भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन । १०६
बासलहो हरि धाम में, ह्यां वा हो धन धन्न ॥
राचस तामस सात्त्विकी, क्षेत्तर तीनहिं भाँति ।
क्षेत्रक आतम देवहै, सबको सहिये क्रांति ॥
सब में देखे आप कूं, सब कूं अपने मांहिं ।
पावै जीवनमुक्ति को, यामें संशय नाहिं ॥
सब में देखे आतमा, आपन मैं करि ध्यान ।
यही ज्ञान ब्रह्मज्ञान है, यही जु है विज्ञान ॥
अहंकार मिटि ब्रह्महो, परमातम निरवान ।
शुकदेवाहो कहतहूं, चरणदास हिय आन ॥
जो तें पूंछा सो कहा, भेद कहा सब खोल ।
अरु तेरे हियमें कछू, सकुच खोल कर बोल ॥
शिष्यवचन ॥
अपना लखि किरपाकरी, समझायो बहुभांति ।
योग औरतैं गुरूजी, हिये में आई शांति ॥
तुम्हरी कह अस्तुति करूं, मोपै कही न जाय ।
इतनी शक्ति न जीभकी, महिमां कहै बनाय ॥
किरपाकरी अनाथ पर, तुमहो दीनानाथ ।
हाथ जोड़ि मांगौं, यही, मम शिर तुम्हरो हाथ ॥
मोसे रंक गरीबकी, तुम गहि पकरी बांह ।
भव बूड़ंत राखा मुझे, चरण कमलकी छाहं ॥
आपहि तुम किरपाकरी, मैं कित लहता तोहिं ।
तुमको पाऊं ढूंढ़िकरि, इतनी शक्ति न मोहिं ॥
व्यास पुत्र शुकदेव तुम, जक्त माहिं विख्यात ।
तुम दर्शन दुर्लभ महा, पुरुषनको न दिखात ॥