भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
उनमें है कर मैं मिलौं, करौं बहुतही हेव¹ ॥
पृथ्वी पावन होत है, सबही तीरथ आदि ।
चरणदास हरि यों कहैं, चरण धरैं जब साध ॥
जिनकी महिमा प्रभुकहैं, अपने मुख सों भाखि ।
तितकी कौन बराबरी, वेद भरत हैं साखि² ॥
जिनकी आशा करत हैं, स्वर्ग माहिं सब देव ।
कबहुँ दरशन पाय हैं, चरण कमल की सेव ॥
अपने अपने लोक में, सभी करें उत्साह ।
साधूकाया छोड़ करि, गगन करै किस राह ॥
धनि नगरी धनि देशहै, धनि पुर पट्टन³ गाँव ।
जहाँ साधूजन उपजियो, ताके बलि बलि जावँ ॥
भगत जुझावैं जगत में, परमारथ के हेत ।
आप तरैं तारैं परा, मंडैं भजन के खेत ॥
भवसागरसों तारि करि, लै जावैं बहु जीव ।
साधू केवट⁴ राम के, पार मिलावैं पीव ॥
काम क्रोध मोह लोभहनि, गर्भ तजै जो साध ।
राम नाम हिरदै धरै, रोम रोम औराध ॥
साधू महिमा को कहै, शोभा अधिक अपार ।
रसना⁵ दोय हजार सों, शेषहु जावैं हार ॥
अनन्य भक्ति करि प्रेमसों, जीति लिये गोविन्द ।
चरणदास हो वश किये, पूरण परमानन्द ॥
तप के बरष हजारहू, संतसंगत घड़ि एकं ।
तौभी सरिवर ना करै, शुकदेव कियां विवेक ॥
सतसंगति महिमा बड़भाई । स्मृति वेदपुराणन गाई ।
१ स्नेह २ गवाही ३ शहर ४ नाव खेनेवाला मल्लाह ५ जीभ ॥