भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
भक्तिपदार्थवर्णन । १७७
कोई कहौ सुनौ मन आनौ । वैसा नहिं निश्चय करि जानौ ॥
बड़बड़ ऋषि मुनि पण्डित भारे । चरणदास सब खोजत हारे ॥
दो० वहि निरगुंण सरगुंण वही, वहि दोनों से न्यार ।
जो था सो जाना नहीं, शोचा वारंवार ॥
अनंत¹ शक्ति लीला अनंत, गुण अनंत बहुभाव ।
कौतुक रूप अनंत हैं, चरणदास बलिजाव ॥
नाम भेद किरिया अनंत, अनंत धरे अवतार ।
बीस चार तिनमें अधिक, कहै शुकदेव विचार ॥
राम कृष्ण पूरण कला, चौबीसौ में दोय ।
निरगुण से सरगुण वही, भक्तों कारण होय ॥
रागबिलावल ॥
अलख² निरंजन अगम अपार ।
एक अनेक भेष बहु कीन्हे सुन्दर रचना रची सँवार ॥
निरगुण हरि सरगुण हो खेलौ अचरज लीला करि विस्तार
अपनो चरित आपही देखै ऐसो अद्भुत कौतुकधार ॥
रूप बराह पकरि हिरण्याक्षहि धरती लाये ताहि संहार ।
यज्ञपुरुष अरु दत्तात्रेयी अरु श्रीबद्रीपति हि विचार ॥
सनत्कुमार ऋषभदेव ध्रुव बर पृथू मच्छ कूर्म उदार ।
हयग्रीवा अरु हंसरूप ही महाबली नरसिंह बलधार ॥
हरि परगट ह्वै गजै छुटायौ बामन कपिल सरस गुणसार ।
मन्वन्तर धन्वतर प्रगटे परशुराम रामचन्द्र मुरार ॥
पूरण कला ईश तिहुंपुर को कृष्ण प्रगट हो कंस पछार ।
वेदव्यास अरु बोध कलंकी ये भये सब चौबीस अवतार ॥
युग युग माहिं आप परगट ह्वै दुष्ट दलन सन्तन रखवार ।
१ जिसका अन्त नहीं २ जो देखि न परै ॥
१७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव श्यामकी बाँकी गतिको वार न पार ॥
दो० एक एकसों आगरो, महिमा कही न जाय ।
अनंत रँगीले महल में, आपहि बैठे आय ॥
अनन्त रँगीले महल बनाये । तामें आप रामहीं आये ॥
नांव रूप गुण न्यारे न्यारे । गिनत शारदा गणपति हारे ॥
मन्दिर रूप बहुत छवि सोहै । जहां तहां मेरो मन मोहै ॥
हरे श्वेत पीत अरु लाले । पिसताकी ऊदे अरु काले ॥
बेलदार लहरा छवि बूटे । चीतमताले और तिखूटे ॥
बूंद बूंद अरु गंडे दारे । जानौ चित्तर हाथ सँवारे ॥
रँगा रंग बहु चित्तरकारी । कहूं कहाँलों मों बुधिहारी ॥
दो पाये अरु पुनि चौपाये । बहु पाये कछु कहे न जाये ॥
वृक्षरूप अरु पक्षीनाना । कीट१ पतंगा२ थिर३ चर४ जाना ॥
जलमें मीन५ बहुत परकारे । चरणदास शुकदेव विचारे ॥
दो० थावर जंगम चर अचर, बहुत छबीली भांति ॥
राजस तामससात्विकी, बहु अर्धान वहु क्रांति ॥
बानर नर असुरा सुरा, यक्षगण गन्ध्रब प्रेत ।
सबही महल बराबरी, सबही सेती हेत ॥
खिरकी नैन चावसों खोलै । मुख द्वारे नाना विधि बोलै ॥
बहुत भांति की नाना बानो । चतुर कूड भोली अरु यानी६ ॥
कहिं अबोल नहिं बोलन आवै । पै सब महलन वह दरशाव ॥
साक्षात हरिही कूं जानौ । भवन् भवनमें ताहि पिछानौ ॥
काया क्षेत्र ज्ञानी जानै । क्षेत्रग आतमरूप बखानै ॥
देही क्षर गीता में गायो । अक्षर जीव खोल दिखलायो ॥
१ किरवा २ पाखी ३ न चलनेवाले ४ चलनेवाले ५ मछली ६ न
जाननेवाली ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १७६
काया मन्दिर आप रमायो । ताते राम नाम धरवायो ॥
देह सँयोग राम कहलायो । चरणदास शुकदेव बतायो ॥
दो० सूरज चींटी आदि दै, लघु दीरघ के माहिं ।
सब में पोइ आतमा, बाहर कोई नाहिं ॥
छोटे भांडे१ में करै, छोटाही परकाश ।
बड़े जु भाँड़े में करै, जेता होय उकाश ॥
ज्ञानवन्त कूं मैं दियो, दीपक को दृष्टान्त ।
जो वह समझ चावसूँ, मिटै तिमिर२ अरु भ्रान्त ॥
जैसेही है पिण्ड में, जैसे ही ब्रह्मण्ड ।
भीतर बाहर रमिरह्यो, सात द्वीप नव खण्ड ॥
आप लखेते वाकूं पावै । जो पै सतगुरु भेद बतावै ॥
ज्ञान दृष्टि सेती दरशावै । आपा मिटै ब्रह्म ठहरावै ॥
ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय जहँ नाहीं । ध्याता ध्यान ध्येय मिटि जाहीं ॥
जबहो एक दूसरा नासे । बन्ध मुकत के रहैं न सांसे ॥
मृतक अवस्था जीवत आवै । करम रहित अस्थिर गति पावै ॥
तब कोइ मिन्तर वैरी नाहीं । पाप पुण्यकी परै न छाहीं ॥
हरष शोक सम होजा दोऊ । रक्षाकरो कि मारो कोऊ ॥
कोऊ हाथ में भोजन देजा । कोउ छीनकर योंहीं लेजा ॥
दोनों एक बराबर वाके । जगव्योहार कछू नहिं जाके ॥
हरि बिन और पिछान न कोई । तिनके इच्छा रही न दोई ॥
ज्ञान दशा ऐसे करि गाई । चरणदास शुकदेव बताई ॥
दो० ज्ञानदशा आवन कठिन, बिरला जानै कोय ।
ज्ञान दशा जब जानिये, जीवत मृतक होय ॥
वाचक३ ज्ञानी बहुतक देखे । लक्ष४ ज्ञानी कोइ लेखे लेखे ॥
१ बर्त्तनरूपी शरीर २ अँधेरा ३ कहनेवाले ४ हृदयान्तर से देखनेवाले ॥
१८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
ज्ञानी बिगड़ै विषयी होई । कथै एक अरु चालै दोई ॥
बुरे करम औगुण चितलावै । भले करम गुण सब बिसरावै ॥
विषय वासना के रँगरातो । झूठ कपटछलबल मदमातो ॥
इन्द्री वश मन हाथ न आवै । पाप करन सों नाहिं डरावै ॥
ज्ञानकथै अरु वाद बढ़ावै । रहन गहन का भेद न पावै ॥
ब्रह्मब्रत्त का आवन भारी । चरणदास शुकदेव बिचारी ॥
दो० उनतीसौ लक्षण लिये, भक्त सहत हो ज्ञान ।
ज्ञान दशा जब आय है, करै आतमा ध्यान ॥
भक्तदशा अब कहत हौं, बिसरै आपा आप ।
चरणदास यों कहत हैं, छूटैं तीनों ताप१ ॥
अष्टपदी ॥
नवधा भक्ति सँभारि अंग नौ जानिले ।
शरवण चितवन और कीर्त्तन मानिले ॥
सुमिरण बन्दन ध्यान और पूजा करो ।
प्रभुसों प्रीति लगाय सुरति चरणन धरो ॥
होकरि दासहि भाव साध संगति रलो ।
भक्तन की कर सेव यही मत है भलो ॥
आपा अर्पण देय धीर्य्य दृढ़ता गहौ ।
क्षमा शील सन्तोष दया धारे रहौ ॥
यह जो मैंने कहा वेद का फूल है ।
योग ज्ञान वैराग्य संबन का मूल है ॥
प्रेम भक्ति का तात पात तीनों१ नसैं ।
अर्थ धर्म काम मोक्षसकल तामें बसैं ॥
जो राखै मंन माहिं विवेक विचारसों ।
१ दैहिक दैविक भौतिक ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । ३८१.
पावै पद निर्वाण बचै जग भारसों ॥
कहैं गुरू शुकदेव मयाके भाव सों ।
चरणहिं दासा होय सुनौ बहु चाव सों ॥
राग सोरठ व गौरी व आसावरी ॥
साधो नवधा भक्ति करौ रे ।
कलियुग में यह बड़ो पदारथ गहिगहि ताहि तरौरे
जेजे यासों भये शिरोमणि तिन को नाम सुनाऊं ।
बढ़ै कथा विस्तार कहूं तो याते सूक्ष्म गाऊं ॥
जन प्रहलाद तरो सुमिरण ते बन्दनसों अक्रूर ।
चरण कमल की सेवा सेती लक्ष्मी रहत हजूर ॥
चन्दन चर्चतहूं पृथुराजा उतरो भव जलपारा ।
बलि राजा तन अर्पण कीन्हों सदा रहैं हरि द्वारा ॥
परमदास हनुमतहू उबरो उत्तम पदवी पाई ।
सखा सुभाव तरो है अर्जुन ताकी महिमा गाई ॥
मुक्त भयो है परीक्षित राजा सुनि भागोत पुराना ।
श्रीशुकदेव मुनी से वक्ता हुये रूप भगवाना ॥
ज्ञान योग वैराग्य सबन सों प्रेम प्रीति है न्यारी ।
चरणदास ने गुरु किरपा सों सांची बात बिचारी ॥
दो० नवो अङ्ग के साधतैं, उपजै प्रेम अनूप ।
रणजीता यों जानिये, सब धर्मन का भूप ॥
सब मत अधिकी प्रेम बतावैं । योग युगत सूं बड़ा दिखावैं ॥
प्रेमहिंसूं उपजै वैराग । प्रेमहिंसूं उपजै त्याग ॥
प्रेम भक्तिसूं उपजै ज्ञाना । होय चांदना मिटै अज्ञाना ॥
दुरलभ प्रेम जु हाथ न आवै । हरि किरपा करिदै तौ पावै ॥
प्रेम प्रीतिके वश भगवाना । सकल शास्तर कियो बखाना ॥
:१८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
किसी भक्त हिये प्रेमजु जागे । तौ हरि दरशत रहै जु आगे ॥
प्रेमहिंसूं जग कूं उपजावै । निरगुन सरगुन हो हो आवै ॥
सकल शिरोमणि प्रेमहि जानौ । चरणदास निहचै मन आनौ ॥
दो० प्रेम बराबर योग ना, प्रेम बराबर ज्ञान ।
प्रेम भक्तिविन साधुवा, सबही थोथा ध्यान ॥
प्रेम छुटावै जगतकूं, प्रेम मिलावै राम ।
प्रेम करै गति औरही, लै पहुँचे हरिधाम ॥
अष्टपदी ॥
वह करै काग सूं हंसा । एकरहै पिया का संसा ॥
वह जात वरन कुल खोवै । अरु बीज बिरह का बोवै ॥
जो प्रेम तनक चित आवै । वह औगुण सबै नशावै ॥
प्रेमलता जब लहरै । मन बिना योगही ठहरै ॥
कोई चतुर खिलारी खेलै । वह प्रेम पियाला झेलै ॥
जो धड़ पै शीश न राखै । सोई प्रेम पियाला चाखै ॥
तन मन सूं जा बौराई । वह रहै ध्यान लौलाई ॥
वह पहुँचे हरिके पासा । यों कहैं चरण ही दासा ॥
दो० प्रेमीजन हरि आपहो, आपा निकसै नाहिं ।
गुरु शुकदेव दिखावई, समझ देखि मनमाहिं ॥
हिरदे माहीं प्रेम जो, नैनौं झलकै आय ।
सोइ छका हरिरस पगा, वा पग परसो धाय ॥
गदगद वाणी कंठमें, आंसू टपकैं नैन ।
वहतौ बिरहिनि रामकी, तलफत है दिनरैन ॥
हाय हाय करि कब मिलैं, छाती फाटी जाय ।
ऐसा दिन कब होंयगा, दरशन करैं अघाय ॥
बिन दरशन कल ना पडै, मनुआँ धरै न धीर ।
भक्तिपदार्थवर्णन । १८३
चरणदासकी श्याम बिन, कौन मिटावै पीर ॥
पीवविना ना जीवना, जगमें भारी जान ।
पिया मिलै तौ जीवना, नहीं तौ छूटै प्रान ॥
मुख पियरो सूखै अधर, आखैं खरी उदास ।
आहिजु निकसै दुख भरी, गहिरे लेत उसास ॥
वह बिरहिनि बौरी भई, जानत ना कोइ भेद ।
अगिनि बरै हियरा जर, भये कलेजे छेद ॥
अपने वश वह ना रही, फँसी बिरह के जाल ।
चरणदास रोवत रहै, सुमिरिसुमिरि गुणख्याल ॥
बातन को बिरहा लगो, ज्यों घुन लागो दारुँ ।
दिन दिन पीरी होतहै, पिया न बूझै सार ॥
वै नहिं बूझैं सारही, बिरहिनिकौन हवाल ।
जब सुधि आवै लालकी, चुभत कलेजे भाल ॥
पीव चहौ कै मत चहौ, वहतौ पीकी 'दास ।
पियके रँगराती रहै, जग सों होय उदास ॥
पीपी करते दिन गया, रैनि गई पिय ध्यान ।
बिरहिनिके सहज सधै, भक्तियोग अरु ज्ञान ॥
बिरहिनि एकैरामबिन, और न कोई मीत ।
आठ पहर साठौ घड़ी, पियामिलनकी चीत ॥
जाप करै तौ पीवका, ध्यान करै तौ पीव ।
पीव बिरहिनिका जीवहै, जीबिरहिनिका पीव ॥
१ ओँठ २ काष्ठ ॥
१८४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अथ चारौँयुगवर्णन ॥
कुंडलिया ॥
सत्युग सांचा बोलते परमहंस को ध्यान ।
सतवादी सत रखते सत नहिं देते जान ॥
सत नहिं देते जान प्रान जोपै तजि देही ।
निश्चय होती मुक्ति दरशते राम सनेही ॥
शुकदेव कहि चरणदाससों अवहीं सत्युगजान ।
सत बोलौ सतसों रहो सतकी गहिये आन ॥
त्रेता में तप साधते आसन संयम धार ।
पांचौ इन्द्री रोकते जब मन जाता हार ॥
जब मन जाता हार खैंचि अनहद में धरते ।
कै अपनीही इष्ट ध्यान ताही को करते ॥
आप विसर्जन होय मुक्ति निश्चय करि पाते ।
चरणदास शुकदेव तपस्या चाल दिखाते ॥
द्वापर पूजा बंदना प्रेम सहितजो होय ।
कहा राजसी मानसी पूजा कहिये दोय ॥
पूजा कहिये दोय जैसि जाके मन भावै ।
धरै नेम आचार अंत ना चित्त डुलावै ॥
हित करि पूजा कीजिये द्वापर को यह भेव ।
चरणदास निश्चय करौ कहिया श्रीशुकदेव ॥
कलियुग हरि गुण गाइये गुणावादही सार ।
भजनकरो मन मगन ह्वै भय अरु सकुच निवार ॥
भय अरु सकुचनिवार जाति कुल गर्व बहावो ।
साज बाज लै संग रामको गाय रिझावो ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १८५
कथा कीर्त्तन सों तरै कलियुगही के माहिं ।
शुकदेवकहिचरणदाससों तारौगहिगहिबांहिं ॥
इति श्रीचारौयुगसम्पूर्णम् ॥
अथ नाम अंग वर्णन ॥
दो० प्रणऊं¹ श्री शुकदेव कूं, वाणी कहूँ अगाध ।
महिमा गाऊं नाम की, सबमिलिसुनियोसाध ॥
ज्योंकी त्योंहीं कहत हूँ, कछू न राखूं भेद ।
निश्चय आवै नाम की, छूटै सबही खेद ॥
जनम मरनजम दंड के, गर्भवास की त्रास ।
नाम रटे सबही छुटै, लख चौरासी गाँस ॥
कई बार जो यज्ञ करि, योग करै चितलाय ।
चरणदास कहैं नाम बिन, सभी अफल होजाय ॥
आठ धात मैं गुण नहीं, जो पारस के माहिं ।
तप तीरथ व्रत साधना, राम नाम सम नाहिं ॥
ज्यों सेमर का सेवना, ज्यों लोभी का धर्म्म ।
अन्न बिना भुस कूटना, नाम बिना यों कर्म्म ॥
छोड़ै सबही वासना, हो बैठे निष्काम ।
चरण कमल मैं चित धरै, सुमिरै रामहिं राम ॥
ऐसा हो जब संत हो, तब रीझै करतार ।
दरशन दे अपना करै, कभी न छोड़ै लार ॥
चार वेद² किये ब्यास ने, अर्थ बिचार विचार ।
तामें निकसी भक्तिही, राम नाम ततसार ॥
जिन कहिया शुकदेव कूं, सुनिया प्रेम प्रतीति ।
१ नमस्कार २ ऋगवेद सामवेद यजुर्वेद अथर्वणवेद ॥
१८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तिनजगमेंपरगट कियो, जैसी चहिये रीति ॥
ब्रह्महत्या अरु नारि की, बालक हत्या होय ।
राम नाम जो मन बसै, सब कूं डारै खोय ॥
हियआवत जगदुख टरै, कंठ आय अघ जाय ।
मुख सूं बोलै आयकरि, ताकी कौन चलाय ॥
ऐसाही हरि नामहीं, मोहि रामकी सौहिं ।
जाकूं होवै परखही, सो समझैहां लौहिं ॥
बिन समझे पातक नशै, समझ जपै हो मुक्त ।
चरणदास यों कहत हैं, जो कोइ जानै युक्त ॥
नामहिं लैजल पीजिये, नामहिं लेकर खाह ।
नामहिं लेकर बैठिये, नामहिं लै चल राह ॥
जबलग जागैराम कहु, तन मन सूं यहिचीत ।
चरणदास यों कहत है, हरिविन और न मीत ॥
तेरा तौ कोइ है नहीं, मात पिता सुत नार ।
ताते सुमिरौ राम कूं, हे मन वारंबार ॥
जिहिकारण भटकतफिरै, घरघर करत सलाम ।
तेरे तौ वैहैं नहीं, ये मन सुमिरौ राम ॥
जीवतही स्वारथ लगै, मूये देह जराय ।
ऐ मन सुमिरौ राम कूं, धोखे काहि पराय ॥
हाथी घोड़े धन घना, चंदमुखी बहु नार ।
नाम बिना यमलोक में, पावे - दुःख अपार ॥
जबलग जीवै राम कहु, रामहिं सेती नेह ।
जीव मिलैगो राम में, पड़ी रहैगी देह ॥
अचरज साधन नामका, भक्तियोग का जीव ।
जैसे दूध जमाय कै, मथिकरिकाढ़ा घीव ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १८७
कुंडलिया ॥
आठ मास मुखसूं जपै सोलह मास कँठ जाप ।
बत्तिस मास हिरदै जपै तनमें रहै न पाप ॥
तनमें रहै न पाप भक्ति का उपजै पौधा ।
मन रुकजावै जहां अपरबल कहिये योधा ॥
शुकदेव कही चरणदास सूं यही भेद ततसार ।
बहुरु आवै नाभिमें ताका कहूं विचार ॥
दो० पांच बरष जप नाभिसों, रग रग बोलै राम ।
देह जीव निज भक्तहो, पहुँचै हरिके धाम ॥
त्रिकुटी में जप रामकूं, जहां उजाला होय ।
श्वासा माहीं जपेते, द्विविधा रहै न कोय ॥
गगन मँडलमें जापकरि, जितहै दशवांद्वार ।
चरणदास यों कहत हैं, सो पहुँचै हरिदरबार ॥
नासा अग्रे जापकरि, देखै नूर अगाध ।
बहुतक अचरज अरुखुलै, चरणदास कहेसाध ॥
नाम उठाकर नाभिसूं, गगन माहिं लैजाय ।
जहां होय परकाशही, शुकदेव दिया बताय ॥
मनही मनमें जापकरि, दरपण उज्ज्वल होय ।
दरशन होवै रामका, तिमिर¹ जाय सबखोय ॥
कूककूक-कर नाम जप, छुटै सात अरु पांच ।
जासों मन ठहरा रहै, चरणदास कहैं सांच ॥
सुरत माहि जो जप करै, तन सूं न्यारा जौन ।
मिलै सच्चिदानन्द में, गहे रहै जो मौन ॥
सकल शिरोमणि नामहै, सब धर्मन के माहिं ।
१-अँधेरा ॥
१८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अनन्य¹ भक्त वहि जानिये, सुमिरण भूलै नाहिं ॥
आन धरम मानै नहीं, आन देव नहिं ध्यान ।
ऐसे भक्त अनन्य कूं, कोई पावै जान ॥
पतिव्रता वह जानिये, आज्ञा करै न भंग ।
पिय अपने के रँग रतौ, और न सून ढंग ॥
अपने पियकूं सेइये, आन पुरुष तजिदेह ।
परघर नेह निवारिये, रहिये अपने गेह ॥
आज्ञाकारी पीव की, रहै पिया के संग ।
तन मनसूं सेवा करै, और न दूजो रंग ॥
रंग होय तौ पीव को, आन पुरुष विषरूप ।
छाहँ बुरी परधर्मकी, अपनी भली जु धूप ॥
अपने घरका दुख भला, परघरका सुख छार ।
ऐसे जानै कुलवधू, सो सतव²न्ती नार ॥
पतिकी ओर निहारिये, औरन से कह काम ।
सबै देवता छोड़करि, जपिये हरिका नाम ॥
खसम तुम्हारो राम है, इत उत झख मत मारि ।
चरणदास यों कहत हैं, यही धारणा धारि ॥
यह शिर नवै तो रामकूं, नाहीं गिरियो टूट ।
आन देव नहिं परसिये, यह तन जावो छूट ॥
पतिव्रता को व्रत गहौ, व्यभिचारिणि अँगटार ।
पति पावै सब दुख नसै, पावै सुख अपार ॥
जब तू जानै पीवही, वह अपनी करि लेहि ।
परमधाम मैं राखि करि, बाँह पकरि सुख देहि ॥
यही सिखाये देतहूँ, धारो हिरदय माहिं ।
१ जो दूसरे को न जानै २ पतिव्रता ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १८६
ऐसा पौधा बोईये, ताकी बैठो छाहिं ॥
सतवादी संतसूं रहो, सतही मुखसूं बोल ।
एक ओर हरिनाम रख, एक ओर जग तोल ॥
सभी निचोरे कहतहूं, भक्ति करो निष्काम ।
कोटि तपस्या यही है, मुखसूं कहिये राम ॥
रामनाम मुखसूं कहै, रामनाम सुन कान ।
रोम रोम हरिकूं रटो, ऐसी गहिये बान ॥
विद्या माहीं वाद है, तपके माहीं ऋद्धि ।
राम नाम में मुक्त है, योगमाहिं यों सिद्धि ॥
ताते त्यागो वासना, राखो रामहिं नाम ।
कोटिबन्ध छुटि जायँगे, पहुँचो हरि के धाम ॥
राम नाम में ये सबै, ऋद्धि सिद्धि अरु मोक्ष ।
ऐसा इष्ट सँभारिये, चरणदास कहि सोच ॥
जाका कीया सब बना, सात द्वीप नवखण्ड ।
चरणदास यों कहत हैं, तीन लोक ब्रह्माण्ड ॥
तवकारण सब कुछ किया, नाना विधि सुख दीन ।
तैं वाकूं जाना नहीं, नाम न कबहूं लीन ॥
अबकै औसर फिरिबन्यो, पाई मानुष देह ।
चरणदास यों कहत हैं, राम नामहीं लेह ॥
राग केदारा ॥
सुनौ भाई नाम की महिमा ।
मुक्ति चारों सिद्धि आठों बसत हैं तहिमा ॥
बालमीकि सो बनके बासी किये थे जिन पाप ।
भयो है सब ऋषिशिरोमणि जपे उलटे जाप ॥
गणिका सी अति महापापी सो पढ़ावत कीर ।
१६० श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
नामके परताप सेती कियो हरिपुर सीर ॥
अजामिल से पतित कामी वेश्यासों रति कीन ।
चढ़ि विमानै गयो सुरपुर नाम सुतहित लीन ॥
और बहुतै पतित तारे गिने कापै जाहिं ।
दान जप तप योग संयम नाम सम तुल नाहिं ॥
व्यास नारद शिव ब्रह्मादिक रटत जाकूं शेष ।
गुरू शुकदेव नाम को चरणदासकूं उपदेश ॥
कवित्त ॥
नामके प्रताप नन्दलाल आप भये प्रभु नामके प्रताप सुत दशरथ को कहायो है ।
नामके प्रताप पैज राखी प्रहलादजूकी नामके प्रताप दौरो द्वारका सूं धायो है ॥
नामके प्रतापकी न महिमा मोपै कहीजात नामके प्रताप सब सन्तन सहायो है ।
सोई नाम वास सब आस लगो चरणदास सोई नाम चारवेद विमल २ गायो है ॥
नामके प्रताप शबरी सुरन तैं सरस करी नामके प्रताप अधम लोककूं पठायो है ।
नामके प्रताप अजामीलकूं विमान आयो नामके प्रताप गज ग्राहसूं छुटायो है ॥
नामके प्रताप सब दीनन को दुख हरो नामको प्रताप शुकदेवजी दृढ़ायो है ।
सोई नाम वास अब आस लगो चरणदास सोई नाम चारवेद विमलं २ गायो है ॥
दो० नामअंगमहिमाअधिक, मोपै कही न जाय ।
पांच प्रेत अब कहत हूं, जाकूं सुनिचितलाय ॥
योग तपस्या भक्ति कूं, ज्ञान बिगाड़न पांच ।
जीवत दुखदै जगत में, मुये नरक दै आंच ॥
काम क्रोध मोह लोभसे, और पांचवां गर्व ।
राज करै वसुधा बिषे, इन वश कीने सर्व ॥
काम बली वर्णन करूं, जिन मारे बलवन्त ।
जाका बकसी नारि है, जीते गुणी महन्त ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १६१
राग सोरठ ॥
साधो नारि सबलरे भाई । नहिं मान राम दुहाई ॥
बांदर ज्यों पकरि नचावै । हरिजी सूं नेह छुटावै ॥
दया धर्म सब खोवै । जब नैनकजल भरि जोवै ॥
जिनका चित चोरा रांड़ी । तिनकी जग थू थू भांडी ॥
उन सबही सरवस खोया । नरशीशपकरि करि रोया ॥
जनम पदारथ छीना । स्याही का टीका दीना ॥
दोनों मुखसों खाया । फिर फिरकै गरभ दिखाया ॥
काम कटक में सूरी । वह सांवत कहिये पूरी ॥
बड़े बड़े योधा मारे । अरु बहुतक शूर पछारे ॥
गुरु शुकदेव बतावै । बटमारन तोहिं दिखावै ॥
चरणदास कहे जानौ । तुम छलवल कला पिछानौ ।
नारी ने हरि सुमिरण सूं खोये ।
राजा परजा मुंडत चुंडत नैनकटाक्षन मोहे ॥
राती चूनर चटक मटकले भूषण काजल साधै ।
मुड़ मुसकावै मधुरी वाणी प्यार प्रीतकर बांधै ॥
बहुतनको उन योग छुटाया बहुतनकोतप छीन्हों ।
बहुतनकी उन भक्ति बिगारी अंग विषयरस दीन्हों ॥
बंधुवां करि बहु नाच नचायो फंदा मोह लगायो ।
याते सावधानही रहियो मैं तुमकूं समुझायो ॥
गुरु शुकदेव बतावै साधो निश्चय ठगिनी जानौ ।
चरणदास कहैं हाथ न आवो नीकै ताहि पिछानौ ॥
साधौ परतिरिया सूं डरियो ।
जाके दरश परशके कीये जीवत नरकमें परियो ॥
गौतम घर¹नीसुन्दरि सुनिकै इन्द्रासन तजिआयो ।
१ स्त्री ॥
१६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो गति भई जगत मैं जानी भलो कलंक लगायो ॥
श्रृङ्गी ऋषि वन में तप कीन्हों सुरपति देखि डरायो ।
रंभा¹ भेजि हरो सत जाको सबही तेज सिरायो ॥
दैंयत देवत नर जो हुये नारी देख लुभाये ।
ताको फल ऐसोही पायो अजहूं कुयश सुनाये ॥
चरणदास शुकदेव गुरूने दे उपदेश बचाये ।
यती सती कोइ हाथ न आयो कामी पकरि नचाये ॥
अरे नर परनारी मत तक रे ।
जिन जिन ओर तको डायनकी बहुतन कूं गई भखरे ॥
दूध आक² को पात कटइया झाल अँगनकी जानौ ।
सिंह मुखारे विष कारेको ऐसे ताहि पिछानौ ॥
खोनि नरककी अतिदुख दाई चौरासी भरमावै ।
जनम जनमकूं दाग लगावै हरिगुरु तुरत छुटावै ॥
जगमें फिटिफिटि महिमा खोवै राखै तन मन मैला ।
चरणदास शुकदेव चितावै सुमिरो राम सुहेला ॥
दो० नर नारी सब चेतियो, दीन्हो प्रकट दिखाय ।
परतिरिया परपुरुष हो, भोग नरकको जाय ॥
परनारी कै आपनी, दोनों बुरी बलाय ।
घर बाहर का आग ज्यों, देवै हाथ जलाय ॥
चटक मटक सब छोड़दे, देही रूप बिगार ।
देख न कोई रीझ हैं, ना होवै लगवार ॥
यही ढाल है जत्तकी, लगै न शस्तर काम ।
आठ अंग हैं काम के, तासूं रहु निष्काम ॥
काम कान में आय करि, फिर आवत है नैन ।
बहुरि हिये में आय करि, लगै बहुत दुख दैन ॥
१ अप्सरा २ मदार ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १४३
वह काम बुरारे भाई । सब देवै तन बौराई ॥
पंचों में नाक कटावै । वह जूती मार दिलावै ॥
मुँह काला गधे चढ़ावै । बहुलोग तमाशे आवै ॥
झिड़का ज्यों डोलै कूता । सबही के मन सूं ऊता ॥
कोई नीके मुख नहिं बोलै । शरमिंदा¹ जग में डोलै ॥
वह जीवत नरक मँझारी । सुन चेतौ नर अरु नारी ॥
काम अंग तजि दीजै । सतसंगतिही करि लीजै ॥
कहैं चरणहीं दासा । हरि भक्तन में कर वासा ॥
दो० तन मन जारै कामहीं, चित करै डावांडोल ।
धरम करम सब खोय कै, रहै आप हिय खोल ॥
वह दया क्षमा को मारै । जत सतको पकरि पछारै ॥
शुचि² नेमको दूरि कढ़ाबै । मुख ऊपर धूरि उड़ावै ॥
जग भीतर महिमा खोवै । पापों की माला पोवै ॥
वह धीरज नाहीं राखै । वह मुखसों झूठी भाखै ॥
वह चाल चले विपरीता³ । करि विषय भोगकी चीता ॥
काम बली जहँ आवै । अरु बहुतक औगुण लावै ॥
यह मैनखोट का पूरा । कोइ जीतै गुरुमुख शूरा ॥
साधु भक्ति वह गुनियां । जिन कामदुष्ट को हनियां ॥
चेत कही शुकदेवा । सब चरणदास सुनिलेवा ॥
दो० सुनिकै जो चित में धरै, फेरि चलै वह चाल ।
खांड़ा पकरे शीलका, काम हनै ततकाल ॥
अथ क्रोध अंग ॥
क्रोध महाचण्डाल है, जानत है सब कोय ।
जांके अँग वरणन करूं, सुनियो सुरतिसमोय ॥
- १ लज्जित २ पवित्र ३ उलटी ॥
१६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
रागभैरवँ ॥
क्रोधभूतके चरित सुनाऊं । भिन्न भिन्न पैरगट दिखलाऊं ॥
क्रोध भूत जब तापर आवै । तन मनकी सब सुधि बिसरावै ॥
नैनालाल वदन सब कारो । रोम रोम व्यापै हत्यारो ॥
महाचण्डाल नीच अतिघोरी । अति विपरीत बुद्धि करिऔरी ॥
अपने हाथ आपको मारै । अपने कपड़े आपहि फारै ॥
मुहंड़े १ झाग मरोड़ै हाथा । कहै बहकती फूहड़ बाता ॥
हाफै बहुत आपको गाली । जेंवत आवै पटकै थाली ॥
कबहुँ शस्त्र सों मारन लागै । कवहूं कूंये पड़ने भागै ॥
भली कहै ताहि भोग सुनावै । बुरे भले पर ईंट चलावै ॥
सबल देख शीला हो जावै । निवल देखि बहु दुन्दि मचावै ॥
याका यतन करो मन भावै । चरणदास शुकदेव बतावै ॥
दो० जिहि घट आवै घूमरू, करै बहुतही खुमार ॥
पति खोवै बुद्धिकूं हनै, कहा पुरुष कह नारि ॥
वह बुद्धि भ्रष्ट करि डारै । वह मारहि मार पुकारै ॥
वह सब तन हिंसा छावै । कहिं दया न रहने पावै ॥
वह गुरु से बोलै बेंड़ा । साधों सूं डोलै ऐंडा ॥
वह हरसूं नेह छुटावै । वह नरक माहिं लेजावै ॥
वह आतमघाती जानौ । वह महामूढ़ पहिचानौ ॥
सोंटोंकी मार दिलावै । कबहुँ कै शीश कटावै ॥
वह नीच कमीना कहिये । ऐसे सूं डरता रहिये ॥
वह निकट न आवन दीजै । अरु क्षमा अंकै २ भर लीजै ॥
जब क्षमा आय किया थानौँ ३ । तब सबही क्रोध हिराना ॥
कहैं गुरु शुकदेव खिलारी । सुनु चरणदास उपकारी ॥
१ मुखको कहते हैं २ गोदी ३ मुकाम ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १६५
—अथ मोहअंग ॥
दो० क्रोध अंग पूरो कियो, कहूं मोहका अंग ।
जाहि लगै दुखदे घना, कवहूं न छोड़ै संग ॥
माया मोह बिछाइया, जाल संभारि सँभारि ।
आय आय तामें फँसे, बहुत पुरुष बहुनारि ॥
फँसे आय करि चावसूं, लेन गया नहिं कोय ।
चरणदास यों कहत हैं, पछिताये कह होय ॥
छूट सकै नहिं जालसूं, मिरगा ज्यों अकुलाय ।
कूद कूद निकसो चहै, ज्यों ज्यों उरझत जाय ॥
मोह शहदसम जानिये, मक्खी सम जिय जान ।
लालच लागे जितफँसे, शीश धुनै अज्ञान ॥
बन्दी खानो भवन' है, सब दिन धंधे जाइ ।
मोह छुटावै राम सूं, डारै नरक मँझाइ ॥
लख चौरासी योनि में, फिर वह भरमें जाय ।
हाँसे निकसै कठिन सूं, कबहूं औसर पाय ॥
तिरिया मोह महाबलदायी । मोह संतान सदा दुखदायी ॥
मोह कुटुंब अरु भाई बंधा । समझै नहीं मूढ़ मति अंधा ॥
देव भूत जिहि कारण धावै । ठग चोरी करि खोट कमावै ॥
वस्तर भूषण वाहन मोहा । सबामलि किया जीव संद्रोहा² ॥
द्रव्य लाल अरु हीरा मोतो । सब मिलि मोह लगावैं गोती ॥
मोह महल धरती¹ अरु गाऊं । बड़ा मोह जू अपना नाऊं ॥
जामें फँसे रंक³ अरु राजा । तिहिकारण धंधा दुखसाजा ॥
परकाजैं बहुतै दुख पाया । अपना सबही मूल गवाँया ॥
बड़े बड़े खेद उठाये सबहीं । भूले ध्यान राम का जपहीं ॥
घर २ बैर ३ दरिद्री ॥
१६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जोते मोह शूरमा कोई । मिलै रामकूं साधू सोई ॥
होय मुक्ति जग बहुरि न आवै । चरणदास शुकदेव बतावै ॥
दो० मोह बड़ा दुख रूप है, ताकूं मार निकास ।
प्रीति जगतकी छोड़ दे, जब होवै निरवासं१ ॥
जग माहीं ऐसे रहो, ज्यों जिह्वा मुखमाहिं ।
घीव घना भक्षण करै, तौभी चिकनी नाहिं ॥
जग माहीं ऐसे रहो, ज्यों अम्बुज सर२ माहिं ।
रहै नीर३ के आसरे, पै जल छूवत नाहिं ॥
ऐसा हो जो साधु हो, लिये रहै वैराग ।
चरण कमल में चित धरै, जगमें रहै न पाग ॥
मोहबली सब सूं अधिक, महिमा कही न जाय ।
जाको बांधो जग सबै, छूटै ना बौराय ॥
अथ लोभअंग ॥
लोभ नीच वर्णन करूं, महापाप को खानि ।
मंत्री जाका झूठ है, बहुत अधर्मी जानि ॥
तृष्णा जाकी जोयँ४ है, सो अंधा करि देय ।
घटी बढ़ी सूझै नहीं, महा कालका भेय ॥
दम्भ मकर छल भगल जो, रहत लोभके संग ।
मुये नरक लै जायँगे, जीवत करै उदंग ॥
देवैं धर्म छुटाय ही, आन धर्म ले जाय ।
हरि गुरु ते बेमुख करें लालच लोभ लगाय ॥
चहूं देश भरमत फिरै, कलह५ कलपना साथ ॥
लोभ काज उठउठ लगैं, दोउ पसारै हाथ ॥
लोभी भक्त होय नहिं कबहीं । साधु पुराण कहत हैं सबहीं ॥
१ वासना से रहित २ तालाब ३ जल ४ स्त्री ५ लड़ाई ॥