भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टाङ्गयोगवर्णन । ६५
गगन चढ़न की आश हो, कहैं शुकदेव सुनाय ॥
गुदाद्वार बंध दीजिये, ऐंड़ी पांव लगाय् ।
आसन सिद्धजुकीजिये, मन पवनावश लाय ।
अपान वायु जब वशभवै, ऊरध खैंच चलाय ।
सनई सनई जाचढ़ै, प्राण वायु ह्वैजाय ॥
अथ चाँंचरीमुद्रा ॥
तीजी मुद्रा चाँवरी, जाको नैनन वास ।
नासा आगे दृष्टिकूं, राखै मन धर आस ॥
अंगुल चार नासिका आगे । चित अस्थिरकरि देखन लागे ॥
खुले पांच तत करै जु कोई । मन अरु पवन जहां थिर होई ॥
फिर ढांसू नासा परि आवै । अचल टकटकी तहां लगावै ॥
जहँ बहुतक अचरज दरसावै । विभव स्वर्ग के आगे आवै ॥
जितसू पलट तिरकुटी माहीं । ध्यान करै कहुँ अन्त न जाहीं ॥
दीरघ तारासा परकासै । उदय होय सूरज ज्यों भासै ॥
चित चेतन दोउ मेला करै । लै उपजै अरु दुबिधा हरै ॥
यही चाचरी मुद्रा जानै । चरणदास याकूं पहिंचानै ॥
अथ अगोचरीमुद्रा ॥
कहूँ अगोचरि चौथि मुद्रा । तामें सुख पावै योगींद्रा ॥
यामुद्राका सँरवन बासा । शुकदेव कहैं सुन चरणहि दासा ॥
दो० ज्ञान सुरति दोउ एक है, पलट अगोचर जाय ।
शब्द अनाहद मैरतै, मन इन्द्री थिरपाय ॥
अथ उनमनीमुद्रा ॥
पाँचवीं मुद्रा उनमनी, दशवें द्वारे, वास ।
सिद्धसमाधि मिलै जहां, दग्धहोय सब आस ॥