भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० पोथी माहीं देखि करि, करै जु कोई योग ।
तन छीजै सिधि ना भवै, देहो आवै रोग ॥
देखि देखि गुरु सों करै, लै अज्ञा रहु संग ।
सिद्धि होय, साधन सबै, कछू न आवै भंग ॥
योग तपस्या में बड़ा, पहुँचावै हरि पास ।
जन्म मरण बिपता मिटै, रहै न कोई आस ॥
शिष्यवचन ॥
मैं समझी जानी सभी, सूझभई हिय माहिं ।
किरपाकरि जो जो कहा, ताको बिसरूं नाहिं ॥
व्यासदेव श्री जनक जै, जै जै श्री शुकदेव ।
जै जै यह सुकतारहै, समुझायो करि हेव ॥
हियहुलसो आनँदभयो, रोम रोम भयो चैन ।
भये , पबित्तर कान ये, सुनि सुनि तुम्हरे बैन ॥
छप्पै ॥
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरू देवनके देवा ।
सर्व सिद्धि फल देन गुरू तुम मुक्ति करेवा ॥
गुरु केवट तुम होय करौ भवसागर पारी ।
जीव ब्रह्म करिदेत हरौ तुम व्याधा सारी ॥
श्रीशुकदेव दयाल गुरु चरणदास के शीश पर ।
किरपाकरि अपनौ कियौ सबही विधिसों हाथधर ॥
इति श्रीगुरुचेलासंवादअष्टाङ्गयोगसम्पूर्णम् ॥