सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 690 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६६
चार अवस्थामाहिं तुर्या वड़िपाइये ॥
परम शून्यको ध्यान परेसून्हे परै ।
याकीसम कोइ नाहिं ध्यान तिनको धरै ॥
अजपाहीके जाप बराबर औरना ।
शीलदयासे मीत न कोई देहमा ॥
पूजन मैं बड़ि जान जुआतमकी करै ।
ज्ञानसमान न दान सकल विपता हरै ॥
गुरुसा रक्षक और नहीं कोइ लोकमें ।
योग युक्तिसा स्वाद नहीं कोइ भोकमें ॥
कह शुकदेव सुनौ रणजीतही ।
वड़ी वड़ी जोगांसे खोल तुमकूं जुदी ॥
छन्द ॥
अमरी करतै बजरी रोंकै बजरी करतैं बाई ।
रोंकै छींक साधना करिकै नासालेहु जँभाई ॥
जल संयमसूं नभकूं देखै संयम नादसुं ज्योती ।
संयम पवन होय थिरकाया सो वश राखै मोती ॥
जिया विछावै मृत्यकबौदै बूढ़ी होय न काया ।
संयम नींद विंदनहि जावै यह शुकदेव बताया ॥
दहिने स्वरमें भोजन कीजै बायें स्वरमें पानी ।
दहिने स्वरमें अमरी रेचै देह न होय पुरानी ॥
दहिने स्वरमें जलसूं न्हावै बायें स्वरमें लङ्की ।
शिव आसनसूं सोवन कीजै नारिन कीजै सङ्की ॥
पावकसूं तापन नहिं कीजै जो तापै तौ नैना ।
भोजन गरम न खट्टा खावै फटै झिरै नहिं मैना ॥
॥ ... ॥