ।
दया अंग वरणन करूं, समझै छुटै विकार ॥
१ धूरि २ पावोंका धोया हुआ जल ३ बुरी नज़र ॥
२०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ दयाअंग वर्णन ॥
दो० परमारथ में दया बड़, जो घट उपजै आय ।
परगट हो निर्वैरता¹, कर्म गांठि खुल जाय ॥
थावर जंगम चर अचर, या जग में हो कोय ।
सबही पै हित राखिये, सुखदानीही होय ॥
भोजन करौ सँभाल करि, पानी पीजौ छान ।
हरा वृक्ष नहिं तोड़िये, कर्म बचै यों जान ॥
औरौ बहुत विचारले, जामें लगै न कर्म ।
यही तपस्या जानिये, यही दया यहि धर्म ॥
इक इन्द्री दो इन्द्रियां, ती इन्द्री अरु चार ।
पंच इन्द्री लौं जीवकी, हिंसा अकस निवार ॥
खावै वस्तु विचारि कै, बैठै ठौर विचार ।
जो कुछकरै विचारकरि, किरिया यही अचार ॥
मन सों रहु निर्वैरता, मुख सूं मीठा बोल ।
तन सूं रक्षा जीव की, चरणदास कहि खोल ॥
करुवा वचन न बोलिये, तन सूं कष्टन देहु ।
अपनासा जी जानिकै, बनै तौ दुख हरिलेहु ॥
मुख सूं जो करुवा कहै, तन सूं देवै कष्ट ।
यही जु हिंसा जानिये, दया धर्मजा नष्ट ॥
दश इन्द्री मन ग्यारहवां, करि विचारि ले जान ।
इनहीं सूं सुख दीजिये, चरणदास पहिचान ॥
काहू दुख नहिं दीजिये, दुर्जन हो कै मीत ।
सुखदायी सब जगतको, गहो दया की रीत ॥
कोमलता परपीरता, सज्जनता निर्दोष ।
१ किसी से लड़ाई न मानना ॥
सबही दया के अंग हैं, इन ते पावै मोष ॥
दया ज्ञान का मूल है, दया भक्ति का जीव ।
चरणदास यों कहत हैं, दया मिलावै पीव ॥
दया नहीं तौ कुछ नहीं, सबही थोथी बात ।
बाहर कथनी सोहनी, भीतर लागी घात ॥
छापे तिलक बनायकै, माला पहिरी दोय ।
दया बिना बक¹सम अहो, साधुरूप नहिं होय ॥
दया न आई घट बिषे, हीया बड़ा कठोर ।
यह नगरी कैसे बसै, तामें हिंसा² चोर ॥
पँडिताई बहुतै करी, दया न राखी जीव ।
छाँछि³ छाँछि तैं लैलई, डारि दिया तत घीव ॥
तोहिं पण्डित मैं कइ कहूं, मूरख कै परवीन ।
लिया न तैं मत सूपका, चलनीका मतलीन ॥
दया गहेते सब नशें, पाप ताप दुख द्वन्द ।
ऐसी परम पुँनीत⁴कूं, तजै सो मूरख अन्ध ॥
दया बिना नर पतित है, दया बिना नर दुष्ट ।
दया बिना सुनवत बने, सबही थोथी गुष्ट ॥
जन्म मरण छूटै नहीं, नाहीं कर्म्म नशाहिं ।
दया बिना बदला भरै, चौरासी के माहिं ॥
काम क्रोध मोह लोभये, गरबआदि भजिजाहिं ।
चरणदास कहैं दया जो, घट में पहुंचै आहिं ॥
जितने वैरी जीव के, तिनमें रहै न एक ।
चरणदास यों कहत हैं, दया जो आवै नेक ॥
दुख भाजैं सुख हों घने, काया नगरी ढंग ।
१ बगुला २ जीवमारना ३ मट्ठा ४ पवित्र ॥
२०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ दयाअंग वर्णन ॥
दो० परमारथ में दया बड़, जो घट उपजै आय।
परगट हो निवैंरता१, कर्म गांठि खुल जाय ॥
थावर जंगम चर अचर, या जग में हो कोय।
सबही पै हित राखिये, सुखदानीही होय ॥
भोजन करौ सँभाल करि, पानी पीजौ छान।
हरावृक्ष नहिं तोड़िये, कर्म बचै यों जान ॥
औरौ बहुत विचारले, जामें लगै न कर्म।
यही तपस्या जानिये, यही दया यहि धर्म ॥
इक इन्द्री दो इन्द्रियां, ती इन्द्री अरु चार।
पंच इन्द्री लौं जीवकी, हिंसा अकस निवार ॥
खावै वस्तु विचारि कै, बैठै ठौर विचार।
जो कुछकरै विचारकरि, किरिया यही अचार ॥
मन सों रहु निवैंरता, मुख सूं मीठा बोल।
तन सूं रक्षा जीव की, चरणदास कहि खोल ॥
करुवा वचन न बोलिये, तन सूं कष्ट न देहु।
अपनासा जी जानिकै, बनै तौ दुख हरिलेहु ॥
मुख सूं जो करुवा कहै, तन सूं देवै कष्ट।
यही जु हिंसा जानिये, दया धर्मजा नष्ट ॥
दश इन्द्री मन ग्यारवां, करि विचारि ले जान।
इनहीं सूं सुख दीजिये, चरणदास पहिंचान ॥
काहू दुख नहिदीजिये, दुर्जन हो कै मीत।
सुखदायी सब जगतको, गहो दयाँ की रीत ॥
कोमलता परपीरता, सज्जनता निर्दोष।
१ किसी से लड़ाई न मानना ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २०३
सबही दया के अंग हैं, इन ते पावै मोष ॥
दया ज्ञान का मूल है, दया भक्ति का जीव ।
चरणदास यों कहत हैं, दया मिलावै पीव ॥
दया नहीं तौ कुछ नहीं, सबही थोथी बात ।
बाहर कथनी सोहनी, भीतर लागी घात ॥
छापे तिलक बनायकै, माला पहिरी दोय ।
दया बिना बक¹सम वहो, साधुरूप नहिं होय ॥
दया न आई घट बिषे, हीया बड़ा कठोर ।
यह नगरी कैसे बसै, तामें हिंसा² चोर ॥
पँडिताई बहुतै करी, दया न राखी जीव ।
छाँछि³ छाँछि तैं लै लई, डारि दिया तत घीव ॥
तोहिं पण्डित मैं कह कहूं, मूरख कै परवीन ।
लिया न तैं मत सूपका, चलनीका मतलीन ॥
दया गहेते सब नशैं, पाप ताप दुख द्वन्द ।
ऐसी परम पुंनीत⁴कूं, तजै सो मूरख अन्ध ॥
दया बिना नर पतित है, दया बिना नर दुष्ट ।
दया बिना सुनवत बने, सबही थोथी गुष्ट ॥
जन्म मरण छूटै नहीं, नाहीं कर्म्म नशाहिं ।
दया बिना बदला भरै, चौरासी के माहिं ॥
काम क्रोध मोह लोभये, गरवआदि भजिजाहिं ।
चरणदास कहैं दया जो, घट में पहुंचै आहिं ॥
जितने वैरी जीव के, तिनमें रहै न एक ।
चरणदास यों कहत हैं, दया जो आवै नेक ॥
दुख भाजैं सुख हों घने, काया नगरी ढंग ।
१ बगुला २ जीवमारना ३ मट्ठा ४ पवित्र ॥
२०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
हिंसा रानी जो भजै, लेकर अपनो संग ॥
धन्य दया धनि शील कूं, जिनसे रीझे राम ।
गुरु शुकदेव बतावई, सबही सुधरै काम ॥
- इति दया का अंग सम्पूर्णम् ॥
( माया अंग वर्णन )
राग भैरव ॥
बैठा गुरु सूँ चलता चेला । सुखी होय रहै रैन अकेला ॥
दया क्षमा रख राम सुहाती । बात कहै करुई नहिंताती ॥
बिन जांचे उपदेश न दीजै । तरंकी¹ सूँ चर्चा नहिं कीजै ॥
मौन गहै थोरासा बोले । पलक न मिलै नैनरहै खोले ॥
दृष्टिराख नासाके आगे । सत्य वचन मीठा मुख भाषे ॥
रसना उलट अकाश चढ़ावै । बिनहीं बादल जल बरसावै ॥
पवन साधि मनकूं ठहरावै । कामिनि कनक रूप बिसरावै ॥
आसन अडिग² सुरत अनहद में। अन्तर खोल मिलै नहिं जगते ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । ऐसा होय महन्त कहावै ॥
दो० जो बोलै तौ हरिकथा, मौन गहै तौ ध्यान ।
चरणदास यह धारणा, धारै सो संज्ञान ॥
माया की अस्तुति करूं, होय रही संसार ।
अद्भुत लीला कर रही, शोभा अगम अपार ॥
माया सकल पसार है, नाना रँग बहु क्रान्ति ।
जहँलग यह आकारही, चंचल मिथ्या भ्रान्तिं³ ॥
जसे सुपना रैन का, मुख दर्पण के माहिं ।
भासै है पर है नहीं, ज्यों तरवर की छाहिं ॥
१ तर्क करनेवाले अर्थात् पाखण्डी २ किसी का लगाव न हो जिससे डिगे
नहीं ३ भर्मना ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २०५
यह माया सबकूं मोहै। वस होय न ऐसा कोहै ॥
यह बहुत सोहनी लागै। सबही नरनारी पागै ॥
कहिं चमक दमक बहुरूपा। अरु कहीं रंक कहिं भूपा ॥
अरु जहँ तहँ अधिक तमासे। वह भांति भांतिही भासे ॥
अरु जहँ लग सकल सवादा। कोइ करै जु वाद विवादा ॥
अरु काम क्रोध मोह लोभा। अरु मान बड़ाई शोभा ॥
अरु पांचौ इन्द्री जानौ। सब माया रूप पिछानौ ॥
अरु पांच¹ तत्त्व गुण तीनौ²। सो माया ही कूं चीन्हौ ॥
वह मकर पेच छले जानै। अरु पहर पहर बहुबानै ॥
गुरु शुकदेव जनावै। सब माया खेल दिखावै ॥
दो० जेते सुख संसार के, सबही माया जार।
तामें दो कणका धरे, एक द्रव्य एक नार ॥
लालच लागै चावसूं, गिरे आय करि लोय।
फँसे आपसूं आपही, गहि नहिं लाया कोय ॥
पांचौ इन्द्री सों लखै, सो माया आकार।
याहीसेती सब भयो, जहाँ लगहै साकार ॥
अरु माया रूप अनन्ता। कोइ जानै साधू सन्ता ॥
कहा सुना अरु देखा। सब माया रूप विशेखा ॥
आठ सिद्ध नौ माया। जहाँ जोगी तपी भुलाया ॥
अरु माया फंदे मांहीं। सब जीव आइ फँसि जाहीं ॥
वै नरक माहिं दुख पावैं। यम छप्पन त्रास दिखावैं ॥
फिर भुगतै लख चौरासी। वे गरभ योनि के वासी ॥
वे पशू देह धरि धावैं। नहिं मुक्त ठिकाना पावैं ॥
चरणदास कहैं नर चेतौ। तजौ मायाही सूं हेतौ ॥
१ पृथ्वी अप् तेज वायु आकाश २ सात्त्विक राजस तामस ॥