सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

१०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बड़े भाग मेरे जगे, पूरुबले परताप ।
किरपा श्रीगोपाल की, आय मिले तुम आप ॥
चरणदास अपनो कियो, दियो परम सन्तोष ।
बैठि करूंगो ध्यानही, अब कुछ रह्यो न शोक ॥
चलत फिरत ह्यां आइया, तुम भरि दीन्ह्यो मोहिं ।
नैन प्राण तन मनसभी, देखत अरपे तोहिं ॥
चाहमिटी सब सुख भये, रहा न दुखका मूल ।
चाहूं तौ चाहूं यही, तुम चरणनकी धूल ॥
गुरुवचन ॥
योग तपस्या कीजियो, सकल कामना त्याग ।
ताको फलमत चाहियो, तजौ दोष अरु राग ॥
अष्ट सिद्धि जो पै मिलै, नेक न कीजै नेह ।
धरि हिरदय परमात्मा, त्यागे रहियो देह ॥
जेंती जगकी वस्तुहै, तामें चित्त न लाय ।
सावधान रहियो सदा, दियो तोहिं समुझाय ॥
बार बार तोसे कहूँ, ह्यां मत दीजो चित्त ।
सिद्ध स्वर्गफलकामना, तजि कीजो हरिमित्त ॥
जो कीजै हरि हेतही, एहो चरणहि दास ।
भक्तियोग अरु शुभकरम, नीकी ठौर निवास ॥
शिष्यवचन
ऐसेही अब करूंगो, तुम चरणन परताप ।
अष्ट सिद्धि समझौ चहौं, वर्णन कीजै आप ॥
समझौं तौ त्यागूं उन्हें, करवाओ पहिंचान ।