भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रंथ ।
दो० इन्द्रीजित निरवैरता, निरमोही निरबन्ध ।
ऐसे गुरु की शरणसूं, मिटै सकल दुखद्वन्द ॥
राग द्वेषे दोनों से न्यारे । ऐसे गुरू शिष्य कूं तारे ॥
आशा तृष्णा कुबुधि जलाई । तन मन वचन सबन सुखदाई ॥
निरालम्ब निर्भरम उदासी । निरविकार जानौ निरवासी ॥
निरमोहत निरबन्ध निशंका । सावधान निरवाण अशंका ॥
सारग्रही और सर्वंगी । संतोषी ज्ञानी सतसंगी ॥
अयाचीक जत निर अभिमानी । पक्ष रहत स्थिर शुध बानी ॥
निहतरंग नाहीं परपंचा । निहकरम निरलिप्स जो संचा ॥
शीतल तासु मती शुकदेवा । चरणदास कियो सो गुरुदेवा ॥
दो० सतवादी अरु शीलवत, सुहृदै अरु योगीश ।
निहचल ध्यान समाधि में, सो गुरु विस्वेबीश ॥
भरम निवारण भय हरण, दूरकरन सन्देह ।
गुठिया खोलै ज्ञानकी, सो सतगुरु करलेह ॥
सतगुरु के लक्षण कहे, ताकूं ले पहिंचान ।
निरखपरख करदीजिये, तनमन धन अरु प्रान्॥
ऐसा सतगुरु कीजिये, जीवत डारै मारि ।
जनम जनम की वासना, ताकूं देवै जारि ॥
सतगुरु के ढिग जाइकै, सन्मुख खावै चोट ।
चकमक लग पथरीझरै, सकल जरावै खोट ॥
सतगुरु मेरा शूरमा, करै शब्द की चोट ।
मारै गोला प्रेम का, ढहै भरम का कोट ॥
मुखसेती बोलन थका, सुननें थका जू कान ।
पावनसूं फिरबा थका, सतगुरु मारा बान ॥
१ शत्रुता ॥