भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 690 में से
संदर्भ में पढ़ें३६८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बहुत सिकंडी मारिया, शिरपर छत्र फिराय ॥
अभिमानी चढ़िकरिगिरे, गये वासनामाहिं ।
चौरासी भ्रमत भये, क्योंहीं निकसै नाहिं ॥
अभिमानी मींजेगये, लूट लिये धन वा१म ।
निरअभिमानी होचले, पहुंचे हरिके धाम ॥
चरणदास कहै आपाथपै, गिनै आपको पांच ।
मान बड़ाई कारने, सहै जगतकी आंच ॥
करै बड़ाई कारने, परपंची छल धूत ।
अभिमानी फूले फिरै, ज्यों मर्कटका भूत ॥
अभिमानीकी मुक्ति न होई । अभिमानी मति अपनी खोई ॥
ऐंठ अकड़ अभिमानी माहा । अभिमानी नीचा हो नाहीं ॥
बिन 'नान्हापन सुख नहिं पावै । आनंदपदकूं कैसे जाव ॥
झूठ कपट अभिमानी खेलै । कंचन बरतन माटी मेलै ॥
भगल दंभ नितहि मन माहीं । निकट सांच कभु आवै नाहीं ॥
हूँ हूँ हूँ करताही डोलै । काहूते सीधा नहिं बोलै ॥
इन लक्षण जीवत दुख पावै । नरक माहिं तन छूटै जावै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । पूरा सो अभिमान नशावै ॥
दो० चरणदास यों कहत हैं, सुनियो सन्त सुजान ।
मुक्तिमूल आधीनता, नरकमूल अभिमान ॥
रूपवन्त गरबावै । कोइ मोसम दृष्टि न आवै ॥
तरुणापा गरवाना । वह अंधरा होवै राना ॥
कहै धन मधि में परबीना । सब मेरेहो आधीना ॥
कहै कुल अभिमानी सूचा । मैं सब जातिनमें ऊंचा ॥
वह विद्या गर्व जु भारी । करै वाद विवाद अनारी ॥
१ स्त्री ॥