भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिपदार्थवर्णन - १७३
मुनि वशिष्ठ कहो यही भेवा । साधु संग को तरसै देवा ॥
साधु संगको नारद जानै । सो वह पिछलो जन्म पिछानै ॥
देखी संगति की अधिकाई । बालमीकि अरु शबरी गाई ॥
अजामील सतसंगति परिया । अनगिनपाप कियेसब जरिया ॥
सतसंगति बहु पतित¹ उधारे । अधम सरीखे मुक्ति पधारे ॥
जात जुलाहा अरु रैदासा² । संगति साधु हुआ परकासा ॥
साधों की संगति मुकताई । चरणदास शुकदेव बताई ॥
दो० जब जब दरशन राम दें, तब मांगौं सतसंग ।
चाहौं पदवी भक्तकी, चढ़ै सुनवधा रंग ॥
कूवा सदना सैना नाई । बहुतक नीच भये ऊँचयाई ॥
जैसे ठौर ठौर को पानी । सुरसरि मिलि भयो गंगारानी ॥
तैसे काठ लोह को तारै । ऐसे संगति मिलि भया पारै ॥
जैसे पारस लोहा लागा । सो वह कंचन भया सुभागा ॥
देवल तीरथ बहु मग धावै । साधुसंग बिन गति नहिं पावै ॥
ढाकापात³ पान के साथा । संगति मिलि गयो भूपनहाथा ॥
त्यों गोविन्दसँग गईकुबरी । सूवा के सँग गणिका उबरी ॥
हरि भगतन में दीजै बासा । जन्म जन्म मांगै चरणदासा ॥
दो० ऊंची पदवी साधुकी, महिमा कही न जाय ।
सुरनर मुनि जग भूपही, देखत रहे लजाय ॥
रागसारंग ॥
करौ नर हरिभक्तन को संग ।
दुख बिसरै सुख होय घनेही तन मन पलटै अंग ॥
ह्वै निष्काम मिलौ संतन सों नाम पदारथ मंग ।
जिहिपाये सब पातक नाशौं उपजै ज्ञान तरंग ॥
१ नीच २ चमार ३ टेसू ॥