सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८१
ज्यों ज्यों इनको भोगदै, परबल हाती जाहिं ।
विना भोग होहीं नहीं, वह बल रहै जुनाहिं ॥
नैन जु भोगैं रूप को, और गन्ध को घ्रान ।
षटरस भोगै जीभही, शब्दहि भोगै कान ॥
त्वचा भोगि अस्पर्शको, बाढ़ै अधिक विकार ।
पांचौ इन्द्री जानिले, इनका यही अहार ॥
इनसेमिलिमिलि मनबिगड़ि, होयगया कछुऔर ।
इन्द्री रोकै मन रुकै, रहै जु अपनी ठौर ॥
ज्यों ज्यो होवै प्राणवश, त्यों त्यों मनवश होय ।
ज्यों ज्यों इन्द्री थिररहें, विषयजाय सब खोय ॥
ताते प्राणायाम करि, प्राणायामहिं सार ।
पहिले प्राणायामकर, पीछे प्रत्याहार ॥
इति प्रत्याहारअंगसम्पूर्णम् ॥
अथ षष्ठधारणाअंग वर्णन ॥
दो० तत्त्वनकी कहुँ धारणा, तिनमें करै प्रवेश ।
शनैःशनैः साधिकरि, पहुँचे निर्भयदेश ॥
पहिले भूमि धारणा कीजै । ठौर कालजेमें चितदीजै ॥
पीतवरण चौकोर अकारो । विधि दैवत है तहां विचारो ॥
प्राण लीनकरि पांचघड़ीहीं । चित अस्थिर होवैगा जबहीं ॥
यासों पृथिवीको वश करिये । यही धारणा जो चित धरिये ॥
हिरदै से ऊपर जल जानो । कण्ठतईं ताको पहिंचानो ॥

८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चन्दफांक अरु श्वेत अकारो । हृषीकेश तहँ देव निहारो ॥
ह्यां हूं पांच घरी अस्थापै । प्राणलीन करि चितदै आपै ॥
व्यापैना विष काहू विधिको । शुकदेवकहैंफलजलकेसिधिको ॥
दो० कण्ठसे ऊपर तालुका, लो पावक अस्थान ।
लालरंग तिरकोन है, रुद्र देवता मान ॥
तहां लीन करि प्राणको, पांच घड़ी परमान ।
भय व्यापै नहिं ज्वालको, अग्निधारणा जान ॥
जाके आगे वायु है, भृकुटीलौं मर्य्याद ।
मेघ बरण षटकोन है, ईश्वर देवत साध ॥
प्राणलीन तहँ कीजिये, पांच घड़ी रे तात ।
पैहै खेचर सिद्धिही, तत पदही ह्वै जात ॥
ब्रह्मरंध्र आकाश है, बड़ा जु तत्त्व न माहिं ।
श्याम बरण ब्रह्म देवता, योगी जहां सिराहिं ॥
प्राण लीन घटि पांचकरि, पावै मुक्ति अनूप ।
व्योमतत्त्व की धारणा, जहां छाँह नहिं धूप ॥
पृथ्वी संग लकारही, जल के संग बकार ।
पावक संग रकार है, मारुत संग मकार ॥
पंचम तत्त्व आकाश ही, सब के ऊपर जान ।
अक्षर जहां हकारही, शुकदेव कहै बखान ॥
पहिलिं धारणा थंभनी, दूजी द्रावण होय ।
तीजी दहनी जानिये, चौथी आमनी सोय ॥
पँचवीं नाम जु शंखिनी, इनको लेवो जान ।
शुकदेवा अब कहत है, आगे और विधान ॥
गुरु की प्रथम धारणा लीजै । अपना रूप उन्हीं सा कीजै ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८३
ऐसे ध्यान सभी सुधि पावै । जैसी धारै सो होयजावै ॥
वेगिहि सब साधन सधि आवै । आलस कायरता भजिजावै ॥
लोक परलोक सभी सुख लेवै । जो गुरु को ऐसो व्रत सेवै ॥
दूजे परमातम की धारण । मुक्तिदेन अरु बंध निवारण ॥
धारनसों चित घना लगावै । सिमिटि सभी ओरनसों आवै ॥
जो कछु होय सो आगेहि आगै । टेक पकरि मारग में लागै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । सती शूरमा ज्यों मन लावै ॥
दो० प्राण वायुकी धारणा, परमेश्वर पहिंचान ।
परमातम ह्वै जात है, जोपै रोके प्रान ॥
बारह मात्रा सों चढ़ै, ह्वां तक पहुँचै जाय ।
बारह सै अरु छानवे, कुम्भक में ठहराय ॥
यही धारणा अंग है, शनै शनै कर ध्याव ।
याते दुगुनी ध्यान में, प्राण वायु परचाव ॥
दूजा जानि समाधि लो, ध्यानहिं सेती एहु ।
पांच सहस अरु एकसौ, चौरासी गिनिलेहु ॥
इति धारणांगसम्पूर्णम् ॥
अथ सातवांअंग वर्णन ॥
शिष्यवचन ॥
दो० अंग धारणा का कहा, सो धारा चितमाहिं ।
ध्यान अंग बरणन करौं, मैं रहुँ चरणन छाहिं ॥

८४
श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।

गुरुवचन ॥
चरणदास अब ध्यान सुन, कहूं तोहिं समुझाय ।
कहिशुकदेवसोसुनिसमुझि, करौ ताहि चितलाय ॥
ध्यान जु चारि प्रकार के, कहूं जु उनकी रीत ।
पदस्थ पिंड रूपस्थ है, चौथा रूपातीत ॥
अथ पदस्थध्यान ॥
हिय पदपंकज ध्यानकरि, फिरि करि सारी देह ।
नखशिखलौं छविनिरखिकै, चरणन में चितदेह ॥
कै कुंभकही कीजिये, ह्वां प्रणव का जाप ।
मन निश्चल हो सहजमें, भाजैं त्रैविधि ताप ॥
पदस्थ ध्यान याको कहैं, करै सो जानै भेव ।
पिंडस्थ ध्यान वर्णन करें, खोलि खोलि शुकदेव ॥
अथ पिंडस्थध्यान ॥
ब्रह्म सोई यह पिंड है, यामें करि करि वास ।
कमलन के लखि देवता, लहो परापत तास ॥
सोधे सिगरे पिंडको, षट चक्रहु को ध्यान ।
शोधत शोधत आचढ़ै, भवँर गुफा अस्थान ॥
तिरवेणी संगम बहै, ज्योति जहां दरशाय ।
सातजन्म सुधि होय जब, ध्यान करै मनलाय ॥
आगे कमल हजार दल, सतगुरु ध्यान प्रधान ।
अमृत द्रवे बहिचलै, हंस करै जहँ न्हान ॥
ऊपर तेजहि पुंज है, कोटि भानु परकास ।
शून्य शिखर ताऊपरै, योगी करै विलांस ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८५
अथ रूपस्थध्यान ॥
रूपस्थ ध्यानको भेद सुनि, कीजै मन ठहराय ।
देखै त्रिकुटी मध्य है, निश्चल दृष्टि लगाय ॥
ध्यान किये पहिले जहाँ, अगन फूल दृष्टाय ।
केते द्योसन माहिंहीं, दीप ज्योति प्रकटाय ॥
शनै शनै आगे जहां, दीपमाल दरशाय ।
फिरि तारों की मालसो, दामिनि बहु दमकाय ॥
बहुत चन्द सूरज घने, देखे कोटि अनन्त ।
अणुज्यों करि सूभर भरे, ध्यान माहिं दरशन्त ॥
झिलमिल झिलमिल तेजमय, भासै सब संसार ।
तन मन उपजै सुखघना, आनन्द अधिक अपार ॥
जल अथाह में डूबज्यों, देखै दृष्टि उघार ।
जो दीखै तौ नीरही, दश दिशि अपरम्पार ॥
यही ध्यान प्रत्यक्ष है, गुरू कृपासों होय ।
कहि शुकदेव वर्णदासकरि, तन मन आलस खोय ॥
अथ रूपातीतध्यान ॥
रूपातित शून्यध्यानहिंजानो । शून्यहि को परब्रह्म पिछानो ॥
त्रिकुटी परै शून्य अस्थान । सो वह कहिये पद निर्वान ॥
चिदानन्द ताकी हिय आनो । वाही में मनहीं को सानो ॥
आठपहर जहं चित्त लगावो । याके कीन्हे सों लयपावो ॥
ज्यों अकाश में पक्षी धावै । धावत धावत दृष्टि न आवै ॥
बहुरि अचानक दीखै आई । वह ध्यानी ऐसा ह्वै जाई ॥
इसपरमशून्यकाअधिकीध्याना । सब ध्यानन में है परधाना ॥
सो योगी यह लहै ठिकाना । सायुज्यमुक्तिहोइ जायनिदाना ॥

योगसार एवं अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि)

८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
दो० यासों लगै समाधिही, निद्रा कहिये योग।
ध्याता होवै लीनही, रहै न त्रिपुटी रोग॥
सतवाँ कहाजु ध्यानहीं, अठवीं कहूँ समाधि।
ज्ञान ध्यान जहँ वीसरै, तहां न विद्यावाद॥
इति ध्यानाङ्गसम्पूर्णम्॥
अथ आठवां समाधि अङ्गवर्णन ॥
अष्टपदी छन्द ॥
अठवीं कहूँ समाधि लक्षण वर्णन करूं।
तोको सब समुझाय तेरी दुविधा हरूं॥
जबहीं लगै समाधि योगी आनन्द लहै।
योग भया सिध जानि क्रिया कोइ ना रहै॥
मिलि ध्याता अरु ध्यान एक होव जहां।
दूजारहै न भाव मुक्ति वर्तै जहां॥
निरउपाधि निर्खेद ऐसा वह देश है।
करम भरम अरु धरम नहीं कोइ लेश है॥
आपार है न कोय सकल आशागरै।
चिन्ताका दुख नाहिं वासना सब जरै॥
पंच विषय जहं नाहिं नहीं गुणतीनहीं।
होवै ब्रह्म स्वरूप जीवता क्षीनहीं॥
जाग्रत स्वप्न सुषोप्ति जहां होवै नहीं।
चौथे पद को पाय होय जहँ लीनहीं॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन ८७
ऐसे कहै शुकदेव सुनौ चर्णदासही।
यह निर्द्वन्द्व समाधि करौ जहां वासही॥
दो० जहां कछू गम ना रहे, विद्या वेद न वाद।
ऋधिसिधि मिटि आनंदलहै, ऐसी शून्य समाधि॥
अष्टपदी छन्द॥
तहां किये परवेश रहै न अकारही।
रूप नाम गुण क्रिया यही साकारही॥
पाप पुण्य सुख दुःख जहां नहिं पाइये।
सतमारग कुल धर्म न देत दिखाइये॥
भूख प्यास अरु उष्ण जहां नहिं शीत है।
हर्ष शोक नहिं नेक वैर नहिं प्रीत है॥
इन्द्री मन नहिं रहत गलत है जात है।
सिध साधक गुरु शिष्य न भाव रहात है॥
उडुगन चन्द्र न सूर न दिवस न रात है।
त्वंपद ईश्वर ब्रह्म न जान्यो जात है॥
जैसे जल में नीर क्षीर में क्षीरही।
असि पद में यों जीव नीर में नीरही॥
अहं मिटै मिटि जाय जु आपा थोकही।
ना परमातम आतम बंध न मोषही॥
ऐसे कह शुकदेव यों होय समाधि में।
वैसोही है जाय सोई था आदि में॥
दो० हुता आदि परमात्मा, बिचउठि लगा विकार।
मिलि समाधि निर्मल भवै, लहै रूप ततसार॥
७

८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अष्टपदी छन्द
जहँ आतमदेव अभेव सेव्य नहिं सेवैहै ।
स्वामीजी ह्वां नाहिं पूजा नहिं देव है ॥
नौधा¹ नेम न प्रेम ज्ञान नहिं ध्यान है ॥
जड़ चेतन कछु नाहिं सुरति नहिं ज्ञान है ॥
विधि निषेध नहिं भेद अन्वैवितरेकना ।
निश्चय अरु व्यवहार कछू तामें न ह्वा ॥
उत्तम मध्यम भाव न शुभ ना अशुभहै ।
सिंह सर्प डरनाहिं औ शस्तर कोन मै ॥
पावक दग्ध न करै बहावै जल नहीं ।
ह्वां नहिं पहुँचे काल न ज्वालाहै तहीं ॥
ऐसा भवन समाधि भाग्य सों पाइये ।
तजि कै जक्त उपाधि तहां मठ छाइये ॥
यतन करै लख माहिं और सब भेषही ।
कोटिनमें कोइ होय समाधी एकही ॥
ह्वांतक पहुंचै जाय सोई सिध साध है ।
कहै शुकदेव पुकारि जु 'कठिन समाधि है ॥
दो० भक्ति योग अरु ज्ञान की, त्रैविधि कहूँ समाधि ।
गुरू मिलै तौ सुगमहै, नाहीं कठिन अगाधि ॥
अथ भक्तिसमाधि ॥
सब इंद्रिन को रोंकिकै, करि हरि चरणन ध्यान ।
बुद्धि रहै सुरत रहै, तौ समाधि मत मान ॥
ध्याता बिसरै ध्यान में, ध्यान होय लय ध्येह ।
बुद्धि लीन सुरत न रहै, पद समाधि लखिलेह ॥
१ श्रवण कीर्तन स्मरण पादसेवन अर्चन वंदन दास्य सख्य आत्मनिवेदन ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८६
अथ योगसमाधि ॥
आसन प्राणायाम करि, पवन पंथगहिलेहि ।
षट चक्र को छेद करि, ध्यान शून्य मन देहि ॥
आपा विसरै ध्यान में, रहै सुरति नहिं नाद ।
लीन होय किरिया रहित, लागै योग समाध ॥
अथ ज्ञानसमाधि ॥
जबलग तत्त्व विचारि करि, कहैं एक अरु दोय ।
ब्रह्मव्रत बांधे रहै, ह्वाँलग ध्यानहिं होय ॥
मैं तू यह वह भूलि करि, रहै जू सहज स्वभाव ।
आपा देहि उठाय करि, ज्ञान समाधि लगाय ॥
ज्ञान रहित ज्ञाता रहित, रहित ज्ञेय अरु जान ।
लगी कभी छूटै नहीं, यह समाधि विज्ञान ॥
पूछे आठों अंग तें, योग पंथ की बात ।
शुकदेव कहै तामें चलौ, गुरू कृपा लै साथ ॥
इति समाधिअङ्गसम्पूर्णम् ॥
अथ छहौकर्महठयोग वर्णन ।
शिष्यवचन ॥
दो० अष्टांग योग वर्णन कियो, मोको भई पहिंचान ।
छहौकर्म हठयोग के, बरणौ कृपानिधान ॥

६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुवचन ॥
पहिले ये सब साधिये, काया होवै शुद्धि ।
रोग न लागै देह को, उज्ज्वल होवै बुद्धि ॥
अरु साधा षटकर्म बताऊं । तिनके तोंको नाम सुनाऊं ॥
नेती धोती वसती करिये । कुंजर करम रोग सब हरिये ॥
न्योली किये भजै तन बाधा । देखिदेखि जिन गुरु सों साधा ॥
त्राटक कर्म दृष्टि ठहरावै । पलक पलक सों लगन न पावै
अथ नेतीकर्म ॥
कुं० मिही जु सूत मँगाय कै, मोटी बाटै डोर ।
ऊपर मोम रमाय कै, साधै उठकर भोर ॥
साधै उठकर भोर, डेढ़ बालिशत की कीजै ।
ताको सीधी करै, हाथ अपने में लीजै ॥
नासा रंध्र में मेल कर, खींचै अँगुली दोय ।
फेरि विलोवन कीजिये, नेती कहिये सोय ॥
दो० कान नाक अरु दांत को, रोग न व्यापै कोय ।
उज्ज्वल होवै नैनही, नित नेती करि सोय ॥
अथ धोतीकर्म ॥
धोती कर्म यासों कहैं, पट्टी सोलह हाथ ।
कोढ़ अठारह नाभवैं, करै जु नित परभात ॥
कुं० चौड़ी अंगुल चारिकी, मिही वस्त्र की होय ।
जलमें भेय निचोय करि, निगल कंठ सों सोय ॥
निगल कंठ सों सोय, सिरा बाहर रहि जावै ।
फेरि निकालै ताहि, पित्त कफ दोऊ लावै ॥
काया होवै शुद्धही, भजै पित्त कफ रोग ।
शुकदेव कहै धोती करम, साधै योगी लोग ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६१
अथ वर्मस्तीक
तीजे वस्ती कर्महीं, कहौं सुनौ चितलाय ।
क्रिया करै गन्नेसही, कुंजी तहां लगाय ॥
कुंजी तहां लगाय, मूल को धोवन कीजै ।
पसारन संकोच सुरति दै यह करि लीजै ॥
नीर गुदासों खैंच करि, थाँभै उदर मंझार ।
कछू डोल अस बैठकर, फिरि दे ताहि उतार ॥
दो० यही जु वस्ती कर्म है, गुरु बिन पावै नाहिं ।
लिंगगुदा के रोग जो, गर्मी के नशिजाहिं ॥
अथ गजकर्म
गज कर्म याही जानिये, पिये पेट भरि नीर ।
फेरि युक्ति सों काढ़िये, रोग न होय शरीर ॥
अथ न्योलीकर्म
न्योली पदमासन सों करै । दोनों कर घुटनों पर धरै ॥
पेटरु पीठ बराबर होंय । दहने बायें नले बिलोय ॥
मैल पेटमें रहन न पावै । अपान वायु तासों वश आवै ॥
तापतिली अरु गोला शूल । हौन न पावैं नेक न मूल ॥
जो गुरु करिकै ताहि दिखावै । न्यौली कर्म सुगम करि पावै ॥
और उदर के रोग कहावै । सोभी वै रहने नहिं पावै ॥
अथ त्राटककर्म ॥
त्राटक कर्म टकटकों लागै । पलक पलक सों मिलै न ताकै ॥
नन उघारेही नित रहै । होंय दृष्टि थिर शुकदेव कहै ॥
आँख उलटि त्रिकुटीमें आनो । यह भी त्राटक कर्म्म पछानो ॥
जेते ध्यान नैन के होई । चरणदास पूरण हो सोई ॥

६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० कपाल भांति अरु धौंकनी, बाघी शंख पखाल ।
चारि कर्म ये औरहैं, इनहिं छहों के नाल ॥
इति त्राटककर्म ॥
अथ खेचरीमुद्रा ॥
शिष्यवचन
दो० एक बार फिरभी कहौ, मुद्रा पांच दयाल ।
मोसे रंक अधीनपर, होकर बहुत कृपाल ॥
गुरुवचन ॥
अष्टपदी ॥
आगे मुद्रा तोहिं कही समुझाइया ।
फिरभि कहूँ अब खोलि सुनौ वितलाइया ॥
पहिले मुद्राखेचरी को साधन भनूं ।
जैसे आगे करी सबी ऋषि मुनिजनूं ॥
ताते जलके कुरले करि जुबगाइये ।
तापाछे चौबस्त को चूर्ण लाइये ॥
जिह्वा हाथमें पकरि मर्दन छीलनकरै ।
दोहनताननकरै बहुरि दशनन धरै ॥
फिरि करि छीलन ताहि छेदनहिं कीजिये ।
तोतू ज्यों कटिजाय यत्न सोइ लीजिये ॥
ब्रह्मरंध्र को धोयकै मैल निवारिये ।
बायें अँगूठे ऊपर कागको धारिये ॥
सहज सहज सरकायकै आगे लाइये ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६३
यह सब साधन कठिन गुरूसे पाइये ॥
दो अँगुली कूंवीसूं करि मेलना ।
जिह्वा उलटी राख जु नितप्रति खेलना ॥
यह उपाय षट मास करै तजिमानही ।
रसना यों बँधिजाय चढ़ै अस्थानही ॥
दो० चार काज यासूं सरैं, फलदायक बहुभांति ।
योग माहिं बड़ भूपहै,अधिकीजाकीकांति ॥
अष्टपदी ॥
एक जु प्राणायाम जीभसूं कीजिये ।
दूजे बन्ध उड्यान यहीसूं दीजिये ॥
तीजे करि करि ध्यान निरखि जहूँ ज्योतही ।
चौथे अमृत पिवै खुलै तहँ सोतही ॥
खैंचे त्रिकुटी पाट सहज अरु फेरिये ।
द्रवै सुधा१ रसनीर जहां मन घेरिये ॥
अमृतही के स्वादको कौन बखानई ।
जो कोइ अँचवै हंस सोइ पुनि जानई ॥
दिन दिन पलटै देह रक्त दूधाभवै ।
बीसबरस अरु चार माहिं ऐसा हवै ॥
इच्छाचारी होय बरस छत्तीसमैं ।
सब लोकन में जाय अपनी शक्ति ते ॥
दो० जेते विष व्यापै नहिं, रोग न दहै शरीर ।
जो कोइ पीवै युक्तिसूं, कामधेनु को क्षीर ॥
भूख प्यास अरु नींद के, रहै न तीनौ लेव ।
नाद बिन्दु गुटका बँधै, कहै यही शुकदेव ॥
१ अमृत ॥

६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तीन महीने चार का, बालक गोदी माय ।
ना वह पीवै नीरहीं, अन्न नही वह खाय ॥
वह तौ जीवै दूधसूं, वाकूं वही जुकाम ।
लगो रहै माताकुचन, निसरै एक न याम ॥
अमृत पीवै योगिया, ऐसे चरणहि दास ।
पहरहु यह छांड़ै नहीं, कामधेनु' को पास ॥
ऐसे धारै तौ बनै, सुधा रसाला संत ।
दिविकायाहोजायजब, धनिकहै कमलाकांत ॥
आठ पहर लागारहै, पीवै कै कै ध्यान ।
मैं कहा जैसाही बनै, परसै पद निरवान ॥
भेद गुरूसे ये लहै, और छिपावै वाहि ।
जोजोफलयाकेअधिक, होय परापति तांहि ॥
योगेश्वर अरु देवता, मुनी 'ऋषीश्वर जान ।
रखवारे वाके घने, करन न देवैं ध्यान ॥
टेक गहै सो जापियै, और करै ह्यां ध्यान ।
यति सती अरु गुरुमुखी, जाकी ऐसीआन ॥
बड़ी जु मुद्रा खेचरी, मुख में याका वास ।
जो कहिमें शुकदेवजी, जानलेहु चरणदास ॥
अथ भूचरी मुद्रा ॥
दूजी मुद्रा भूचरी, नासा जाको वास ।
प्राण अपान जुदी जुदी, एक करै चरणदास ॥
जितकीतितरखप्राणको, वा घरलाय अपान ।
ताहि मिलावै युक्तिसूं, करि करि संयम ध्यान ॥
जब वह जीतै पवनकूं, मन चंचल ठहराय ।
• १ इन्द्रकी गौ ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६५
गगन चढ़न की आश हो, कहैं शुकदेव सुनाय ॥
गुदाद्वार बंध दीजिये, ऐंड़ी पांव लगाय् ।
आसन सिद्धजुकीजिये, मन पवनावश लाय ।
अपान वायु जब वशभवै, ऊरध खैंच चलाय ।
सनई सनई जाचढ़ै, प्राण वायु ह्वैजाय ॥
अथ चाँंचरीमुद्रा ॥
तीजी मुद्रा चाँवरी, जाको नैनन वास ।
नासा आगे दृष्टिकूं, राखै मन धर आस ॥
अंगुल चार नासिका आगे । चित अस्थिरकरि देखन लागे ॥
खुले पांच तत करै जु कोई । मन अरु पवन जहां थिर होई ॥
फिर ढांसू नासा परि आवै । अचल टकटकी तहां लगावै ॥
जहँ बहुतक अचरज दरसावै । विभव स्वर्ग के आगे आवै ॥
जितसू पलट तिरकुटी माहीं । ध्यान करै कहुँ अन्त न जाहीं ॥
दीरघ तारासा परकासै । उदय होय सूरज ज्यों भासै ॥
चित चेतन दोउ मेला करै । लै उपजै अरु दुबिधा हरै ॥
यही चाचरी मुद्रा जानै । चरणदास याकूं पहिंचानै ॥
अथ अगोचरीमुद्रा ॥
कहूँ अगोचरि चौथि मुद्रा । तामें सुख पावै योगींद्रा ॥
यामुद्राका सँरवन बासा । शुकदेव कहैं सुन चरणहि दासा ॥
दो० ज्ञान सुरति दोउ एक है, पलट अगोचर जाय ।
शब्द अनाहद मैरतै, मन इन्द्री थिरपाय ॥
अथ उनमनीमुद्रा ॥
पाँचवीं मुद्रा उनमनी, दशवें द्वारे, वास ।
सिद्धसमाधि मिलै जहां, दग्धहोय सब आस ॥

६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
आनंदहि आनंद जहाँ, तहां न काल कलेश।
तीनों गुन नहि पाइये, ह्वांनहिं मायालेश॥
जीवातम परमात्मा, होय जाय वा ठौर।
ध्याता ध्यानन ध्येह जहँ, तहांन किरिया और॥
महावन्धसाधनविधि॥
महाबन्ध तोहिं पहल बताऊं। पाछे मूलवन्ध समझाऊं॥
बायां पाँव सिवन गहि दीजै। मूल द्वार ऐंडी बँध कीजै॥
दहिनी जंघ जंघपर लावै। गउमुख आसन नाम कहावै॥
राखै चिबुक हृदय पर लाय। पवनराह पूरव को जाय॥
ध्यान त्रिकूटी संयम करै। प्राण वायु हिरदे में धरै॥
महाबन्ध ऐसे करि साधै। गुरू प्रताप याहि औराधै॥
बिना पुरुष तिरियाकूं जानौ। बन्ध बिना मुद्रा पहिंचानौ॥
निरफल जायपुरुष बिन नारी। महावन्ध बिनु मुद्राधारी॥
माहिं कण्ठके ध्यान लगावै। सुरत निरत ह्वांईं ठहरावै॥
दो० महाबंध अस्थत करै, सो योगी द्वै जाय।
पवन पंथ मुंदित करै, ध्यान कण्ठ में लाय॥
शशियरकूं सूरज पर लावै। रेचक पूरक पवन फिरावै॥
महावंध करै अभ्यासा। अमृत अचवै बुझै पियासा॥
जरा मृत्यु देही नहिं आवै। महा बंध तीनौ गुन पावै॥
जठर अग्नि परचै बहुभारी। निशिदिन माहिं करै अठवारी॥
पहर पहर भर पवन भरीजै। प्रथम अल्प अभ्यास करीजै॥
तिय सेवन तापन नहिं करै। काम अग्नि काया नहि जरै॥
दो० ऐसी विधि साधै पवन। योग पंथ धरि पाय।
पहर पीङ्गला बनत जन आयुरदा बढ़िजाय॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६७
अथ मूलबंध ॥
मूलबंध अब कहतहूं, अपान वायु वश होय ।
ऊपर कूं खैंचन करै, मिलै प्राण मै सोय ॥
कमल कमल सीधे भवै, 'नाभि तले हो राह ।
आगे मारग सुगम हो, पहुँचै योगीनाह ॥
मूलबंध गुण ऐसा होई । वायुअधोगति जाय न कोई ॥
रेता ऊरध यासूं सधै । दिन दिन आयु सवाई बधै २॥
यासूं कारज सब वनिआवै । रोगरक्त को सभी नशावै ॥
योगी पहिले या आराधै । अपान वायु कूं नीके साधै ॥
अब मैं मूलबंध बतलाऊं । ज्योंका त्यों साधन दिखलाऊं ॥
गुदाबास याका तुम जानो । गुदा द्वार बंधनदै ठानो ॥
बायें पांव कि एँड़ीसेती । मूल द्वार रोकै करिहेती ॥
ऊरधही ३ कूं खैंचन कीजै । शुकदेव कहै नीके सुनलीजै ॥
अरु कबहूं मन ऐसीधरै । आसन पदम करन कूं करै ॥
कपड़े की इकगेंद बनावै । गुदा मध्य कसबंध लगावै ॥
योंभी वायु सधै वा भांती । जोपै लगारहै दिनराती ॥
पवन तले की ऊपरजावै । प्राण अपान सहज मिलजावै ॥
नाद बिंद रल मिलजा दोई । एकवर्ण साधै जो कोई ॥
योग माहिं यह भी परधान । बूढ़ी देह पलटहो ज्वान ॥
जठर ४ अगन बाढ़ै अधिकाय । जो चाहै तौ बहुतै खाय ॥
सुन चरणदास कहै शुकदेव । जो गुरु पूरा देवै भेव ॥
अथ जलंधरबंध ॥
दो० मूलबंध तोसूं कहा, गुण कह तब समुझाय ।
बंध जलंधर कहतहूं, सुन सरवन करि चाय ॥
१ तोंदी २ बाढै ३ ऊपर ४ पेट ॥

तीजा बंध जलंधर जानौ। कंठ वास ताका पहिचानौ ॥
ग्रीवा लटक चिबुक हिय लावै। कंठ पवन रोके परचावै ॥
हिरदै प्राण पूर करि रहिये। बंध जलंधर यासूं कहिये ॥
उरध पवन नीचे को जाय। अरध पवन ऊरधकूं लाय ॥
उदर मध्य लै ताहि बिलोय। ब्रह्मरन्ध्र जा पहुँचै सोय ॥
इह विधि ब्रह्मपंथकूं धावै। सहजै सहजै मध्य समावै ॥
जरा मरण जहँ भय नहिं व्यापै। लहै अमरपद होरह आप ॥
चरणदास शुकदेव बतावै। जोपै बंध उड्यान लगावै ॥
अथ उड्यानबंध ॥
दो० बंध उड्यान आगे कहा, जिह्वा उलट लगाय ।
कान आंख मुख नाकके, स्वर सब बंधकराय ॥
इह सुबंध महिमा अधिक, लागै बजर किवाँर ।
सातद्वार की बाटहो, निकसै नाहिं बयार ॥
पांचौ मुद्रा बंध सब, दिखलाया यह देश ।
•शुकदेव कहै रणजीत सुन, और कहूं उपदेश ॥
अष्टपदी छन्द ॥
चौरासीही जानि जुआसन योगके ।
सिद्ध पदम तिनमाहिं बड़ेही थोकके ॥
बहुनारिनके मांहिं जु नौनारीभनी ।
तिन मैं सुषमन जानबड़ी गुरुसूं सुनी ॥
तीनि बंधके माहि मूलकूं जानिये ।
मुद्रौही में बड़ी खेचरी मानिये ॥
वायुनमें परधान प्राणकं देखिये ।
सबकुंभकहूं माहिं केवलबड़ि लेखिये ॥
बानी चारौ मध्य पराही गाइये ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६६
चार अवस्थामाहिं तुर्या वड़िपाइये ॥
परम शून्यको ध्यान परेसून्हे परै ।
याकीसम कोइ नाहिं ध्यान तिनको धरै ॥
अजपाहीके जाप बराबर औरना ।
शीलदयासे मीत न कोई देहमा ॥
पूजन मैं बड़ि जान जुआतमकी करै ।
ज्ञानसमान न दान सकल विपता हरै ॥
गुरुसा रक्षक और नहीं कोइ लोकमें ।
योग युक्तिसा स्वाद नहीं कोइ भोकमें ॥
कह शुकदेव सुनौ रणजीतही ।
वड़ी वड़ी जोगांसे खोल तुमकूं जुदी ॥
छन्द ॥
अमरी करतै बजरी रोंकै बजरी करतैं बाई ।
रोंकै छींक साधना करिकै नासालेहु जँभाई ॥
जल संयमसूं नभकूं देखै संयम नादसुं ज्योती ।
संयम पवन होय थिरकाया सो वश राखै मोती ॥
जिया विछावै मृत्यकबौदै बूढ़ी होय न काया ।
संयम नींद विंदनहि जावै यह शुकदेव बताया ॥
दहिने स्वरमें भोजन कीजै बायें स्वरमें पानी ।
दहिने स्वरमें अमरी रेचै देह न होय पुरानी ॥
दहिने स्वरमें जलसूं न्हावै बायें स्वरमें लङ्की ।
शिव आसनसूं सोवन कीजै नारिन कीजै सङ्की ॥
पावकसूं तापन नहिं कीजै जो तापै तौ नैना ।
भोजन गरम न खट्टा खावै फटै झिरै नहिं मैना ॥
॥ ... ॥

१०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० गरमीही के रोग में, चन्द चला रवि बन्द ।
शीत रोग सूरज चला, शशि पर राखै बन्द ॥
तीन रोज कै पांच दिन, कै दिन राखै सात ।
रोग देखि जैसी करै, होय निरोगा गात ॥
सूरज रात चलाइये, द्योस चलावै चन्द ।
पवन फिरै ऊषा बधै, श्वास चलै जो मन्द ॥
कान आंख अरु दांतके, सबही रोग भजाहिं ।
श्याम वालनहिं श्वेतहों, करै 'जुनीकी दाहिं ॥
रुई पुरानी बहुतही, दिनकूं दहिने राखि ।
बायें राखै रैनिकूं, खोली साधन भाखि ॥
शीत उष्ण व्यापै नहीं, विष नहिं व्यापक होय ।
बीसबरस साधन किये, रहै विकार न कोय ॥
बासी भ्रष्ट न खाइये, सूक्ष्म करै अहार ।
जल बहुत पीवै नहीं, सपरस करै न नार ॥
तन मन साधै बचन ही, पाप न लगने देह ।
शुकदेवकहैचरणदाससुनि, अधकी साधन येह ॥
सब जीवन सुख दीजिये, सब सों मीठा बोल ।
आतम पूजा कीजिये, पूजा यही अतोल ॥
दया पुष्प चन्दन नंवन, धूप दीप दे मन्न ।
भाँति भाँति नैवेद्य सूं, करै देव परसन्न ॥
जो कोइ आवै राजसी, देहु बड़ाई ताहि ।
जाकूं देखो तामसी, करो नम्रता बाहि ॥
जो कोइ होवै सात्त्विकी, मिलै ताहि तजिमान ।
गुढ़ी खोल चर्चाकरो, लीजै ततमत छान ॥
ओरन कूं परसन करै, आपहु रहौ परसन्न ।