भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन । ६६
चार अवस्थामाहिं तुर्या वड़िपाइये ॥
परम शून्यको ध्यान परेसून्हे परै ।
याकीसम कोइ नाहिं ध्यान तिनको धरै ॥
अजपाहीके जाप बराबर औरना ।
शीलदयासे मीत न कोई देहमा ॥
पूजन मैं बड़ि जान जुआतमकी करै ।
ज्ञानसमान न दान सकल विपता हरै ॥
गुरुसा रक्षक और नहीं कोइ लोकमें ।
योग युक्तिसा स्वाद नहीं कोइ भोकमें ॥
कह शुकदेव सुनौ रणजीतही ।
वड़ी वड़ी जोगांसे खोल तुमकूं जुदी ॥
छन्द ॥
अमरी करतै बजरी रोंकै बजरी करतैं बाई ।
रोंकै छींक साधना करिकै नासालेहु जँभाई ॥
जल संयमसूं नभकूं देखै संयम नादसुं ज्योती ।
संयम पवन होय थिरकाया सो वश राखै मोती ॥
जिया विछावै मृत्यकबौदै बूढ़ी होय न काया ।
संयम नींद विंदनहि जावै यह शुकदेव बताया ॥
दहिने स्वरमें भोजन कीजै बायें स्वरमें पानी ।
दहिने स्वरमें अमरी रेचै देह न होय पुरानी ॥
दहिने स्वरमें जलसूं न्हावै बायें स्वरमें लङ्की ।
शिव आसनसूं सोवन कीजै नारिन कीजै सङ्की ॥
पावकसूं तापन नहिं कीजै जो तापै तौ नैना ।
भोजन गरम न खट्टा खावै फटै झिरै नहिं मैना ॥
॥ ... ॥