सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 200

भक्तिपदार्थवर्णन । १६५
मैं मिरगा गुरुपारधी,- शब्दलगायो बाण ।
चरणदास घायल गिरे, तन मन बींधे प्राण ॥
शब्दबाण मोहिं मारियो, लगी कलेजे माहिं ।
मार हंसे शुकदेवजी, बाकी छोड़ी नाहिं ॥
सतगुरु शब्दी तेग है, लागत दो करदेहि ।
पीठि फेरि कायर भजै, शूरा सन्मुख लेहि ॥
सतगुरु शब्दी सेल¹ { धर्मी का साध ।
कायर ऊपर जो चलै, तौ जावै बरबाद ॥
सतगुरु शब्दी तीर है, तन मन कीयो छेद ।
बेदरदी समझै नहीं, विरही पावै · भेद ॥
सतगुरु शब्दी लागिया, नावक का सा तीर ।
कसकत है निकसत नहीं, होत प्रेमकी पीर ॥
संतगुरु शब्दी बांण है, अंगअंग डालातोड़ ।
प्रेम खेत घायल गिरे, टांका लगै न जोड़ ॥
सतगुरु शब्दी मारिया, पूरा आया वार ।
प्रेमी जूझे खेत में, लगा न राखा तार ॥
ऐसी मारी खैंचकर, लगी वार गइ पार ।
जिनका आपा ना रहा, भयेरूप तत्सार ॥
सतगुरु कै मारे मुये, बहुरि न उपजै आय ।
चौरासी बन्धन छुटै, हरिपद पहुँचे जाय ॥
सतगुरु के वचनों मुये, धन्यजिन्हों के भाग ।
त्रैगुणते ऊपर गये, जहाँ दोष नहिं राग² ॥
वचन लगा गुरुदेवका, छुटे राजके साज ।
हीरा मोती नारि सुत, गज घोड़ाअरु बाज ॥


१ हथियार का नाम है २ प्रेम ॥