भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 230, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । १६५
—अथ मोहअंग ॥
दो० क्रोध अंग पूरो कियो, कहूं मोहका अंग ।
जाहि लगै दुखदे घना, कवहूं न छोड़ै संग ॥
माया मोह बिछाइया, जाल संभारि सँभारि ।
आय आय तामें फँसे, बहुत पुरुष बहुनारि ॥
फँसे आय करि चावसूं, लेन गया नहिं कोय ।
चरणदास यों कहत हैं, पछिताये कह होय ॥
छूट सकै नहिं जालसूं, मिरगा ज्यों अकुलाय ।
कूद कूद निकसो चहै, ज्यों ज्यों उरझत जाय ॥
मोह शहदसम जानिये, मक्खी सम जिय जान ।
लालच लागे जितफँसे, शीश धुनै अज्ञान ॥
बन्दी खानो भवन' है, सब दिन धंधे जाइ ।
मोह छुटावै राम सूं, डारै नरक मँझाइ ॥
लख चौरासी योनि में, फिर वह भरमें जाय ।
हाँसे निकसै कठिन सूं, कबहूं औसर पाय ॥
तिरिया मोह महाबलदायी । मोह संतान सदा दुखदायी ॥
मोह कुटुंब अरु भाई बंधा । समझै नहीं मूढ़ मति अंधा ॥
देव भूत जिहि कारण धावै । ठग चोरी करि खोट कमावै ॥
वस्तर भूषण वाहन मोहा । सबामलि किया जीव संद्रोहा² ॥
द्रव्य लाल अरु हीरा मोतो । सब मिलि मोह लगावैं गोती ॥
मोह महल धरती¹ अरु गाऊं । बड़ा मोह जू अपना नाऊं ॥
जामें फँसे रंक³ अरु राजा । तिहिकारण धंधा दुखसाजा ॥
परकाजैं बहुतै दुख पाया । अपना सबही मूल गवाँया ॥
बड़े बड़े खेद उठाये सबहीं । भूले ध्यान राम का जपहीं ॥
घर २ बैर ३ दरिद्री ॥