भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
नामरूप मुद्रौं का जान । तीन बंध का नाम बखान ॥
चौरासी आसन का नाँवँ । और बतावो मन के पाँवँ ॥
स्वर्ग मर्त्य अरु कहां पताल । कहां सत्य अरु कहां तिताल ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव । सोतौ जानै सबही भेव ॥
दो० कै प्रकार का योग है, कै प्रकारकी भक्ति ।
पांच भूमिका ज्ञानकी, सातकलाका अर्थ ॥
୨ को नगरी का राज करै । को जीवै अरु कौन मरै ॥
୨ पेट बड़ा किसका है जान । पूजा बड़ी ताहि पहिंचान ॥
୨ सब में बड़ा कौन आहार । ताको सुरता लेहु निहार ॥
୨ ताबिन एक घड़ी नहिं रहै । भेदी होय सो भेदै कहै ॥
୨ सबमें बड़ी कहा जो पूजा । जाकी सम दीखै नहिं दूजा ॥
कहा सो सबको लग्गमलग्गा । कौनपुरुष सो भग्गमभग्गा ॥
୨ कहा घटै सो घटैई घटै । कहा बढ़ै सो बढ़ैई बढ़ै ॥
୨ घटै न बढ़ै सो बस्तु कहा । घटे बढ़े भी ताहि बता ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव । सो तौ जानै सबही भेव ॥
୨ दो० क्षरके कहा जु अर्थ हैं, अक्षर देहु दिखाय ।
निअक्षर के रूपको, भिन्न भिन्न समझाय ॥
ॐकारका अर्थ बतवो । महत्तत्व का रूप दिखावो ॥
୨ मन चक्कर का कैसा रंग । मन मनसा दोउ कैसे संग ॥
୨ कौन घाट हौ लगे समाध । कित जा देखै खेल अगाध ॥
चौबिस शून्य हैं जहाँ जहाँ । बज्जर ताला लागै कहाँ ॥
वज्रद्वार बिन पावै कहाँ । बिन पाये उरले घर रहा ॥
आठ महलका करौ बखान् । कासों कहिये पद निर्वांन ॥
जो तुम जानौ ऊरधरेता । तौ तुम भेद कहौ अब केता ॥-
दीप मुद्रा अरु मुद्रा राज । जासों सुधरैं काया काज ॥