सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 207

३७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
उनमें है कर मैं मिलौं, करौं बहुतही हेव¹ ॥
पृथ्वी पावन होत है, सबही तीरथ आदि ।
चरणदास हरि यों कहैं, चरण धरैं जब साध ॥
जिनकी महिमा प्रभुकहैं, अपने मुख सों भाखि ।
तितकी कौन बराबरी, वेद भरत हैं साखि² ॥
जिनकी आशा करत हैं, स्वर्ग माहिं सब देव ।
कबहुँ दरशन पाय हैं, चरण कमल की सेव ॥
अपने अपने लोक में, सभी करें उत्साह ।
साधूकाया छोड़ करि, गगन करै किस राह ॥
धनि नगरी धनि देशहै, धनि पुर पट्टन³ गाँव ।
जहाँ साधूजन उपजियो, ताके बलि बलि जावँ ॥
भगत जुझावैं जगत में, परमारथ के हेत ।
आप तरैं तारैं परा, मंडैं भजन के खेत ॥
भवसागरसों तारि करि, लै जावैं बहु जीव ।
साधू केवट⁴ राम के, पार मिलावैं पीव ॥
काम क्रोध मोह लोभहनि, गर्भ तजै जो साध ।
राम नाम हिरदै धरै, रोम रोम औराध ॥
साधू महिमा को कहै, शोभा अधिक अपार ।
रसना⁵ दोय हजार सों, शेषहु जावैं हार ॥
अनन्य भक्ति करि प्रेमसों, जीति लिये गोविन्द ।
चरणदास हो वश किये, पूरण परमानन्द ॥
तप के बरष हजारहू, संतसंगत घड़ि एकं ।
तौभी सरिवर ना करै, शुकदेव कियां विवेक ॥
सतसंगति महिमा बड़भाई । स्मृति वेदपुराणन गाई ।
१ स्नेह २ गवाही ३ शहर ४ नाव खेनेवाला मल्लाह ५ जीभ ॥