भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें• भक्तिपदार्थवर्णन । १६३
गुरु शुकदेव दयाकरी, हरिधन किये निहाल ॥
जा धन कूं ठग ना लगे, धारी सकै न लूट ।
चोर चुरायसकै नहीं, गाँठ गिरै नहिं खूट ॥
बलिहारी गुरु आपने, तन मन सदकै जावँ ।
जीव ब्रह्म क्षणमें कियो, पाई भूली ठाँवँ ॥
हरिसेवा सोलह बरस, गुरुसेवा पल चार ।
तौभी नहीं बराबरी, वेदन कियो विचार ॥
गुरुकी सेवा साधू जानै । गुरु सेवा कहा मूढ़ पिछानै ॥
गुरु सेवा सबहुन पर भारी । समझ करो सोई नर नारी ॥
गुरु सेवा सों विघ्न विनाशै । दुरमति भाजै पातक नाशौ ॥
गुरु सेवा चौरासी छूटै । आवागमन का डोरा टूटै ॥
गुरु सेवा यमदण्ड न लागै । ममता मरे भक्ति में जागै ॥
गुरु सेवासूं प्रेम प्रकाशै । उनमत होय मिटै जग आशै ॥
गुरु सेवा परमातम दरशै । त्रैगुण तजि चौथापद परशै ॥
श्रीशुकदेव बतायो भेवा । चरणदास कर गुरुकी सेवा ॥
दो० गुरु सेवा जानैं नहीं, पाँय न पूजै धाय ।
योगदान जप तप कियो, सभी अफल हो जाय ॥
योगदान जप तारथ न्हाना । गुरु सेवा बिन निरफल जाना ॥
गुरु सेवा बिन बहु पछितैहौ । फिर फिर यम के द्वारे जैहौ ॥
गुरु सेवा बिन अतिदुख पैहौ । जग में पशु दारिद्री हैहौ ॥
गुरु सेवा बिन कौन उतारे । भवसागर सूं बाहर डारै ॥
गुरु सेवा बिन जड़ कहा करिहो । काकी नाव बैठि करि तरिहो ॥
गुरु सेवा बिन कहुनहिं सरि है । महाअंध कूप में परि है ॥
गुरु सेवा बिन घट अँधियारा । कैसे प्रकटै ज्ञान उजियारा ॥
नरक निवारण गुरु शुकदेवा । चरणदास करि तिनकी सेवा ॥