भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन । १६५
मैं मिरगा गुरुपारधी,- शब्दलगायो बाण ।
चरणदास घायल गिरे, तन मन बींधे प्राण ॥
शब्दबाण मोहिं मारियो, लगी कलेजे माहिं ।
मार हंसे शुकदेवजी, बाकी छोड़ी नाहिं ॥
सतगुरु शब्दी तेग है, लागत दो करदेहि ।
पीठि फेरि कायर भजै, शूरा सन्मुख लेहि ॥
सतगुरु शब्दी सेल¹ { धर्मी का साध ।
कायर ऊपर जो चलै, तौ जावै बरबाद ॥
सतगुरु शब्दी तीर है, तन मन कीयो छेद ।
बेदरदी समझै नहीं, विरही पावै · भेद ॥
सतगुरु शब्दी लागिया, नावक का सा तीर ।
कसकत है निकसत नहीं, होत प्रेमकी पीर ॥
संतगुरु शब्दी बांण है, अंगअंग डालातोड़ ।
प्रेम खेत घायल गिरे, टांका लगै न जोड़ ॥
सतगुरु शब्दी मारिया, पूरा आया वार ।
प्रेमी जूझे खेत में, लगा न राखा तार ॥
ऐसी मारी खैंचकर, लगी वार गइ पार ।
जिनका आपा ना रहा, भयेरूप तत्सार ॥
सतगुरु कै मारे मुये, बहुरि न उपजै आय ।
चौरासी बन्धन छुटै, हरिपद पहुँचे जाय ॥
सतगुरु के वचनों मुये, धन्यजिन्हों के भाग ।
त्रैगुणते ऊपर गये, जहाँ दोष नहिं राग² ॥
वचन लगा गुरुदेवका, छुटे राजके साज ।
हीरा मोती नारि सुत, गज घोड़ाअरु बाज ॥
१ हथियार का नाम है २ प्रेम ॥