भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
तत्त्वयोगउपनिषद्वर्णन । १५३
जो इसकाही ध्यान हृदय किया जापना ।
तौ करै मस्तक माहिं होय पारायना ॥
शीश में जब सिद्ध होय रोकै नौद्वारही ।
निकसन देवै वायु न काहू बारही ॥
दो० दोय पगण्डी बाँधिये, नीचे के दो द्वार ।
दोउ अंगूठे हाथ के, रोको सरवन बार ॥
अष्टपदी ॥
१तर्जनि अंगुली द्वऊ दृगन पर दीजिये ।
मध्यमें से दोउ नाक छेद बँद कीजिये ॥
अनामिका³ दोउ हाथ कि और कनिष्ठिका४ ।
होंठन को बंद करै जु नीके पुष्टका ॥
नासा के दोउ छेद एकही जित भये ।
दोउ भौंहन के बीच चरणदासा कहे ॥
निश्चय ताह बना रस देह कि जानिये ।
वाहीकी तौ ओर दृष्टि को तानिये ॥
महाकुम्भक इहि नाम इसी विधि साधिये ।
ध्यान किये होय मुक्ति यही अवरा५धिये ॥
इन्द्रिनहूँ के मारग को जो बंद करै ।
वायु विना घट६ माहिं यथा दीपक बरै ॥
होय घना परकाश इसी जो देह में ।
इसही ध्यान प्रताप मिलै जा गेहमें ॥
पावै चेतन शुद्धि किये इस योगही ।
१ अंगूठा के पासकी अंगुली की तर्जनी संज्ञा है २ तर्जनी के पासकी
अंगुली की मध्यमा संज्ञा है ३ चौथी अंगुली की अनामिका संज्ञा है ४ छगु-
नियाँको कहते हैं ५ सेइये ६ देह ॥
१५४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
कर्मन को है नाश मिटै मन रोगही ॥
दो० उपनिषदा पूरी भई, नाम योगही तत्त्व ।
अंग अथर्वणवेद की, चरणदास कहि सत्त्व ॥
इति तृतीयतत्त्वयोग उपनिषद् सम्पूर्णम् ॥
अथयोगशिखाउपनिषद् चतुर्थ
प्रारम्भः ॥
दो० योगशिखा चौथी कहूँ, तामें अद्भुत ध्यान ।
परज'पति ऐसे कही, शिष्य सुनो दै कान ॥
अष्टपदी ॥
यामें अद्भुत राह बड़ेही ज्ञानकी ।
कांपन लागै देह कठिन सुनि ध्यानकी ॥
जब आवै मनमाहिं मोह तन ना रहै ।
पांचनहीं की आग नहीं हियमें दहै ॥
वाकी विधि मैं कहूं सभी सुनि लीजिये ।
बैठि एकांतहि ठौर जु आसन कीजिये ॥
आसनपद्म ³ लगाय कि सुख आसन करौ ।
सीधो राखै मेर नैन नासा धरौ ॥
दोउ पावन के साथ जु हाथ मिलाइये ।
सब स्वादन को रोंकि जो मनको लाइये ॥
प्रणवैही का जाप जु मनमें राखिये ।
१ ब्रह्मा २ काम क्रोध लोभ मद मात्सर्य्य ३ पल्थी मारकर बैठना स
को समेट कर उसको पद्मासन कहते हैं ४ ॐकार ।
योगशिखाउपनिषद्वर्णन । १५५
इस बिन और उपाय सबनको नाखिये ॥
जाका है ॐनाम ध्यान ताका करै ।
आठपहर संग्राम बिना खांडे १ लरै ॥
देह यही अस्थूल बड़ा घर जानिये ।
तामें दीरघ थंभ एक पहिचानिये ॥
दो० अरु यामें नौ द्वार हैं, छोट थंभ हैं तीन ।
पांच २ देवता तेहि बिषे, लहैं साध परवीन ॥
यह घर जो मैंने कहा, सोइ पुरुपन की देह ।
कहैं गुरू शुकदेवजी, चरणदास सुनि लेह ॥
अष्टपदी ॥
एक बड़ा जो थंभ मेर ३ ही दंड है ।
सोइ पीठीका हाड़ जासु सब मंड है ॥
अरु वाहीके बीच नाड़ि सुषमन भली ।
सब नाड़िन शिरमौर योगी मानैं रली ॥
नौ द्वारे अब कहूं तिन्हें पहिचानिये ।
दो सरवन दो आंख भली विधि मानिये ॥
नासा छिद्र दोय जु मुखका एक है ।
लिंग गुदा दो जान नवोका लेखहै ॥
तीन जु छोटे थंभ तीन गुणहा कहे ।
सतगुण तमगुण और रजोगुणहीं लहे ॥
पांच देवता कहे सो पांचौ प्रान हैं ।
प्राणापानरु व्यान उदान समानहैं ॥
ऐसे मंदिर माहिं हृदय में छेद है ।
१ तलवार की सदृश्य २ प्राण अपान उदान व्यान समान ३-
कि पैरों से लगाकर पृष्ठभाग से मस्तक तक मिली हुई है ॥
१५६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तामें सूरजमण्डल अचरज भेद है ॥
ताकी बड़ीही ज्योति किरण उजियारि है ।
पूरा योगी होय सो ताहि निहारि है ॥
दो० ज्योतिमयी मंडल लखै, हृदय कमल में होय ।
तामें दीखै और इक, दीवे की सी लोय¹ ॥
अष्टपदी ॥
दीपककीसी ज्योति मानु ऊपर बलै ।
रहै अपनीहीं ठौर भांति ऐसे हिलै ॥
वाही ज्योति को जानै ब्रह्म स्वरूपही ।
यही समझिकै ध्यान करै जु अनूपही ॥
योगी करै जो ध्यान यही हिय माहिंहीं ।
अंतसमय तन छूटि उपर को जाहिंहीं ॥
सूरजहू का मंडल जावै बेधही ।
सुषमन मारग जाय शीश को छेदही ॥
सायुज² मुक्तिको जाय परापत होयही ।
कोटिन माहों लहै जु बिरला कोयही ॥
सत्र ज्योतिन की ज्योति बड़ी जो ज्योतिहै ।
ताको पाये होय एकही गौत है ॥
आलस सों दुर्भाग्य ध्यान करि ना सकै ।
तौ दिनमें तिरकाल पाठ करनेलगै ॥
दो० प्रातकाल अरु मध्य में, संध्याही की बार ।
उपनिषदन तीनोंसमै, पढ़ै विचार विचार ॥
करम कटे यमही डटे, चौरासी हटजाय ।
देही पावै मनुषकी, पूरा गुरु मिलजाय ॥
१ लपक अर्थात् टेमि २ ब्रह्ममें लीन होजाना ॥
योगशिखाउपनिषद्वर्णन । १५७
फिर पावै यह ध्यानही, पीछे कहा जु खोल ।
जावै परमहि धामकूं, छोड़ै सब झकझोल ॥
थोड़ासा यह ध्यानही, मैं समझायों तोहिं ।
परजापति शिष्यसोंकहै, बड़ा जो निश्चय मोहिं ॥
यह पदवी मोकूं मिली, इसी ध्यान परताप ।
जीवन मुक्ताही रहूं, छुटै आप अरु धाप ॥
निश्चल हो या ध्यानकूं, करै जो कोई और ।
जगत छुटै आपामिटै, पावै निरभय ठौर ॥
आनन्दहि आनन्द जहाँ, अवधिन काल कलेश ।
चरणदास या ध्यानसों, पावै ऐसा देश ॥
बहुलोकन में जन्मधरि, पाप मिटा नहिं भूर ।
चरणदास इस ध्यानसों, सबै होत है दूर ॥
दूर करन दुख जगत के, आन उपाव न होय ।
योगी कूं या ध्यानसम, और वस्तु नहिं कोय ॥
उपनिषदा चौथी यही, भई समापत येह ।
चरणदास कहैं पांचवीं, हित चितदै सुनिलेह ॥
इति योगशिखा चौथी सम्पूर्णम् ॥
अथ तेजविन्दउपनिषद्पांचवीं
प्रारम्भः ॥
दो० उपनिषदा जो पांचवीं, वेद अथर्वण माहिं ।
तेजविन्द जिहि नाम है, समझ मुक्ति होजाहिं ॥
अष्टपदी ॥
तेजविन्दके; अर्थ यही हिय गूंध है।
१५८ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
बड़े ध्यानके तेजहि की यह बूंद है ॥
उसका है यह ध्यान जो सबसे ऊंच है।
सबसूं पर निहरूप शुद्ध अरु शूच है ॥
हिरदयही के मध्य और सूक्ष्म महा ।
अरु केवल आनन्द किन्हीं ज्ञानी लहा ॥
अनंतशक्ति जिहिमाहिं निराअस्थूल है।
बहुत पिण्ड ब्रह्मांड सबनका मूल है ॥
बड़ा विना परमान गहा नहिं जात है।
वाकि तपस्या ध्यान कउन जु दिखात है ॥
वाका देखन दुलभ सुलभ नहिं जानना ।
वह तौ समुद अथाह कछू परमान ना ॥
ज्ञानी पण्डित और सबै बुद्धिवानहीं ।
पावैं आदि न अन्त और मध्यानहीं ॥
कै बांधै ब्रह्मव्रत करै कै ध्यानहीं ।
वाही के हो रूप पावै तब जानहीं ॥
दो० जीतै पहिल अहारही, दूजे और किरोध ।
बहु मनुषों का संग तजि, छांड़ै प्रीति विरोध ॥
अष्टपदी ॥
परबल इन्द्री जान सवनकूं वश करै ।
शीत उष्ण दुख सुख स्तुति निन्दा हरै ॥
छोड़ै ही अहंकार वासना आसही ।
अपने कारण वस्तु रखै नहिं पासही ॥
पूरी राखै पैज धारणा धारिकै ।
गुरुआज्ञा गुरु सेव करै जु विचारिकै ॥
सकल मनोरथ कामना कूं करै क्षीनहीं ।
तेजबिन्दुउपनिषद्वर्णन । १५६
ऐसे जिज्ञासूकूं चाहिये द्वारे तीनहीं ॥
एक जो द्वारा त्याग दुजा जो उपावही ।
तीजा गुरु की निश्चय ऐस सुभावही ॥
इन द्वारों में राह जु आगे की खुलै ।
लुटै थकै वह नाहिं सुखालाही चलै ॥
जीवातम जों हंस कहावत है यही ।
याके हैं स्थान जो तीनोंहीं सही ॥
जाग्रत स्वपन सुषोपत परगट जानिये ।
तुरिया निज अस्थान गुप्त पहिंचानिये ॥
दो० इन तीनों से बड़ा है, तुरिया कूं नितजान ।
चरणदास पोषण¹ जगत, वाके ना अस्थान ॥
अष्टपदी ॥
जैसे भूत अकाश यों व्यापक ह्वै रहो ।
सब इन्द्रिन के माहिं जो सूक्ष्म जो रहो ॥
वाकी सत्तासेती चेतनहीं रही ।
वही बड़ापद जान विष्णु का है सही ॥
वाके नेत्र हैं तीन जो तीनों वेदही ।
अरु वाके गुण² तीन जो किया न खेदही ॥
है सबका आधार³ त्रिलोकी धारई ।
आप रहै निरधार⁴ जो अपरमपारई ॥
है निहरूप अडोल अखंड अगाधही ।
है तौ निस्सन्देह पहुँचे न उपाधही ॥
करि न सकै परवेश वरण गुण रूपही ।
— १ पालन करनेवाला २ सत रज तम ३ धारण कियाजाय ४ जो न धारण
कियाजाय ॥
१६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अरु सब गुण वा माहिं जु अधिक अनूपही ॥
पावै केवल¹ ज्ञानसुं , आप में आपही ।
वावन अक्षर माहिं नाम नहिं थापही ॥
वह तौ निर आनन्द काहु से है नहीं ।
कठिन परापत होय सुलभ देखै नहीं ॥
दो० वह उपजै विनशै नहीं, अज² अविनाशीसोय ।
बिन इच्छा थिरही रहै, चरणदास नित जोय ॥
अष्टपदी ॥
वह सबही को विराट पिण्ड अरु जीव है ।
नाना कौतुक होयं अन्त वहि सीव है ॥
ज्ञान से जुदा न जान निरा वह ज्ञान है ।
वही महा आकाश नहीं परमान है ॥
सबमाहीं परवेश जो आतम सत्त है ।
आपमें पूरण आप परमही तत्त है ॥
अज्ञानी जानै झूठ झूंठ पहुचै नहीं ।
वह तौ सदा नित जान कभी विनशै नहीं ॥
वाकूं कहा नहिं जाय जाप जापक कभी ।
अरु सारे हैं जाप उसी माहीं सभी ॥
और जपाभीगया जाप जापक वही ।
सबकुछ उसकूं जान गुप्त³ परगट सही ॥
वह निर्गुण निर्लिप्त कोई गुण नाहिनै ।
परसूं पर तापरै जानिले वाहनै ॥
वासूं पर नहिं और विचारा जायना ।
कहैं चरणहींदास कछू वा माहिंना ॥
१ सूक्ष्म २ जो पैदा न हो ३ छिपाहुआ ॥
तेजविन्दूपनिषद्वर्णन । १६१
दो० वाकूं जाग्रत है नहीं, वाकूं स्वप्न न कोय ।
सोवन स्वप्ना है नहीं, जाग्रत कैसे होय ॥
अष्टपदी ॥
दुऔ से न्यारा जान जाग्रत अरु स्वप्नसूं ।
ऐसा कोई नाहिं न जानै सत्तहूँ ॥
सबका जानत मूल जु ज्ञानी लोयही ।
दीरघ अरु परकाशी जानै सबको यही ॥
जाकूं लोभ न होय अविद्या^१ होयना ।
भै अभिमान कुकर्म वासना कोयना ॥
गरमी जाड़ा भूख प्यासं व्यापै नहीं ।
पह्ये क्रोध न मोह नेक वामें कहीं ॥
वाहन इच्छा होय न पूरी चाहहीं ।
कुल विद्या अभिमान न उनके माहिहीं ॥
मान नहीं अपमान न मन में लावई ।
सबसूं होय निवृत्त ब्रह्मकूं पावई ॥
तेजविन्द उपनिषद् संपूर्णही भई ।
गुरु शुकदेव के दास चरणदासा कही ॥
ताहि सुनै मनराखि विचाराही करै ।
निश्चय होवै मुक्त जगत में ना परै ॥
दो० कही गुरू शुकदेव ने, मेरी कछू न बुद्धि ।
पढ़ो नहीं मूरख महा, मोकूं नेक न शुद्धि ॥
मेरे हिरदय के बिषे, भवन^२ कियो गुरु आय ।
वई विराजत हैं सदा, मेरी देह दिखाय ॥
जबसूं गुरु किरपाकरी, दर्शन दीन्हों मोय ।
१ माया २ घर ॥
१६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
रोम रोम में वै रमे, चरणदास नहिं कोय ॥
जातिवरणकुलमनगया, गया देह अभिमान ।
अपने मुखसों कह कहौं, जगही करै बखान ॥
रहे गुरू शुकदेवजी, मैं मैं गई नशाय ।
मैं तैं तैं मैं वही है, नखशिखरहो समाय ॥
इति श्रीचरणदासकृतपंचोपनिषद् संपूर्णम् ॥
अथ चरणदासजीकृत भक्तिपदार्थ
प्रारम्भः ॥
दो० प्रणवों श्रीमुनि व्यासजी, मम हिरदय में आय ।
भक्तिपदारथ कहत हूं, तुम्हीं करौ सहाय ॥
प्रेम पगावन ज्ञान दे, योग जितावन हार ।
चरणदास की बीनती, सुनियो बारंबार ॥
तुम दाता हम माँगता, श्रीशुकदेव दयाल ।
भक्ति दई ब्याधा गई, मेटे जग जंजाल ॥
किसू कामके थे नहीं, कोऊ न कौड़ी देह ।
गुरु शुकदेव कृपाकरी, भई अमोलक देह ॥
को है कोई न जानता, गिनती में नहिं नाँवँ ।
गुरु शुकदेव कृपाकरी, पूजन लागे पावँ ॥
सीधी पलक न देखते, छूते नाहीं छाहिं ।
गुरु शुकदेव कृपा करी, चरणोदक लेजांहिं ॥
दूसरे के बालकहुते, भक्ति बिना कंगाल ।
१ उपद्रव ॥
• भक्तिपदार्थवर्णन । १६३
गुरु शुकदेव दयाकरी, हरिधन किये निहाल ॥
जा धन कूं ठग ना लगे, धारी सकै न लूट ।
चोर चुरायसकै नहीं, गाँठ गिरै नहिं खूट ॥
बलिहारी गुरु आपने, तन मन सदकै जावँ ।
जीव ब्रह्म क्षणमें कियो, पाई भूली ठाँवँ ॥
हरिसेवा सोलह बरस, गुरुसेवा पल चार ।
तौभी नहीं बराबरी, वेदन कियो विचार ॥
गुरुकी सेवा साधू जानै । गुरु सेवा कहा मूढ़ पिछानै ॥
गुरु सेवा सबहुन पर भारी । समझ करो सोई नर नारी ॥
गुरु सेवा सों विघ्न विनाशै । दुरमति भाजै पातक नाशौ ॥
गुरु सेवा चौरासी छूटै । आवागमन का डोरा टूटै ॥
गुरु सेवा यमदण्ड न लागै । ममता मरे भक्ति में जागै ॥
गुरु सेवासूं प्रेम प्रकाशै । उनमत होय मिटै जग आशै ॥
गुरु सेवा परमातम दरशै । त्रैगुण तजि चौथापद परशै ॥
श्रीशुकदेव बतायो भेवा । चरणदास कर गुरुकी सेवा ॥
दो० गुरु सेवा जानैं नहीं, पाँय न पूजै धाय ।
योगदान जप तप कियो, सभी अफल हो जाय ॥
योगदान जप तारथ न्हाना । गुरु सेवा बिन निरफल जाना ॥
गुरु सेवा बिन बहु पछितैहौ । फिर फिर यम के द्वारे जैहौ ॥
गुरु सेवा बिन अतिदुख पैहौ । जग में पशु दारिद्री हैहौ ॥
गुरु सेवा बिन कौन उतारे । भवसागर सूं बाहर डारै ॥
गुरु सेवा बिन जड़ कहा करिहो । काकी नाव बैठि करि तरिहो ॥
गुरु सेवा बिन कहुनहिं सरि है । महाअंध कूप में परि है ॥
गुरु सेवा बिन घट अँधियारा । कैसे प्रकटै ज्ञान उजियारा ॥
नरक निवारण गुरु शुकदेवा । चरणदास करि तिनकी सेवा ॥
१६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रंथ ।
दो० इन्द्रीजित निरवैरता, निरमोही निरबन्ध ।
ऐसे गुरु की शरणसूं, मिटै सकल दुखद्वन्द ॥
राग द्वेषे दोनों से न्यारे । ऐसे गुरू शिष्य कूं तारे ॥
आशा तृष्णा कुबुधि जलाई । तन मन वचन सबन सुखदाई ॥
निरालम्ब निर्भरम उदासी । निरविकार जानौ निरवासी ॥
निरमोहत निरबन्ध निशंका । सावधान निरवाण अशंका ॥
सारग्रही और सर्वंगी । संतोषी ज्ञानी सतसंगी ॥
अयाचीक जत निर अभिमानी । पक्ष रहत स्थिर शुध बानी ॥
निहतरंग नाहीं परपंचा । निहकरम निरलिप्स जो संचा ॥
शीतल तासु मती शुकदेवा । चरणदास कियो सो गुरुदेवा ॥
दो० सतवादी अरु शीलवत, सुहृदै अरु योगीश ।
निहचल ध्यान समाधि में, सो गुरु विस्वेबीश ॥
भरम निवारण भय हरण, दूरकरन सन्देह ।
गुठिया खोलै ज्ञानकी, सो सतगुरु करलेह ॥
सतगुरु के लक्षण कहे, ताकूं ले पहिंचान ।
निरखपरख करदीजिये, तनमन धन अरु प्रान्॥
ऐसा सतगुरु कीजिये, जीवत डारै मारि ।
जनम जनम की वासना, ताकूं देवै जारि ॥
सतगुरु के ढिग जाइकै, सन्मुख खावै चोट ।
चकमक लग पथरीझरै, सकल जरावै खोट ॥
सतगुरु मेरा शूरमा, करै शब्द की चोट ।
मारै गोला प्रेम का, ढहै भरम का कोट ॥
मुखसेती बोलन थका, सुननें थका जू कान ।
पावनसूं फिरबा थका, सतगुरु मारा बान ॥
१ शत्रुता ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १६५
मैं मिरगा गुरुपारधी,- शब्दलगायो बाण ।
चरणदास घायल गिरे, तन मन बींधे प्राण ॥
शब्दबाण मोहिं मारियो, लगी कलेजे माहिं ।
मार हंसे शुकदेवजी, बाकी छोड़ी नाहिं ॥
सतगुरु शब्दी तेग है, लागत दो करदेहि ।
पीठि फेरि कायर भजै, शूरा सन्मुख लेहि ॥
सतगुरु शब्दी सेल¹ { धर्मी का साध ।
कायर ऊपर जो चलै, तौ जावै बरबाद ॥
सतगुरु शब्दी तीर है, तन मन कीयो छेद ।
बेदरदी समझै नहीं, विरही पावै · भेद ॥
सतगुरु शब्दी लागिया, नावक का सा तीर ।
कसकत है निकसत नहीं, होत प्रेमकी पीर ॥
संतगुरु शब्दी बांण है, अंगअंग डालातोड़ ।
प्रेम खेत घायल गिरे, टांका लगै न जोड़ ॥
सतगुरु शब्दी मारिया, पूरा आया वार ।
प्रेमी जूझे खेत में, लगा न राखा तार ॥
ऐसी मारी खैंचकर, लगी वार गइ पार ।
जिनका आपा ना रहा, भयेरूप तत्सार ॥
सतगुरु कै मारे मुये, बहुरि न उपजै आय ।
चौरासी बन्धन छुटै, हरिपद पहुँचे जाय ॥
सतगुरु के वचनों मुये, धन्यजिन्हों के भाग ।
त्रैगुणते ऊपर गये, जहाँ दोष नहिं राग² ॥
वचन लगा गुरुदेवका, छुटे राजके साज ।
हीरा मोती नारि सुत, गज घोड़ाअरु बाज ॥
१ हथियार का नाम है २ प्रेम ॥
१६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
वचन लगा गुरु ज्ञानका, रूखे लागे भोग ।
इन्द्र पदवी लौ उन्हें, चरणदास सब रोग ॥
सतगुरु ढूंढा पाइये, नहीं सुहेला होय ।
शिष्य भी पूरा कोईहै, सानी माटी जोय ॥
जाति बरन कुल आश्रम, मान बड़ाई खोय ।
जब सतगुरु के पग लगैं, सांच शिष्य है सोय ॥
गुरु के आगे राखै माथा । कहै पाप ताप दुख मेटो नाथा ॥
मैं आधीन तुम्हारौ दासा । देहु आपने चरणन वासा ॥
यह तन मन ले भेंट चढ़ायो । अपनी इच्छा कुछ न रहायौ ॥
जो चाहो सो तुम्हहीं करो । या भाँड़े में जो कुछ भरौ ॥
भावै धूप छांह में डारो । भावै डोबो भावै तारो ॥
गुण पौरुष कुछ बुधि नहि मेरी । सबविधि सरणगही प्रभु तेरी ॥
मैं चकई अरु तुम किये डोरा । मैं जो फिरूं सब तुम्हारे जोरा ॥
म आ बैठा नाव तुम्हारी । आशा नदी सुं करिये पारी ॥
अमरजाल जग सूं मोहिं काढ़ौ । हाथ जोरि चरणदासा ठाढ़ो ॥
दो० गुरु के आगे जाय करि, ऐसे बोलै बोल ।
कछूकपट राखै नहीं, अर्ज करै मन खोलं ॥
यह आपा तुमकूं दिया, जितजानों तितराख ।
चरणदास द्वारे परौ, भावै झिडको लाख ।
ऋद्धि सिद्धिफल कछु न चाऊं । जगत कामना कूं नहिं लाऊं ॥
और कामना मैं नहिं राखूं । रसना १नाम तुम्हारो भाखूं ॥
राज भोग का मोहिं न सांसा । इन्द्र पदवी लौ नहिं आसा ॥
चौरासी में बहु दुख पायो । ताते शरण तिहारी आयो ॥
मुक्त होन की मन में आवै । आवागमन सों जीव डरावै ॥
१ जिह्वा ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । २६७
रामभक्ति की चाह हमारे । याते पकड़े चरण तुम्हारे ॥
प्रेम प्रीति में हिरदा भीजै । यही दान दाता मोहिं दीजै ॥
अपना कीजै गहिये बाहीं । धरिये शिरपर हाथ गुसांई ॥
चरणदास को लेहु उबारे । मैं अंडा तुम सेवनहारे ॥
दो० अंडा ज्यों आगे गिरै, जब गुरु लेव सेइ ।
करै बराबर आपनी, शिष्य को निस्सन्देह ॥
अपना करि सेवन करै, तीनि भांति गुरुदेव ।
पंजा पक्षी कुंजमन, कछुवा दृष्टि जु भेव ॥
जो वै बिसरैं घड़ी भी, तो गंदा होइ जाय ।
चरणदास यों कहत है, गुरु को राखि रिझाय ॥
पितु सोंमाता सौ गुना, सुत को राखै प्यार ।
मनसेती सेवन कर, तन सों डाटरुगार ॥
जो देवैं दुरशीश भी, होहो लगै अशीश ।
सेवन करिसमरथ कियो, उनपर वारौं शीश ॥
माता सों हर सौगुना, जिन से सौ गुरुदेव ।
प्यार करें औगुण हरैं, चरणदास शुकदेव ॥
काचे भांड़े सों रहै, ज्यों कुम्हार को नेह ।
भीतर सों रक्षा करै, बाहर चोटैं देह ॥
दृष्टि पड़ै गुरुदेव की, देखत करैं निहाल ।
औरै गति पलटैं जबै, कागा होत मराल ॥
दया होय गुरुदेव की, भजै मान अरु मैन१ ।
भोगे वासना सब छुटै, पावै अतिही चैन ॥
जबसतगुरु किरपा करें, खोलि दिखावैं नैन ।
जग झूठा दीखन लगै, देंह परे की सैन ॥
१ कामदेव ॥
१३
१६८ श्रीस्वामीचरणदासजीका ग्रन्थ ।
अष्टपदी ॥
गुरु बिन और न जान मान मेरो कहो ।
चरणदास उपदेश बिचारतही रहो ॥
वेदरूप गुरु होय कि कथा सुनावई ।
पण्डित को धरिरूप कि अरथ बतावई ॥
गुरु हो शेष महेश तोहिं चेतन करै ।
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु होय खाली भरै ॥
कल्पवृक्ष गुरु देव मनोरथ सब सरै ।
कामधेनु गुरुहोय क्षुधा तृष्णा हरै ॥
गंगासम गुरु होय पाप सब धोवई ।
शशियर सम गुरू होय तपन सब खोवई ॥
सूरजसम गुरु होय तिमिर सब लेवई ।
पारब्रह्म गुरु होय मुक्ति पद देवई ॥
गुरुही को करि ध्यान नाम गुरु को जपौ ।
आपा दीजै भेंट पूजन गुरुही थपौ ॥
समरथ श्रीशुकदेव कहा महिमा करौं ।
अस्तुति कही न जाय शीश चरणन धरौं ॥
दो० हरि रूठै कुछ डर नहीं, तूभी दे छुटकाय ।
गुरु को राखौ शीशपर, सबविधि करें सहाय ॥
अष्टपदी ॥
गुरुकोतजि हरि सेव कभी नहिं कीजिये ।
वे मुख को नहिं ठौर नरक में दीजिये ॥
गुरुनिंदक नहिं मुक्त गर्भ फिरि आवई ।
चौरासी लख भुक्ति महा दुख पावई ॥
१ सिखावना २ भूख ३ अंधकार ॥
भक्तिपदार्थवर्णन । १६६
प्रथम करै गुरु देख परखि चरणों परै ।
उनकी धारण ध्यान टेक उर में धरै ॥
गुरु को रामहिं जान कृष्ण सम जानिये ।
गुरु नृसिंह अवतार जु बामन मानिये ॥
गुरु कोपूरण जान जु ईश्वर रूपही ।
सब कुछ गुरुको जान ये बात अनूपही ॥
हरि गुरु एकहा जानयह निहचै लाइये ।
दुबिधाही को बोझ जु वेग वगाइये ॥
धर्म्म पिता गुरुजान जु दृढ़ता राखिये ।
लाज़ सकुच करि कान ढीठता नाखिये ॥
मेरा यह उपदेस हिये में धारियो ।
गुरु चरणन मनराखि सेवातन गारियो ॥
जो गुरु झिरकै लाख तौ मुख नहिं मोड़ियो ।
गुरुसों नेह लगाय सबन सों तोड़ियो ॥
जो शिष सांचा होय तो आपा दीजियो ।
चरणदास की सीख समझकर लीजियो ॥
मोको श्रीशुकदेव यही समझाइया ।
वेद पुराणन माहिं जुयोहीं गाइया ॥
दो० गुरु अस्तुति कहकहिसकै, चरणदास कहाबुद्धि ।
भक्तों की अब कहत हों, जो वै देवैं शुद्धि ॥
भक्तनकी अस्तुति किये, तन मन हियो सिराय ।
कलिका मैल रहै नहीं, बुधि उज्ज्वल ह्वैजाय ॥
साधों की सेवा करो, चरणदास चित् लाय ।
जनम मरण बंधन कटैं, जगतब्याधि छुटिजाय ॥
१ दुःख ॥
१७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
'जो भक्तों की सेवा करै । यमके कंधे नाहीं परै ॥
जिन साधौं का दरशन देखा । ताका यमसों रहा न लेखा ॥
जो भक्तनको शीश नवावै । तन छूटै जब दुख नहिं पावै ॥
जो कोइ साध संगमें रलै । जठर¹ अग्नि में नाहीं जलै ॥
जो साधौंकी अस्तुति भाखै । पाव भक्ति प्रेमरस चाखै ॥
जो भक्तों सो प्रीति लगावै । 'वह हरिको निश्चय अपनावै ॥
जो भक्तों की वाणी गावै । समझै अर्थ परमपद पावै ॥
साधुसंगतबिन गति नहिं होनी । क्या तपसी अरु क्या भया मौनी ॥
चरणदास भक्तोंकी शरना । हाईं जीवन हाईं मरना ॥
दो० भक्तिवान निर्मल दशा, संतोषी निर्वास ।
मनराखै नवधा बिषे, और न दूजी आस ॥
दयावान दाता गुण पूरे । पैज धारणा बचनों शूरै ॥
मुक्त कामना फल नहिं चाहैं । रिद्धि सिद्ध अरु त्यागै लाहैं ॥
हानि लाभ जिनके नहिं टोंटा । वैरी मित्र खरा नहिं खोंटा ॥
मान अपमान कछू नहिं तिनके । दुख सुख एक बराबर जिनके ॥
शुभअरु अशुभ कछू नहिं जानैं । राव रंक को ना पहिंचानैं ॥
कंचन कांच बराबर देखै । जग ब्योहार कछू नहिं लेखै ॥
हार जीत नहिं वाद विवादा । सदा पवित्र संमझ अगाधा² ॥
हर्ष शोक जिनके नहिं कबहीं । लख चौरासी प्यारे सबहीं ॥
हिंसा³ अकस भाव नहिं दूजा । सब जीवनकी राखै पूजा ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । ऐसे लक्षण साधु कहावै ॥
दो० भक्तों की पदवी बड़ी, इन्द्रहुसे अधिकाय ।
तीन लोकके सुख तजे, लीन्हें 'हरि अपनाय ॥ :
अंनन्यभक्त⁴ निहकाम जो, करै सोइ चरणदास ।
१ गर्भ २ जिसकी थाह न मिलै ३ वैरभाव ४ जो दूसरेका भक्त न हो ॥
- भक्तिपदार्थवर्णन । १७१
चार मुक्ति१ वैकुण्ठ लौ, सबसे रहै निरास ॥
प्रभु अपने मुख से कहो, साधू मेरी देह ।
उनके चरणन की मुझे, प्यारी लागै खेह ॥
आठ सिद्धि वै लें नहीं, कनक कामिनी नाहिं ।
मेरे सँग लागे रहें, कभी न छोड़ै बाहिं ॥
सब तजि कर मौं को भजै, मोहीं सेती प्रीति ।
मैं भी उनके कर बिक्यो, यही जु मेरी रीति ॥
साधु हमारी आतमा, सबसे प्यारे मोहि ।
नारद निश्चय कीजिये, सांच कहत हौं तोहि ॥
जिनके कारण मैं रचौं, अद्भुत यह संसार ।
उन्हीं की इच्छा धरूं, हर युग में अवतार ॥
प्रेमी को ऋनियां रहौं, यही हमारो २सूल ।
चारि मुक्ति दई ब्याज में, दे न सकौं अब मूल ॥
सर्वस दीन्हों भक्त को, देख हमारो नेह ।
निर्गुण सों सगुण भयो, धरी पशूकी देह ॥
मेरे जन मोमें रहें, मैं भक्तन के माहिं ।
मेरे अरु मेरे सन्तके, कछु भी अन्तर नाहिं ॥
साध सोवै तहाँ सोयरहुं, भोजन सँगही जेवँ ।
जो वह गावै प्रेम सों, मैंहूँ ताली देवँ ॥
मम भक्ता जित जित फिरें, गवनैं लागाजावँ ।
जहां तहां रक्षा करौं, भक्तवछल मेरो नावँ ॥
भक्त हमारो पग धरै, जहां धरूं मैं हाथ ।
लारे लागोही फिरौं, कबहुँ न छोड़ साथ ॥
मोको वश कियो जो चहै, भक्तन की करि सेव ।
१ सारूप्य, सालोक्य, सामीप्य, सायुज्य २ ऋण ॥
३७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
उनमें है कर मैं मिलौं, करौं बहुतही हेव¹ ॥
पृथ्वी पावन होत है, सबही तीरथ आदि ।
चरणदास हरि यों कहैं, चरण धरैं जब साध ॥
जिनकी महिमा प्रभुकहैं, अपने मुख सों भाखि ।
तितकी कौन बराबरी, वेद भरत हैं साखि² ॥
जिनकी आशा करत हैं, स्वर्ग माहिं सब देव ।
कबहुँ दरशन पाय हैं, चरण कमल की सेव ॥
अपने अपने लोक में, सभी करें उत्साह ।
साधूकाया छोड़ करि, गगन करै किस राह ॥
धनि नगरी धनि देशहै, धनि पुर पट्टन³ गाँव ।
जहाँ साधूजन उपजियो, ताके बलि बलि जावँ ॥
भगत जुझावैं जगत में, परमारथ के हेत ।
आप तरैं तारैं परा, मंडैं भजन के खेत ॥
भवसागरसों तारि करि, लै जावैं बहु जीव ।
साधू केवट⁴ राम के, पार मिलावैं पीव ॥
काम क्रोध मोह लोभहनि, गर्भ तजै जो साध ।
राम नाम हिरदै धरै, रोम रोम औराध ॥
साधू महिमा को कहै, शोभा अधिक अपार ।
रसना⁵ दोय हजार सों, शेषहु जावैं हार ॥
अनन्य भक्ति करि प्रेमसों, जीति लिये गोविन्द ।
चरणदास हो वश किये, पूरण परमानन्द ॥
तप के बरष हजारहू, संतसंगत घड़ि एकं ।
तौभी सरिवर ना करै, शुकदेव कियां विवेक ॥
सतसंगति महिमा बड़भाई । स्मृति वेदपुराणन गाई ।
१ स्नेह २ गवाही ३ शहर ४ नाव खेनेवाला मल्लाह ५ जीभ ॥