भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
१६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अरु सब गुण वा माहिं जु अधिक अनूपही ॥
पावै केवल¹ ज्ञानसुं , आप में आपही ।
वावन अक्षर माहिं नाम नहिं थापही ॥
वह तौ निर आनन्द काहु से है नहीं ।
कठिन परापत होय सुलभ देखै नहीं ॥
दो० वह उपजै विनशै नहीं, अज² अविनाशीसोय ।
बिन इच्छा थिरही रहै, चरणदास नित जोय ॥
अष्टपदी ॥
वह सबही को विराट पिण्ड अरु जीव है ।
नाना कौतुक होयं अन्त वहि सीव है ॥
ज्ञान से जुदा न जान निरा वह ज्ञान है ।
वही महा आकाश नहीं परमान है ॥
सबमाहीं परवेश जो आतम सत्त है ।
आपमें पूरण आप परमही तत्त है ॥
अज्ञानी जानै झूठ झूंठ पहुचै नहीं ।
वह तौ सदा नित जान कभी विनशै नहीं ॥
वाकूं कहा नहिं जाय जाप जापक कभी ।
अरु सारे हैं जाप उसी माहीं सभी ॥
और जपाभीगया जाप जापक वही ।
सबकुछ उसकूं जान गुप्त³ परगट सही ॥
वह निर्गुण निर्लिप्त कोई गुण नाहिनै ।
परसूं पर तापरै जानिले वाहनै ॥
वासूं पर नहिं और विचारा जायना ।
कहैं चरणहींदास कछू वा माहिंना ॥
१ सूक्ष्म २ जो पैदा न हो ३ छिपाहुआ ॥
तेजविन्दूपनिषद्वर्णन । १६१
दो० वाकूं जाग्रत है नहीं, वाकूं स्वप्न न कोय ।
सोवन स्वप्ना है नहीं, जाग्रत कैसे होय ॥
अष्टपदी ॥
दुऔ से न्यारा जान जाग्रत अरु स्वप्नसूं ।
ऐसा कोई नाहिं न जानै सत्तहूँ ॥
सबका जानत मूल जु ज्ञानी लोयही ।
दीरघ अरु परकाशी जानै सबको यही ॥
जाकूं लोभ न होय अविद्या^१ होयना ।
भै अभिमान कुकर्म वासना कोयना ॥
गरमी जाड़ा भूख प्यासं व्यापै नहीं ।
पह्ये क्रोध न मोह नेक वामें कहीं ॥
वाहन इच्छा होय न पूरी चाहहीं ।
कुल विद्या अभिमान न उनके माहिहीं ॥
मान नहीं अपमान न मन में लावई ।
सबसूं होय निवृत्त ब्रह्मकूं पावई ॥
तेजविन्द उपनिषद् संपूर्णही भई ।
गुरु शुकदेव के दास चरणदासा कही ॥
ताहि सुनै मनराखि विचाराही करै ।
निश्चय होवै मुक्त जगत में ना परै ॥
दो० कही गुरू शुकदेव ने, मेरी कछू न बुद्धि ।
पढ़ो नहीं मूरख महा, मोकूं नेक न शुद्धि ॥
मेरे हिरदय के बिषे, भवन^२ कियो गुरु आय ।
वई विराजत हैं सदा, मेरी देह दिखाय ॥
जबसूं गुरु किरपाकरी, दर्शन दीन्हों मोय ।
१ माया २ घर ॥
१६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रोम रोम में वै रमे, चरणदास नहिं कोय ॥
जातिवरणकुलमनगया, गया देह अभिमान ।
अपने मुखसों कह कहौं, जगही करै बखान ॥
रहे गुरू शुकदेवजी, मैं मैं गई नशाय ।
मैं तैं तैं मैं वही है, नखशिखरहो समाय ॥
इति श्रीचरणदासकृतपंचोपनिषद् संपूर्णम् ॥
अथ चरणदासजीकृत भक्तिपदार्थ
प्रारम्भः ॥
दो० प्रणवों श्रीमुनि व्यासजी, मम हिरदय में आय ।
भक्तिपदारथ कहत हूं, तुम्हीं करौ सहाय ॥
प्रेम पगावन ज्ञान दे, योग जितावन हार ।
चरणदास की बीनती, सुनियो बारंबार ॥
तुम दाता हम माँगता, श्रीशुकदेव दयाल ।
भक्ति दई ब्याधा गई, मेटे जग जंजाल ॥
किसू कामके थे नहीं, कोऊ न कौड़ी देह ।
गुरु शुकदेव कृपाकरी, भई अमोलक देह ॥
को है कोई न जानता, गिनती में नहिं नाँवँ ।
गुरु शुकदेव कृपाकरी, पूजन लागे पावँ ॥
सीधी पलक न देखते, छूते नाहीं छाहिं ।
गुरु शुकदेव कृपा करी, चरणोदक लेजांहिं ॥
दूसरे के बालकहुते, भक्ति बिना कंगाल ।
१ उपद्रव ॥
• भक्तिपदार्थवर्णन । १६३
गुरु शुकदेव दयाकरी, हरिधन किये निहाल ॥
जा धन कूं ठग ना लगे, धारी सकै न लूट ।
चोर चुरायसकै नहीं, गाँठ गिरै नहिं खूट ॥
बलिहारी गुरु आपने, तन मन सदकै जावँ ।
जीव ब्रह्म क्षणमें कियो, पाई भूली ठाँवँ ॥
हरिसेवा सोलह बरस, गुरुसेवा पल चार ।
तौभी नहीं बराबरी, वेदन कियो विचार ॥
गुरुकी सेवा साधू जानै । गुरु सेवा कहा मूढ़ पिछानै ॥
गुरु सेवा सबहुन पर भारी । समझ करो सोई नर नारी ॥
गुरु सेवा सों विघ्न विनाशै । दुरमति भाजै पातक नाशौ ॥
गुरु सेवा चौरासी छूटै । आवागमन का डोरा टूटै ॥
गुरु सेवा यमदण्ड न लागै । ममता मरे भक्ति में जागै ॥
गुरु सेवासूं प्रेम प्रकाशै । उनमत होय मिटै जग आशै ॥
गुरु सेवा परमातम दरशै । त्रैगुण तजि चौथापद परशै ॥
श्रीशुकदेव बतायो भेवा । चरणदास कर गुरुकी सेवा ॥
दो० गुरु सेवा जानैं नहीं, पाँय न पूजै धाय ।
योगदान जप तप कियो, सभी अफल हो जाय ॥
योगदान जप तारथ न्हाना । गुरु सेवा बिन निरफल जाना ॥
गुरु सेवा बिन बहु पछितैहौ । फिर फिर यम के द्वारे जैहौ ॥
गुरु सेवा बिन अतिदुख पैहौ । जग में पशु दारिद्री हैहौ ॥
गुरु सेवा बिन कौन उतारे । भवसागर सूं बाहर डारै ॥
गुरु सेवा बिन जड़ कहा करिहो । काकी नाव बैठि करि तरिहो ॥
गुरु सेवा बिन कहुनहिं सरि है । महाअंध कूप में परि है ॥
गुरु सेवा बिन घट अँधियारा । कैसे प्रकटै ज्ञान उजियारा ॥
नरक निवारण गुरु शुकदेवा । चरणदास करि तिनकी सेवा ॥
१६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रंथ ।
दो० इन्द्रीजित निरवैरता, निरमोही निरबन्ध ।
ऐसे गुरु की शरणसूं, मिटै सकल दुखद्वन्द ॥
राग द्वेषे दोनों से न्यारे । ऐसे गुरू शिष्य कूं तारे ॥
आशा तृष्णा कुबुधि जलाई । तन मन वचन सबन सुखदाई ॥
निरालम्ब निर्भरम उदासी । निरविकार जानौ निरवासी ॥
निरमोहत निरबन्ध निशंका । सावधान निरवाण अशंका ॥
सारग्रही और सर्वंगी । संतोषी ज्ञानी सतसंगी ॥
अयाचीक जत निर अभिमानी । पक्ष रहत स्थिर शुध बानी ॥
निहतरंग नाहीं परपंचा । निहकरम निरलिप्स जो संचा ॥
शीतल तासु मती शुकदेवा । चरणदास कियो सो गुरुदेवा ॥
दो० सतवादी अरु शीलवत, सुहृदै अरु योगीश ।
निहचल ध्यान समाधि में, सो गुरु विस्वेबीश ॥
भरम निवारण भय हरण, दूरकरन सन्देह ।
गुठिया खोलै ज्ञानकी, सो सतगुरु करलेह ॥
सतगुरु के लक्षण कहे, ताकूं ले पहिंचान ।
निरखपरख करदीजिये, तनमन धन अरु प्रान्॥
ऐसा सतगुरु कीजिये, जीवत डारै मारि ।
जनम जनम की वासना, ताकूं देवै जारि ॥
सतगुरु के ढिग जाइकै, सन्मुख खावै चोट ।
चकमक लग पथरीझरै, सकल जरावै खोट ॥
सतगुरु मेरा शूरमा, करै शब्द की चोट ।
मारै गोला प्रेम का, ढहै भरम का कोट ॥
मुखसेती बोलन थका, सुननें थका जू कान ।
पावनसूं फिरबा थका, सतगुरु मारा बान ॥
१ शत्रुता ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १६५
मैं मिरगा गुरुपारधी,- शब्दलगायो बाण ।
चरणदास घायल गिरे, तन मन बींधे प्राण ॥
शब्दबाण मोहिं मारियो, लगी कलेजे माहिं ।
मार हंसे शुकदेवजी, बाकी छोड़ी नाहिं ॥
सतगुरु शब्दी तेग है, लागत दो करदेहि ।
पीठि फेरि कायर भजै, शूरा सन्मुख लेहि ॥
सतगुरु शब्दी सेल¹ { धर्मी का साध ।
कायर ऊपर जो चलै, तौ जावै बरबाद ॥
सतगुरु शब्दी तीर है, तन मन कीयो छेद ।
बेदरदी समझै नहीं, विरही पावै · भेद ॥
सतगुरु शब्दी लागिया, नावक का सा तीर ।
कसकत है निकसत नहीं, होत प्रेमकी पीर ॥
संतगुरु शब्दी बांण है, अंगअंग डालातोड़ ।
प्रेम खेत घायल गिरे, टांका लगै न जोड़ ॥
सतगुरु शब्दी मारिया, पूरा आया वार ।
प्रेमी जूझे खेत में, लगा न राखा तार ॥
ऐसी मारी खैंचकर, लगी वार गइ पार ।
जिनका आपा ना रहा, भयेरूप तत्सार ॥
सतगुरु कै मारे मुये, बहुरि न उपजै आय ।
चौरासी बन्धन छुटै, हरिपद पहुँचे जाय ॥
सतगुरु के वचनों मुये, धन्यजिन्हों के भाग ।
त्रैगुणते ऊपर गये, जहाँ दोष नहिं राग² ॥
वचन लगा गुरुदेवका, छुटे राजके साज ।
हीरा मोती नारि सुत, गज घोड़ाअरु बाज ॥
१ हथियार का नाम है २ प्रेम ॥
१६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वचन लगा गुरु ज्ञानका, रूखे लागे भोग ।
इन्द्र पदवी लौ उन्हें, चरणदास सब रोग ॥
सतगुरु ढूंढा पाइये, नहीं सुहेला होय ।
शिष्य भी पूरा कोईहै, सानी माटी जोय ॥
जाति बरन कुल आश्रम, मान बड़ाई खोय ।
जब सतगुरु के पग लगैं, सांच शिष्य है सोय ॥
गुरु के आगे राखै माथा । कहै पाप ताप दुख मेटो नाथा ॥
मैं आधीन तुम्हारौ दासा । देहु आपने चरणन वासा ॥
यह तन मन ले भेंट चढ़ायो । अपनी इच्छा कुछ न रहायौ ॥
जो चाहो सो तुम्हहीं करो । या भाँड़े में जो कुछ भरौ ॥
भावै धूप छांह में डारो । भावै डोबो भावै तारो ॥
गुण पौरुष कुछ बुधि नहि मेरी । सबविधि सरणगही प्रभु तेरी ॥
मैं चकई अरु तुम किये डोरा । मैं जो फिरूं सब तुम्हारे जोरा ॥
म आ बैठा नाव तुम्हारी । आशा नदी सुं करिये पारी ॥
अमरजाल जग सूं मोहिं काढ़ौ । हाथ जोरि चरणदासा ठाढ़ो ॥
दो० गुरु के आगे जाय करि, ऐसे बोलै बोल ।
कछूकपट राखै नहीं, अर्ज करै मन खोलं ॥
यह आपा तुमकूं दिया, जितजानों तितराख ।
चरणदास द्वारे परौ, भावै झिडको लाख ।
ऋद्धि सिद्धिफल कछु न चाऊं । जगत कामना कूं नहिं लाऊं ॥
और कामना मैं नहिं राखूं । रसना १नाम तुम्हारो भाखूं ॥
राज भोग का मोहिं न सांसा । इन्द्र पदवी लौ नहिं आसा ॥
चौरासी में बहु दुख पायो । ताते शरण तिहारी आयो ॥
मुक्त होन की मन में आवै । आवागमन सों जीव डरावै ॥
१ जिह्वा ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २६७
रामभक्ति की चाह हमारे । याते पकड़े चरण तुम्हारे ॥
प्रेम प्रीति में हिरदा भीजै । यही दान दाता मोहिं दीजै ॥
अपना कीजै गहिये बाहीं । धरिये शिरपर हाथ गुसांई ॥
चरणदास को लेहु उबारे । मैं अंडा तुम सेवनहारे ॥
दो० अंडा ज्यों आगे गिरै, जब गुरु लेव सेइ ।
करै बराबर आपनी, शिष्य को निस्सन्देह ॥
अपना करि सेवन करै, तीनि भांति गुरुदेव ।
पंजा पक्षी कुंजमन, कछुवा दृष्टि जु भेव ॥
जो वै बिसरैं घड़ी भी, तो गंदा होइ जाय ।
चरणदास यों कहत है, गुरु को राखि रिझाय ॥
पितु सोंमाता सौ गुना, सुत को राखै प्यार ।
मनसेती सेवन कर, तन सों डाटरुगार ॥
जो देवैं दुरशीश भी, होहो लगै अशीश ।
सेवन करिसमरथ कियो, उनपर वारौं शीश ॥
माता सों हर सौगुना, जिन से सौ गुरुदेव ।
प्यार करें औगुण हरैं, चरणदास शुकदेव ॥
काचे भांड़े सों रहै, ज्यों कुम्हार को नेह ।
भीतर सों रक्षा करै, बाहर चोटैं देह ॥
दृष्टि पड़ै गुरुदेव की, देखत करैं निहाल ।
औरै गति पलटैं जबै, कागा होत मराल ॥
दया होय गुरुदेव की, भजै मान अरु मैन१ ।
भोगे वासना सब छुटै, पावै अतिही चैन ॥
जबसतगुरु किरपा करें, खोलि दिखावैं नैन ।
जग झूठा दीखन लगै, देंह परे की सैन ॥
१ कामदेव ॥
१३
१६८ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
अष्टपदी ॥
गुरु बिन और न जान मान मेरो कहो ।
चरणदास उपदेश बिचारतही रहो ॥
वेदरूप गुरु होय कि कथा सुनावई ।
पण्डित को धरिरूप कि अरथ बतावई ॥
गुरु हो शेष महेश तोहिं चेतन करै ।
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु होय खाली भरै ॥
कल्पवृक्ष गुरु देव मनोरथ सब सरै ।
कामधेनु गुरुहोय क्षुधा तृष्णा हरै ॥
गंगासम गुरु होय पाप सब धोवई ।
शशियर सम गुरू होय तपन सब खोवई ॥
सूरजसम गुरु होय तिमिर सब लेवई ।
पारब्रह्म गुरु होय मुक्ति पद देवई ॥
गुरुही को करि ध्यान नाम गुरु को जपौ ।
आपा दीजै भेंट पूजन गुरुही थपौ ॥
समरथ श्रीशुकदेव कहा महिमा करौं ।
अस्तुति कही न जाय शीश चरणन धरौं ॥
दो० हरि रूठै कुछ डर नहीं, तूभी दे छुटकाय ।
गुरु को राखौ शीशपर, सबविधि करें सहाय ॥
अष्टपदी ॥
गुरुकोतजि हरि सेव कभी नहिं कीजिये ।
वे मुख को नहिं ठौर नरक में दीजिये ॥
गुरुनिंदक नहिं मुक्त गर्भ फिरि आवई ।
चौरासी लख भुक्ति महा दुख पावई ॥
१ सिखावना २ भूख ३ अंधकार ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १६६
प्रथम करै गुरु देख परखि चरणों परै ।
उनकी धारण ध्यान टेक उर में धरै ॥
गुरु को रामहिं जान कृष्ण सम जानिये ।
गुरु नृसिंह अवतार जु बामन मानिये ॥
गुरु कोपूरण जान जु ईश्वर रूपही ।
सब कुछ गुरुको जान ये बात अनूपही ॥
हरि गुरु एकहा जानयह निहचै लाइये ।
दुबिधाही को बोझ जु वेग वगाइये ॥
धर्म्म पिता गुरुजान जु दृढ़ता राखिये ।
लाज़ सकुच करि कान ढीठता नाखिये ॥
मेरा यह उपदेस हिये में धारियो ।
गुरु चरणन मनराखि सेवातन गारियो ॥
जो गुरु झिरकै लाख तौ मुख नहिं मोड़ियो ।
गुरुसों नेह लगाय सबन सों तोड़ियो ॥
जो शिष सांचा होय तो आपा दीजियो ।
चरणदास की सीख समझकर लीजियो ॥
मोको श्रीशुकदेव यही समझाइया ।
वेद पुराणन माहिं जुयोहीं गाइया ॥
दो० गुरु अस्तुति कहकहिसकै, चरणदास कहाबुद्धि ।
भक्तों की अब कहत हों, जो वै देवैं शुद्धि ॥
भक्तनकी अस्तुति किये, तन मन हियो सिराय ।
कलिका मैल रहै नहीं, बुधि उज्ज्वल ह्वैजाय ॥
साधों की सेवा करो, चरणदास चित् लाय ।
जनम मरण बंधन कटैं, जगतब्याधि छुटिजाय ॥
१ दुःख ॥
१७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
'जो भक्तों की सेवा करै । यमके कंधे नाहीं परै ॥
जिन साधौं का दरशन देखा । ताका यमसों रहा न लेखा ॥
जो भक्तनको शीश नवावै । तन छूटै जब दुख नहिं पावै ॥
जो कोइ साध संगमें रलै । जठर¹ अग्नि में नाहीं जलै ॥
जो साधौंकी अस्तुति भाखै । पाव भक्ति प्रेमरस चाखै ॥
जो भक्तों सो प्रीति लगावै । 'वह हरिको निश्चय अपनावै ॥
जो भक्तों की वाणी गावै । समझै अर्थ परमपद पावै ॥
साधुसंगतबिन गति नहिं होनी । क्या तपसी अरु क्या भया मौनी ॥
चरणदास भक्तोंकी शरना । हाईं जीवन हाईं मरना ॥
दो० भक्तिवान निर्मल दशा, संतोषी निर्वास ।
मनराखै नवधा बिषे, और न दूजी आस ॥
दयावान दाता गुण पूरे । पैज धारणा बचनों शूरै ॥
मुक्त कामना फल नहिं चाहैं । रिद्धि सिद्ध अरु त्यागै लाहैं ॥
हानि लाभ जिनके नहिं टोंटा । वैरी मित्र खरा नहिं खोंटा ॥
मान अपमान कछू नहिं तिनके । दुख सुख एक बराबर जिनके ॥
शुभअरु अशुभ कछू नहिं जानैं । राव रंक को ना पहिंचानैं ॥
कंचन कांच बराबर देखै । जग ब्योहार कछू नहिं लेखै ॥
हार जीत नहिं वाद विवादा । सदा पवित्र संमझ अगाधा² ॥
हर्ष शोक जिनके नहिं कबहीं । लख चौरासी प्यारे सबहीं ॥
हिंसा³ अकस भाव नहिं दूजा । सब जीवनकी राखै पूजा ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । ऐसे लक्षण साधु कहावै ॥
दो० भक्तों की पदवी बड़ी, इन्द्रहुसे अधिकाय ।
तीन लोकके सुख तजे, लीन्हें 'हरि अपनाय ॥ :
अंनन्यभक्त⁴ निहकाम जो, करै सोइ चरणदास ।
१ गर्भ २ जिसकी थाह न मिलै ३ वैरभाव ४ जो दूसरेका भक्त न हो ॥
- भक्तिपदार्थवर्णन । १७१
चार मुक्ति१ वैकुण्ठ लौ, सबसे रहै निरास ॥
प्रभु अपने मुख से कहो, साधू मेरी देह ।
उनके चरणन की मुझे, प्यारी लागै खेह ॥
आठ सिद्धि वै लें नहीं, कनक कामिनी नाहिं ।
मेरे सँग लागे रहें, कभी न छोड़ै बाहिं ॥
सब तजि कर मौं को भजै, मोहीं सेती प्रीति ।
मैं भी उनके कर बिक्यो, यही जु मेरी रीति ॥
साधु हमारी आतमा, सबसे प्यारे मोहि ।
नारद निश्चय कीजिये, सांच कहत हौं तोहि ॥
जिनके कारण मैं रचौं, अद्भुत यह संसार ।
उन्हीं की इच्छा धरूं, हर युग में अवतार ॥
प्रेमी को ऋनियां रहौं, यही हमारो २सूल ।
चारि मुक्ति दई ब्याज में, दे न सकौं अब मूल ॥
सर्वस दीन्हों भक्त को, देख हमारो नेह ।
निर्गुण सों सगुण भयो, धरी पशूकी देह ॥
मेरे जन मोमें रहें, मैं भक्तन के माहिं ।
मेरे अरु मेरे सन्तके, कछु भी अन्तर नाहिं ॥
साध सोवै तहाँ सोयरहुं, भोजन सँगही जेवँ ।
जो वह गावै प्रेम सों, मैंहूँ ताली देवँ ॥
मम भक्ता जित जित फिरें, गवनैं लागाजावँ ।
जहां तहां रक्षा करौं, भक्तवछल मेरो नावँ ॥
भक्त हमारो पग धरै, जहां धरूं मैं हाथ ।
लारे लागोही फिरौं, कबहुँ न छोड़ साथ ॥
मोको वश कियो जो चहै, भक्तन की करि सेव ।
१ सारूप्य, सालोक्य, सामीप्य, सायुज्य २ ऋण ॥
३७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
उनमें है कर मैं मिलौं, करौं बहुतही हेव¹ ॥
पृथ्वी पावन होत है, सबही तीरथ आदि ।
चरणदास हरि यों कहैं, चरण धरैं जब साध ॥
जिनकी महिमा प्रभुकहैं, अपने मुख सों भाखि ।
तितकी कौन बराबरी, वेद भरत हैं साखि² ॥
जिनकी आशा करत हैं, स्वर्ग माहिं सब देव ।
कबहुँ दरशन पाय हैं, चरण कमल की सेव ॥
अपने अपने लोक में, सभी करें उत्साह ।
साधूकाया छोड़ करि, गगन करै किस राह ॥
धनि नगरी धनि देशहै, धनि पुर पट्टन³ गाँव ।
जहाँ साधूजन उपजियो, ताके बलि बलि जावँ ॥
भगत जुझावैं जगत में, परमारथ के हेत ।
आप तरैं तारैं परा, मंडैं भजन के खेत ॥
भवसागरसों तारि करि, लै जावैं बहु जीव ।
साधू केवट⁴ राम के, पार मिलावैं पीव ॥
काम क्रोध मोह लोभहनि, गर्भ तजै जो साध ।
राम नाम हिरदै धरै, रोम रोम औराध ॥
साधू महिमा को कहै, शोभा अधिक अपार ।
रसना⁵ दोय हजार सों, शेषहु जावैं हार ॥
अनन्य भक्ति करि प्रेमसों, जीति लिये गोविन्द ।
चरणदास हो वश किये, पूरण परमानन्द ॥
तप के बरष हजारहू, संतसंगत घड़ि एकं ।
तौभी सरिवर ना करै, शुकदेव कियां विवेक ॥
सतसंगति महिमा बड़भाई । स्मृति वेदपुराणन गाई ।
१ स्नेह २ गवाही ३ शहर ४ नाव खेनेवाला मल्लाह ५ जीभ ॥
भक्तिपदार्थवर्णन - १७३
मुनि वशिष्ठ कहो यही भेवा । साधु संग को तरसै देवा ॥
साधु संगको नारद जानै । सो वह पिछलो जन्म पिछानै ॥
देखी संगति की अधिकाई । बालमीकि अरु शबरी गाई ॥
अजामील सतसंगति परिया । अनगिनपाप कियेसब जरिया ॥
सतसंगति बहु पतित¹ उधारे । अधम सरीखे मुक्ति पधारे ॥
जात जुलाहा अरु रैदासा² । संगति साधु हुआ परकासा ॥
साधों की संगति मुकताई । चरणदास शुकदेव बताई ॥
दो० जब जब दरशन राम दें, तब मांगौं सतसंग ।
चाहौं पदवी भक्तकी, चढ़ै सुनवधा रंग ॥
कूवा सदना सैना नाई । बहुतक नीच भये ऊँचयाई ॥
जैसे ठौर ठौर को पानी । सुरसरि मिलि भयो गंगारानी ॥
तैसे काठ लोह को तारै । ऐसे संगति मिलि भया पारै ॥
जैसे पारस लोहा लागा । सो वह कंचन भया सुभागा ॥
देवल तीरथ बहु मग धावै । साधुसंग बिन गति नहिं पावै ॥
ढाकापात³ पान के साथा । संगति मिलि गयो भूपनहाथा ॥
त्यों गोविन्दसँग गईकुबरी । सूवा के सँग गणिका उबरी ॥
हरि भगतन में दीजै बासा । जन्म जन्म मांगै चरणदासा ॥
दो० ऊंची पदवी साधुकी, महिमा कही न जाय ।
सुरनर मुनि जग भूपही, देखत रहे लजाय ॥
रागसारंग ॥
करौ नर हरिभक्तन को संग ।
दुख बिसरै सुख होय घनेही तन मन पलटै अंग ॥
ह्वै निष्काम मिलौ संतन सों नाम पदारथ मंग ।
जिहिपाये सब पातक नाशौं उपजै ज्ञान तरंग ॥
१ नीच २ चमार ३ टेसू ॥
१७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो वै दया कर तेरे पर प्रेम पिलावैं भंग ।
जाके अमल दरश है हरिको नैनन आवै रंग ॥
उनके चरण शरणहीं लागो सेवा करो उमंग ।
चरणदासतिनकेपगपरसन आश करत है गंग ॥
दो० बिनहोनी हरि करिसकैं, होनी देहिं मिटाय ।
चरणदास करु भक्तिही, आपा देहु उठाय ॥
हरि चितवै सो सांची बाता । औरन सों नहिं टूटै पाता ॥
जो कछु चाहा सो उन करई । अब चाहै सोभी सब सरई ॥
अग्नि माहिं तृण घास बचावै । घटमें सगरो सिंधु समावै ॥
पावक राखै पानी माहीं । जल राखै जहँ धरती नाहीं ॥
गिरिवर सागर माहिं तरावै । चाहै हलका काठ डुबावै ॥
सुई के नाके हस्ती काढै । मूल¹ पात बिन लकड़ी बाढ़ै ॥
नरकी छाती दूध निकासै । उपजावै वह खेत अकासै ॥
चाहै गूंगे वेद पढ़ावै । अँधरे आंखें खोलि दिखावै ॥
सब लायक सामर्थ गुसाईं । चरणदास शुकदेव बताई ॥
दो० प्रभु चाहै सोई करै, ताकूं टोकै कौन ।
देखि देखि अचरजरहा, चरणदास गहि मौन ॥
महल पवनपर रचै मुरारी । अग्निके माहिं करै फुलवारी ॥
चाहै बिन बादल बरसावै । बिन सूरज दिनकरि दिखलावै ॥
खाली भरै भरे निघटावै । जो चाहै सोई प्रगटावै ॥
पाथर पानी करै बहावै । छिनमें सगरो सिंधु सुखावै ॥
चाहै जलका थल करिदारै । राईकूं परबत करै भारै ॥
रंकन कूं करै छत्तर धारी । चाहै भूपन देह उजारी ॥
जो चाहै सो आपहि करै । औरनके शिर झूठे धरै ॥
१ जड़ २ दरिद्री ॥
· भक्तिपदार्थवर्णन । १७५
चरणदास शुकदेव जनावै। सांचे गुणावाद जो गावै॥
दो० यह अस्तुति करतार की, जिन रचिया संसार।
अद्भुत कौतुक१ करि रह्यो, लीला अगम अपार ॥
उपजावै पालै विनशावै। अनगिन चन्द सूर दरशावै॥
कोटिक अंड पलकमें करै। जब चाहै जब कुछना रहै॥
जब फैले तब रूप अनेका। जब समिटै जब एकहि एका॥
बटक बीज का खेल निहारा। एक बीजका सकल पसारा॥
तामें बीज अनंतहि देखा। गिनूं कहांलों रहा न लेखा॥
ऐसे हरि आपा विस्तारा। कहत सुनत देखतहूँ हारा॥
अपरमपार पार नहिं पाऊं। अस्तुति करता मैं सकुचाऊं॥
समझिसमझि मनमें रहिजाऊं। चरणदास हो शीश नवाऊं॥
दो० लीला सिन्धु अगाधगति, मोपै कही न जाय।
चरणदास यों कहत है, सोचत गयो हिराय ॥
कोटिक ब्रह्मा अस्तुति करहीं। वेद कहत प्रभु परे परेहीं॥
कोटिक शम्भू करें समाधा। जानि परै नहिं रूप अगाधा ॥
कोटिक नारद से यश गावैं। गुण अगाध२ कछु अंत न पावैं ॥
कोटिक ध्यानी ध्यान लगावैं। हरिके सो कछु रूप न पावैं ॥
ज्ञानी कोटिक कथैं वह ज्ञाना। समझ थकी उनहूं नहिंजाना ॥
कोटिक शारद करें बिचारा। बुद्धि थकी जब कहा अपारा ॥
सुरनरमुनिवा भेद न लहिया। शोचिशोचिबकिबकिथकिरहिया॥
निरगुण सरगुण कहा न जावै। चरणदास शुकदेव सुनावै॥
दो० चरणदास वा रूप की, पटतर३ दई न जाहि।
राम सरीखे राम हैं, और बतावों काहि॥
वाकी अस्तुति कहा बखानूं। जैसा वह जैसा नहिं जानूं॥
१ तमाशा २ जिसका थाह न हो ३ बराबरी ॥
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१७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बुधि विचार करिहारा ज्ञाना । अनभै थकी नाहिं पहिंचाना ॥
आदि न अंत मध्य नहिं जाका । दहिना वावां पीठ न आगा ॥
हरा पीत श्वेत नहिं काला । नारी पुरुष न बूढ़ा बाला ॥
रूप न रंग मिहीं नहिं मोटा । नया पुराना बड़ा न छोटा ॥
नाम रूप किरियासूं न्यारा । नहिं हलका नहिं कहिये भारा ॥
वानी चार परै निरवाना । काहूविधि वह जाय न जाना ॥
पुहुप गंध नादनतैं झीना । गुरु शुकदेव सुनाय जु दीना ॥
दो० कौन लखै को कहि सकै, अचरज अलख अभेव ।
ज्ञान ध्यान पहुँचै नहीं, निर्विकार निर्लेव ॥
सुनत अचम्भा मोकूं आया । जाके बचनरूप नहिं काया १ ॥
निराकार २ नहिं ना आकारा । नहिं अडोल नहिं डोलनहारा ॥
पांचतत्त्व तिरगुण ते आगे । अद्भुत अचरज ध्यान न लागे ॥
नहिं परगट नहिं गूपन ठाऊं । समझसकौंनहिंथकिथकिजाऊं ॥
जैसो आगे मैं कहि आयो । फिर समझौ वैसो नहिं पायो ॥
जो कुछ कहिया नाहीं नाहीं । सो सब देखा वाके माहीं ॥
सकल सर्वदा हां पहिचानी । चरणदास शुकदेव बखानी ॥
दो० वामें गुण अनगिनत हैं, अपरमपार अगाध ।
देखौ परगटही भये, रूप नाम अरु नाद ॥
वृक्ष बीज का नाम बताऊं । भिन्न भिन्न परगट दिखलाऊं ॥
जो कोइ निराबीज कूं बूझै । ताकूं वह निरगुणही सूझै ॥
जब समझै तब सब गुणमाहीं । तामें डाल मूल ३ फल छाहीं ॥
ऐसे पूरणब्रह्म पिछानौ । निराकार निरगुण मत जानौ ॥
वै निरगुण सरगुण ते न्यारे । निरगुण सरगुण नाम विचारै ॥
अकथ कथा कछु कथिय न जाई । जो भाषूं सोई . . मुरखाई ॥
१ शरीर २ जिसका आकार नहीं ३ जड़ ४ जो कहने लायक न हो ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १७७
कोई कहौ सुनौ मन आनौ । वैसा नहिं निश्चय करि जानौ ॥
बड़बड़ ऋषि मुनि पण्डित भारे । चरणदास सब खोजत हारे ॥
दो० वहि निरगुंण सरगुंण वही, वहि दोनों से न्यार ।
जो था सो जाना नहीं, शोचा वारंवार ॥
अनंत¹ शक्ति लीला अनंत, गुण अनंत बहुभाव ।
कौतुक रूप अनंत हैं, चरणदास बलिजाव ॥
नाम भेद किरिया अनंत, अनंत धरे अवतार ।
बीस चार तिनमें अधिक, कहै शुकदेव विचार ॥
राम कृष्ण पूरण कला, चौबीसौ में दोय ।
निरगुण से सरगुण वही, भक्तों कारण होय ॥
रागबिलावल ॥
अलख² निरंजन अगम अपार ।
एक अनेक भेष बहु कीन्हे सुन्दर रचना रची सँवार ॥
निरगुण हरि सरगुण हो खेलौ अचरज लीला करि विस्तार
अपनो चरित आपही देखै ऐसो अद्भुत कौतुकधार ॥
रूप बराह पकरि हिरण्याक्षहि धरती लाये ताहि संहार ।
यज्ञपुरुष अरु दत्तात्रेयी अरु श्रीबद्रीपति हि विचार ॥
सनत्कुमार ऋषभदेव ध्रुव बर पृथू मच्छ कूर्म उदार ।
हयग्रीवा अरु हंसरूप ही महाबली नरसिंह बलधार ॥
हरि परगट ह्वै गजै छुटायौ बामन कपिल सरस गुणसार ।
मन्वन्तर धन्वतर प्रगटे परशुराम रामचन्द्र मुरार ॥
पूरण कला ईश तिहुंपुर को कृष्ण प्रगट हो कंस पछार ।
वेदव्यास अरु बोध कलंकी ये भये सब चौबीस अवतार ॥
युग युग माहिं आप परगट ह्वै दुष्ट दलन सन्तन रखवार ।
१ जिसका अन्त नहीं २ जो देखि न परै ॥
१७८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चरणदास शुकदेव श्यामकी बाँकी गतिको वार न पार ॥
दो० एक एकसों आगरो, महिमा कही न जाय ।
अनंत रँगीले महल में, आपहि बैठे आय ॥
अनन्त रँगीले महल बनाये । तामें आप रामहीं आये ॥
नांव रूप गुण न्यारे न्यारे । गिनत शारदा गणपति हारे ॥
मन्दिर रूप बहुत छवि सोहै । जहां तहां मेरो मन मोहै ॥
हरे श्वेत पीत अरु लाले । पिसताकी ऊदे अरु काले ॥
बेलदार लहरा छवि बूटे । चीतमताले और तिखूटे ॥
बूंद बूंद अरु गंडे दारे । जानौ चित्तर हाथ सँवारे ॥
रँगा रंग बहु चित्तरकारी । कहूं कहाँलों मों बुधिहारी ॥
दो पाये अरु पुनि चौपाये । बहु पाये कछु कहे न जाये ॥
वृक्षरूप अरु पक्षीनाना । कीट१ पतंगा२ थिर३ चर४ जाना ॥
जलमें मीन५ बहुत परकारे । चरणदास शुकदेव विचारे ॥
दो० थावर जंगम चर अचर, बहुत छबीली भांति ॥
राजस तामससात्विकी, बहु अर्धान वहु क्रांति ॥
बानर नर असुरा सुरा, यक्षगण गन्ध्रब प्रेत ।
सबही महल बराबरी, सबही सेती हेत ॥
खिरकी नैन चावसों खोलै । मुख द्वारे नाना विधि बोलै ॥
बहुत भांति की नाना बानो । चतुर कूड भोली अरु यानी६ ॥
कहिं अबोल नहिं बोलन आवै । पै सब महलन वह दरशाव ॥
साक्षात हरिही कूं जानौ । भवन् भवनमें ताहि पिछानौ ॥
काया क्षेत्र ज्ञानी जानै । क्षेत्रग आतमरूप बखानै ॥
देही क्षर गीता में गायो । अक्षर जीव खोल दिखलायो ॥
१ किरवा २ पाखी ३ न चलनेवाले ४ चलनेवाले ५ मछली ६ न
जाननेवाली ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १७६
काया मन्दिर आप रमायो । ताते राम नाम धरवायो ॥
देह सँयोग राम कहलायो । चरणदास शुकदेव बतायो ॥
दो० सूरज चींटी आदि दै, लघु दीरघ के माहिं ।
सब में पोइ आतमा, बाहर कोई नाहिं ॥
छोटे भांडे१ में करै, छोटाही परकाश ।
बड़े जु भाँड़े में करै, जेता होय उकाश ॥
ज्ञानवन्त कूं मैं दियो, दीपक को दृष्टान्त ।
जो वह समझ चावसूँ, मिटै तिमिर२ अरु भ्रान्त ॥
जैसेही है पिण्ड में, जैसे ही ब्रह्मण्ड ।
भीतर बाहर रमिरह्यो, सात द्वीप नव खण्ड ॥
आप लखेते वाकूं पावै । जो पै सतगुरु भेद बतावै ॥
ज्ञान दृष्टि सेती दरशावै । आपा मिटै ब्रह्म ठहरावै ॥
ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय जहँ नाहीं । ध्याता ध्यान ध्येय मिटि जाहीं ॥
जबहो एक दूसरा नासे । बन्ध मुकत के रहैं न सांसे ॥
मृतक अवस्था जीवत आवै । करम रहित अस्थिर गति पावै ॥
तब कोइ मिन्तर वैरी नाहीं । पाप पुण्यकी परै न छाहीं ॥
हरष शोक सम होजा दोऊ । रक्षाकरो कि मारो कोऊ ॥
कोऊ हाथ में भोजन देजा । कोउ छीनकर योंहीं लेजा ॥
दोनों एक बराबर वाके । जगव्योहार कछू नहिं जाके ॥
हरि बिन और पिछान न कोई । तिनके इच्छा रही न दोई ॥
ज्ञान दशा ऐसे करि गाई । चरणदास शुकदेव बताई ॥
दो० ज्ञानदशा आवन कठिन, बिरला जानै कोय ।
ज्ञान दशा जब जानिये, जीवत मृतक होय ॥
वाचक३ ज्ञानी बहुतक देखे । लक्ष४ ज्ञानी कोइ लेखे लेखे ॥
१ बर्त्तनरूपी शरीर २ अँधेरा ३ कहनेवाले ४ हृदयान्तर से देखनेवाले ॥