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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 690 में से

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पृष्ठ 232

भक्तिपदार्थवर्णन :१६७
लोभी सती न होवै शूरा। लोभी दाता सन्त न पूरा॥
लोभी हितू न हौव सांचा। लोभी रहै जगत में रांचा॥
लोभी रहै द्रव्य के माहीं। तन छूटै पै निकसै नाहीं॥
लोभी करै जीवकी घाता¹। लोभी करै कपटकी बाता॥
लोभी पाप न करता डरै। लोभी जाय कष्ट में परै॥
लोभी बेचै अपना शीसा। लोभी डूबै बिसवैबीसा॥
गुरु शुकदेव बतावै हमकूं। सो यह कथा कही मैं तुमकूं॥
चरणदास कहैं लोभ न कीजै। हरि के पदपंकज मनदीजै॥
दो० चींटी बांदर खगंन कूं, लोभ बहुत दुखदीन।
याकूं तजि हरि कूं भजैं, चरणदास परबीन॥
लोभ घटावै मानकूं, करै जगत आधीन।
बोझघटा भिष्टल करै, करै बुद्धिको हीन॥
लोभ गये ते आवई, महाबली संतोष।
त्याग सत्यकूं संगले, कलह निवारण शोक॥
घट आवै सन्तोषही, कहा चहै जग भोग।
स्वर्गादिलो सुखजिते, सब कूं जानै रोग॥
संतोषी निश्चल दिशा, रहै राम लवलाय।
आसन ऊपर दृढ़रहै, इत उतकूं नहिं जाय॥
काहूसे नहिं राखिये, काहूविधि की चाह।
परमसंतोषी हूजिये, रहिये बेपरवाह॥
चाह जगतकी दासहै, हरि अपना न करै।
चरणदास यों कहतहैं, ब्याधा नाहिं टरै॥
अथ अभिमानअंग॥
चार अंग पूरे किये, कहूं गर्व गुण गाय।
१ मारना २ पक्षी॥