भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
'जो भक्तों की सेवा करै । यमके कंधे नाहीं परै ॥
जिन साधौं का दरशन देखा । ताका यमसों रहा न लेखा ॥
जो भक्तनको शीश नवावै । तन छूटै जब दुख नहिं पावै ॥
जो कोइ साध संगमें रलै । जठर¹ अग्नि में नाहीं जलै ॥
जो साधौंकी अस्तुति भाखै । पाव भक्ति प्रेमरस चाखै ॥
जो भक्तों सो प्रीति लगावै । 'वह हरिको निश्चय अपनावै ॥
जो भक्तों की वाणी गावै । समझै अर्थ परमपद पावै ॥
साधुसंगतबिन गति नहिं होनी । क्या तपसी अरु क्या भया मौनी ॥
चरणदास भक्तोंकी शरना । हाईं जीवन हाईं मरना ॥
दो० भक्तिवान निर्मल दशा, संतोषी निर्वास ।
मनराखै नवधा बिषे, और न दूजी आस ॥
दयावान दाता गुण पूरे । पैज धारणा बचनों शूरै ॥
मुक्त कामना फल नहिं चाहैं । रिद्धि सिद्ध अरु त्यागै लाहैं ॥
हानि लाभ जिनके नहिं टोंटा । वैरी मित्र खरा नहिं खोंटा ॥
मान अपमान कछू नहिं तिनके । दुख सुख एक बराबर जिनके ॥
शुभअरु अशुभ कछू नहिं जानैं । राव रंक को ना पहिंचानैं ॥
कंचन कांच बराबर देखै । जग ब्योहार कछू नहिं लेखै ॥
हार जीत नहिं वाद विवादा । सदा पवित्र संमझ अगाधा² ॥
हर्ष शोक जिनके नहिं कबहीं । लख चौरासी प्यारे सबहीं ॥
हिंसा³ अकस भाव नहिं दूजा । सब जीवनकी राखै पूजा ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । ऐसे लक्षण साधु कहावै ॥
दो० भक्तों की पदवी बड़ी, इन्द्रहुसे अधिकाय ।
तीन लोकके सुख तजे, लीन्हें 'हरि अपनाय ॥ :
अंनन्यभक्त⁴ निहकाम जो, करै सोइ चरणदास ।
१ गर्भ २ जिसकी थाह न मिलै ३ वैरभाव ४ जो दूसरेका भक्त न हो ॥