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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 690 में से

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पृष्ठ 206
  • भक्तिपदार्थवर्णन । १७१
    चार मुक्ति१ वैकुण्ठ लौ, सबसे रहै निरास ॥
    प्रभु अपने मुख से कहो, साधू मेरी देह ।
    उनके चरणन की मुझे, प्यारी लागै खेह ॥
    आठ सिद्धि वै लें नहीं, कनक कामिनी नाहिं ।
    मेरे सँग लागे रहें, कभी न छोड़ै बाहिं ॥
    सब तजि कर मौं को भजै, मोहीं सेती प्रीति ।
    मैं भी उनके कर बिक्यो, यही जु मेरी रीति ॥
    साधु हमारी आतमा, सबसे प्यारे मोहि ।
    नारद निश्चय कीजिये, सांच कहत हौं तोहि ॥
    जिनके कारण मैं रचौं, अद्भुत यह संसार ।
    उन्हीं की इच्छा धरूं, हर युग में अवतार ॥
    प्रेमी को ऋनियां रहौं, यही हमारो २सूल ।
    चारि मुक्ति दई ब्याज में, दे न सकौं अब मूल ॥
    सर्वस दीन्हों भक्त को, देख हमारो नेह ।
    निर्गुण सों सगुण भयो, धरी पशूकी देह ॥
    मेरे जन मोमें रहें, मैं भक्तन के माहिं ।
    मेरे अरु मेरे सन्तके, कछु भी अन्तर नाहिं ॥
    साध सोवै तहाँ सोयरहुं, भोजन सँगही जेवँ ।
    जो वह गावै प्रेम सों, मैंहूँ ताली देवँ ॥
    मम भक्ता जित जित फिरें, गवनैं लागाजावँ ।
    जहां तहां रक्षा करौं, भक्तवछल मेरो नावँ ॥
    भक्त हमारो पग धरै, जहां धरूं मैं हाथ ।
    लारे लागोही फिरौं, कबहुँ न छोड़ साथ ॥
    मोको वश कियो जो चहै, भक्तन की करि सेव ।
    १ सारूप्य, सालोक्य, सामीप्य, सायुज्य २ ऋण ॥