भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
अष्टपदी ॥
गुरु बिन और न जान मान मेरो कहो ।
चरणदास उपदेश बिचारतही रहो ॥
वेदरूप गुरु होय कि कथा सुनावई ।
पण्डित को धरिरूप कि अरथ बतावई ॥
गुरु हो शेष महेश तोहिं चेतन करै ।
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु होय खाली भरै ॥
कल्पवृक्ष गुरु देव मनोरथ सब सरै ।
कामधेनु गुरुहोय क्षुधा तृष्णा हरै ॥
गंगासम गुरु होय पाप सब धोवई ।
शशियर सम गुरू होय तपन सब खोवई ॥
सूरजसम गुरु होय तिमिर सब लेवई ।
पारब्रह्म गुरु होय मुक्ति पद देवई ॥
गुरुही को करि ध्यान नाम गुरु को जपौ ।
आपा दीजै भेंट पूजन गुरुही थपौ ॥
समरथ श्रीशुकदेव कहा महिमा करौं ।
अस्तुति कही न जाय शीश चरणन धरौं ॥
दो० हरि रूठै कुछ डर नहीं, तूभी दे छुटकाय ।
गुरु को राखौ शीशपर, सबविधि करें सहाय ॥
अष्टपदी ॥
गुरुकोतजि हरि सेव कभी नहिं कीजिये ।
वे मुख को नहिं ठौर नरक में दीजिये ॥
गुरुनिंदक नहिं मुक्त गर्भ फिरि आवई ।
चौरासी लख भुक्ति महा दुख पावई ॥
१ सिखावना २ भूख ३ अंधकार ॥