भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
जो वै दया कर तेरे पर प्रेम पिलावैं भंग ।
जाके अमल दरश है हरिको नैनन आवै रंग ॥
उनके चरण शरणहीं लागो सेवा करो उमंग ।
चरणदासतिनकेपगपरसन आश करत है गंग ॥
दो० बिनहोनी हरि करिसकैं, होनी देहिं मिटाय ।
चरणदास करु भक्तिही, आपा देहु उठाय ॥
हरि चितवै सो सांची बाता । औरन सों नहिं टूटै पाता ॥
जो कछु चाहा सो उन करई । अब चाहै सोभी सब सरई ॥
अग्नि माहिं तृण घास बचावै । घटमें सगरो सिंधु समावै ॥
पावक राखै पानी माहीं । जल राखै जहँ धरती नाहीं ॥
गिरिवर सागर माहिं तरावै । चाहै हलका काठ डुबावै ॥
सुई के नाके हस्ती काढै । मूल¹ पात बिन लकड़ी बाढ़ै ॥
नरकी छाती दूध निकासै । उपजावै वह खेत अकासै ॥
चाहै गूंगे वेद पढ़ावै । अँधरे आंखें खोलि दिखावै ॥
सब लायक सामर्थ गुसाईं । चरणदास शुकदेव बताई ॥
दो० प्रभु चाहै सोई करै, ताकूं टोकै कौन ।
देखि देखि अचरजरहा, चरणदास गहि मौन ॥
महल पवनपर रचै मुरारी । अग्निके माहिं करै फुलवारी ॥
चाहै बिन बादल बरसावै । बिन सूरज दिनकरि दिखलावै ॥
खाली भरै भरे निघटावै । जो चाहै सोई प्रगटावै ॥
पाथर पानी करै बहावै । छिनमें सगरो सिंधु सुखावै ॥
चाहै जलका थल करिदारै । राईकूं परबत करै भारै ॥
रंकन कूं करै छत्तर धारी । चाहै भूपन देह उजारी ॥
जो चाहै सो आपहि करै । औरनके शिर झूठे धरै ॥
१ जड़ २ दरिद्री ॥