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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
आनंदहि आनंद जहाँ, तहां न काल कलेश।
तीनों गुन नहि पाइये, ह्वांनहिं मायालेश॥
जीवातम परमात्मा, होय जाय वा ठौर।
ध्याता ध्यानन ध्येह जहँ, तहांन किरिया और॥
महावन्धसाधनविधि॥
महाबन्ध तोहिं पहल बताऊं। पाछे मूलवन्ध समझाऊं॥
बायां पाँव सिवन गहि दीजै। मूल द्वार ऐंडी बँध कीजै॥
दहिनी जंघ जंघपर लावै। गउमुख आसन नाम कहावै॥
राखै चिबुक हृदय पर लाय। पवनराह पूरव को जाय॥
ध्यान त्रिकूटी संयम करै। प्राण वायु हिरदे में धरै॥
महाबन्ध ऐसे करि साधै। गुरू प्रताप याहि औराधै॥
बिना पुरुष तिरियाकूं जानौ। बन्ध बिना मुद्रा पहिंचानौ॥
निरफल जायपुरुष बिन नारी। महावन्ध बिनु मुद्राधारी॥
माहिं कण्ठके ध्यान लगावै। सुरत निरत ह्वांईं ठहरावै॥
दो० महाबंध अस्थत करै, सो योगी द्वै जाय।
पवन पंथ मुंदित करै, ध्यान कण्ठ में लाय॥
शशियरकूं सूरज पर लावै। रेचक पूरक पवन फिरावै॥
महावंध करै अभ्यासा। अमृत अचवै बुझै पियासा॥
जरा मृत्यु देही नहिं आवै। महा बंध तीनौ गुन पावै॥
जठर अग्नि परचै बहुभारी। निशिदिन माहिं करै अठवारी॥
पहर पहर भर पवन भरीजै। प्रथम अल्प अभ्यास करीजै॥
तिय सेवन तापन नहिं करै। काम अग्नि काया नहि जरै॥
दो० ऐसी विधि साधै पवन। योग पंथ धरि पाय।
पहर पीङ्गला बनत जन आयुरदा बढ़िजाय॥