भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished690 पृष्ठ
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- भक्तिपदार्थवर्णन । १७१
चार मुक्ति१ वैकुण्ठ लौ, सबसे रहै निरास ॥
प्रभु अपने मुख से कहो, साधू मेरी देह ।
उनके चरणन की मुझे, प्यारी लागै खेह ॥
आठ सिद्धि वै लें नहीं, कनक कामिनी नाहिं ।
मेरे सँग लागे रहें, कभी न छोड़ै बाहिं ॥
सब तजि कर मौं को भजै, मोहीं सेती प्रीति ।
मैं भी उनके कर बिक्यो, यही जु मेरी रीति ॥
साधु हमारी आतमा, सबसे प्यारे मोहि ।
नारद निश्चय कीजिये, सांच कहत हौं तोहि ॥
जिनके कारण मैं रचौं, अद्भुत यह संसार ।
उन्हीं की इच्छा धरूं, हर युग में अवतार ॥
प्रेमी को ऋनियां रहौं, यही हमारो २सूल ।
चारि मुक्ति दई ब्याज में, दे न सकौं अब मूल ॥
सर्वस दीन्हों भक्त को, देख हमारो नेह ।
निर्गुण सों सगुण भयो, धरी पशूकी देह ॥
मेरे जन मोमें रहें, मैं भक्तन के माहिं ।
मेरे अरु मेरे सन्तके, कछु भी अन्तर नाहिं ॥
साध सोवै तहाँ सोयरहुं, भोजन सँगही जेवँ ।
जो वह गावै प्रेम सों, मैंहूँ ताली देवँ ॥
मम भक्ता जित जित फिरें, गवनैं लागाजावँ ।
जहां तहां रक्षा करौं, भक्तवछल मेरो नावँ ॥
भक्त हमारो पग धरै, जहां धरूं मैं हाथ ।
लारे लागोही फिरौं, कबहुँ न छोड़ साथ ॥
मोको वश कियो जो चहै, भक्तन की करि सेव ।
१ सारूप्य, सालोक्य, सामीप्य, सायुज्य २ ऋण ॥