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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 202

भक्तिपदार्थवर्णन । २६७
रामभक्ति की चाह हमारे । याते पकड़े चरण तुम्हारे ॥
प्रेम प्रीति में हिरदा भीजै । यही दान दाता मोहिं दीजै ॥
अपना कीजै गहिये बाहीं । धरिये शिरपर हाथ गुसांई ॥
चरणदास को लेहु उबारे । मैं अंडा तुम सेवनहारे ॥
दो० अंडा ज्यों आगे गिरै, जब गुरु लेव सेइ ।
करै बराबर आपनी, शिष्य को निस्सन्देह ॥
अपना करि सेवन करै, तीनि भांति गुरुदेव ।
पंजा पक्षी कुंजमन, कछुवा दृष्टि जु भेव ॥
जो वै बिसरैं घड़ी भी, तो गंदा होइ जाय ।
चरणदास यों कहत है, गुरु को राखि रिझाय ॥
पितु सोंमाता सौ गुना, सुत को राखै प्यार ।
मनसेती सेवन कर, तन सों डाटरुगार ॥
जो देवैं दुरशीश भी, होहो लगै अशीश ।
सेवन करिसमरथ कियो, उनपर वारौं शीश ॥
माता सों हर सौगुना, जिन से सौ गुरुदेव ।
प्यार करें औगुण हरैं, चरणदास शुकदेव ॥
काचे भांड़े सों रहै, ज्यों कुम्हार को नेह ।
भीतर सों रक्षा करै, बाहर चोटैं देह ॥
दृष्टि पड़ै गुरुदेव की, देखत करैं निहाल ।
औरै गति पलटैं जबै, कागा होत मराल ॥
दया होय गुरुदेव की, भजै मान अरु मैन१ ।
भोगे वासना सब छुटै, पावै अतिही चैन ॥
जबसतगुरु किरपा करें, खोलि दिखावैं नैन ।
जग झूठा दीखन लगै, देंह परे की सैन ॥


१ कामदेव ॥
१३