भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बड़े भाग मेरे जगे, पूरुबले परताप ।
किरपा श्रीगोपाल की, आय मिले तुम आप ॥
चरणदास अपनो कियो, दियो परम सन्तोष ।
बैठि करूंगो ध्यानही, अब कुछ रह्यो न शोक ॥
चलत फिरत ह्यां आइया, तुम भरि दीन्ह्यो मोहिं ।
नैन प्राण तन मनसभी, देखत अरपे तोहिं ॥
चाहमिटी सब सुख भये, रहा न दुखका मूल ।
चाहूं तौ चाहूं यही, तुम चरणनकी धूल ॥
गुरुवचन ॥
योग तपस्या कीजियो, सकल कामना त्याग ।
ताको फलमत चाहियो, तजौ दोष अरु राग ॥
अष्ट सिद्धि जो पै मिलै, नेक न कीजै नेह ।
धरि हिरदय परमात्मा, त्यागे रहियो देह ॥
जेंती जगकी वस्तुहै, तामें चित्त न लाय ।
सावधान रहियो सदा, दियो तोहिं समुझाय ॥
बार बार तोसे कहूँ, ह्यां मत दीजो चित्त ।
सिद्ध स्वर्गफलकामना, तजि कीजो हरिमित्त ॥
जो कीजै हरि हेतही, एहो चरणहि दास ।
भक्तियोग अरु शुभकरम, नीकी ठौर निवास ॥
शिष्यवचन
ऐसेही अब करूंगो, तुम चरणन परताप ।
अष्ट सिद्धि समझौ चहौं, वर्णन कीजै आप ॥
समझौं तौ त्यागूं उन्हें, करवाओ पहिंचान ।