भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
राज्य की उत्पत्ति :
...पुराने ज़माने में क़बीलों के बीच होने वाले युद्धों द्वारा भ्रष्ट होते हुए नया रूप
धारण – जीविकोपार्जन के साधन के रूप में ढोर, दास और धन–दौलत लूटने के
लिए ज़मीन और पानी के रास्ते से बाक़ायदा धावे; संक्षेप में, धन–दौलत को दुनिया
में सबसे बड़ी चीज़ समझा जाने लगा, उसे प्रशंसा और आदर की दृष्टि से देखा
जाने लगा और पुराने गोत्र–समाज की संस्थाओं और प्रथाओं को भ्रष्ट किया जाने
लगा ताकि धन–दौलत को ज़बरदस्ती लूटना उचित ठहराया जा सके। अब केवल
एक चीज़ दरकार थी : ऐसी संस्था की, जो न केवल अलग–अलग व्यक्तियों की
नयी हासिल की हुई सम्पत्ति को गोत्र–व्यवस्था की पुरानी सामुदायिक परम्पराओं
से बचा सके, जो निजी स्वामित्व को, जिसकी पहले अधिक प्रतिष्ठा नहीं थी, न
केवल पवित्र क़रार दे और इस पवित्रता को मानवसमाज का चरम लक्ष्य घोषित
कर दे, बल्कि जो सम्पत्ति प्राप्त करने, और इसलिए धन–दौलत को लगातार बढ़ाते
रहने के नये और विकसित होते हुए तरीक़ों पर सार्वजनिक मान्यता की मुहर भी
लगा दे; ऐसी संस्था की, जो न केवल समाज के नवजात वर्ग–विभाजन को, बल्कि
सम्पत्तिवान वर्ग द्वारा सम्पत्तिहीन वर्ग के शोषण किये जाने के अधिकार को और
सम्पत्तिहीन वर्ग पर सम्पत्तिवान वर्ग के शासन को भी स्थायी बना दे।
और यह संस्था भी आ पहुँची। राज्य का आविष्कार हुआ।
(पृष्ठ 129–130)¹
───o───
एक अच्छी सरकार की परिभाषा : “अच्छी सरकार स्व–शासन का विकल्प
कभी नहीं हो सकती।”
“हेनरी कैम्पबेल बैनरमैन ”²
───o───
“हमें यक़ीन है कि सरकार का केवल एक ही रूप है, चाहे इसे जिस नाम
से भी पुकारा जाये, जिसमें अन्तिम नियन्त्रण जनता के हाथों में होता है।”
“अर्ल ऑफ़ बालफोर ”³
───o───
- एंगेल्स; परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति
- सर हेनरी कैम्पबेल–बैनरमैन (1836–1908) : ब्रिटिश उदारवादी राजनेता, 1905–08
तक प्रधानमन्त्री रहे। - सम्भवतः आर्थर जेम्स (1848–1930) : प्रथम अर्ल ऑफ़ बालफोर, ब्रिटिश राजनयिक
एवं प्रधानमन्त्री (1902–1905)
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 565
धर्म : “धर्म के प्रति मेरा अपना दृष्टिकोण वही है जो ल्यूक्रेटियस
का है। मैं इसे भय से पैदा हुई एक बीमारी के रूप में, और मानवजाति के लिए
एक अकथनीय दुख के रूप में मानता हूँ। लेकिन, मैं इससे इन्कार नहीं कर सकता
कि इसने सभ्यता में कुछ योगदान भी किया है। इसने आरम्भिक काल में
पंचांग-निर्धारण में मदद की, और इसी के चलते मिस्र के पुरोहितों ने ग्रहणों का
लेखा-जोखा इतनी सावधानी के साथ रखा कि बाद में वे इनके बारे में भविष्यवाणी
कर सकने में समर्थ हो गये। इन दो सेवाओं को तो मैं मानने के लिए तैयार हूँ,
लेकिन और किसी के बारे में मैं नहीं जानता।
-बर्ट्रेण्ड रसेल¹
पृष्ठ 13 (10)
परोपकारी निरंकुशता : मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड² ने ब्रिटिश सरकार को एक
'परोपकारी निरंकुशता' कहा है और, ब्रिटिश लेबर पार्टी के साम्राज्यवादी नेता, रैम्जे
मैक्डोनाल्ड³ के अनुसार “एक 'परोपकारी निरंकुशता' द्वारा किसी देश पर शासन
करने के सभी प्रयासों में, शासितों को कुचल डाला जाता है। वे व्यवहारशील
नागरिक नहीं, आज्ञाकारी प्रजा बन जाते हैं। उनका साहित्य, उनकी कला, उनकी
आत्मिक अभिव्यक्ति मर जाती है।”
भारत के प्रभारी विदेशमन्त्री, आनरेबल एस. मॉन्टेग्यू ने
भारत सरकार : हाउस ऑफ़ कामंस में 1917 में कहा “भारत सरकार,
आधुनिक उद्देश्यों के लिए किसी भी काम लायक होने की
दृष्टि से बेहद जड़, बेहद निर्मम, बेहद आदिम, और बेहद दकियानूस है। भारत
सरकार असमर्थनीय है।”
- महान गणितज्ञ और दार्शनिक बर्ट्रेण्ड आर्थर विलियम रसेल (1872-1972)
- भारत में संवैधानिक सुधारों के सम्बन्ध में मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड रिपोर्ट (1918) जिसके
आधार पर भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत दोहरा शासन लागू हुआ। एडविन सैमुअल
मॉन्टेग्यू (1877-1924) 1917 से 1922 तक भारत के मामलों का प्रभारी ब्रिटिश विदेशमन्त्री
और लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड 1916 से 1920 तक भारत का वायसराय रहा। - जेम्स रैम्जे मैक्डोनाल्ड (1866-1937) : ब्रिटिश राजनयिक और ब्रिटिश लेबर पार्टी का
संस्थापक सदस्य। 1923-24 में तथा 1929-35 में ब्रिटेन का प्रधानमन्त्री रहा।
566 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
भारत में डॉ. रथफ़ोर्ड¹ के शब्द : “भारत में ब्रिटिश शासन जैसे
ब्रिटिश शासन : चलाया जा रहा है वह दुनिया में सरकार की सबसे निकृष्ट
और सबसे अनैतिक प्रणाली – एक राष्ट्र द्वारा दूसरे का शोषण – है।”
— ⚬ —
आज़ादी और “अंग्रेज़ लोग आज़ादी को स्वयं अपनी ख़ातिर ही प्यार
अंग्रेज़ लोग करते हैं। वे अन्याय की सभी कार्रवाइयों से घृणा करते हैं,
सिवाय उनके जो वे स्वयं करते हैं। वे ऐसे आज़ादी-प्रेमी लोग
हैं कि कांगो में दख़लअन्दाज़ी करते हैं, और बेल्जियनों पर “शर्म-शर्म” चिल्लाते
हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि उनकी एड़ियाँ भारत की गर्दन पर हैं।”
— एक आयरिश लेखक²
पृष्ठ 14 (11)
भीड़ का प्रतिशोध
...“अब आइये हम देखें कि कैसे लोग इस ढंग से सज़ा देने के विचार के
कायल हुए।
“वे इसे उन्हीं सरकारों से सीखते हैं जिनके अन्तर्गत वे जी रहे होते हैं, और
बदले में वही सज़ा देते हैं जिसको भोगने के वे आदी हो चुके होते हैं। सूली पर
टँगे सिर, जो वर्षों तक टेम्पल बार के ऊपर लगे रहे, पेरिस में सूली पर टाँगे जाने
वाले सिरों के दृश्य की भयावहता से तनिक भी भिन्न नहीं थे; फिर भी अंग्रेज़
सरकार ने यही किया। शायद कहा जा सकता है कि इससे आदमी को कोई ख़ास
फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मरने के बाद उसके साथ क्या किया जाता है; लेकिन जीवितों
को इससे काफ़ी फ़र्क़ पड़ता है, इससे या तो उनकी भावनाएँ विदीर्ण हो जाती हैं
या उनके दिल पत्थर हो जाते हैं, और दोनों ही सूरतों में, यह उन्हें शिक्षित करता
है कि जब सत्ता उनके हाथ में आये तो वे कैसे सज़ा दें।
“तब कुल्हाड़ी से जड़ पर ही प्रहार करो, और सरकारों को मानवता सिखा
दो। ये उनकी खूँखार सज़ाएँ ही हैं जो मानवजाति को भ्रष्ट करती हैं...। जनसामान्य
के सामने प्रदर्शित इन क्रूर दृश्यों का प्रभाव संवेदनशीलता को ख़त्म करने या
प्रतिशोध भड़काने के रूप में सामने आता है, तथा विवेक के बजाय आतंक के
- डॉ. वी.एच. रदरफ़ोर्ड की पुस्तक मॉडर्न इण्डिया : इट्स प्रोब्लम्स एण्ड देयर सोल्यूशंस,
लन्दन, 1927 से - सम्भवतः उपरोक्त पुस्तक में उद्धृत
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 567
| द्वारा लोगों पर शासन करने की इसी निकृष्ट और झूठी धारणा के जरिये वे मिसाल
बनते हैं।”
(राइट्स ऑफ़ मैन, (पृष्ठ 32), टी. पेन)¹
पृष्ठ 15 (12)
राजा और राष्ट्र ने लुई चौदहवें के विरुद्ध नहीं, बल्कि सरकार के
राजतन्त्र : निरंकुश सिद्धान्तों के विरुद्ध विद्रोह किया। ये सिद्धान्त
मूलतः उससे नहीं, बल्कि कई सदी पहले स्थापित आरम्भिक
व्यवस्था से पैदा हुए थे, और इतनी गहराई में जड़ जमा चुके थे कि ख़त्म नहीं
किये जा सके थे, तथा परजीवियों एवं लुटेरों का गन्दगी से भरा हुआ अस्तबल भी
इतने घृणास्पद रूप से गन्दा था कि एक सम्पूर्ण क्रान्ति ही उसे साफ़ कर सकती
थी। जब कोई काम करना ज़रूरी हो जाता है, तो उसे दत्त-चित्त होकर करना
चाहिए, या उसे करने की कोशिश ही नहीं करनी चाहिए...। राजा और राजतन्त्र दो
अलग-अलग भिन्न चीजें थीं; और पूर्वोक्त (यानी राजा – स.) या उसके सिद्धान्तों
के ही विरोध में यह विद्रोह हुआ और क्रान्ति की गयी।
– (पृष्ठ 19)²
प्राकृतिक और मनुष्य ने समाज में प्रवेश इसलिए नहीं किया कि वह
पहले से भी बदतर हो जाये, बल्कि इसलिए कि उसके
नागरिक अधिकार : अधिकार पहले से बेहतर ढंग से सुरक्षित हों। उसके
प्राकृतिक अधिकार ही उसके सभी नागरिक अधिकारों की आधारशिला हैं।
प्राकृतिक अधिकार वे हैं जो मनुष्य के जीने के अधिकार से सम्बन्धित हैं
(बौद्धिक-मानसिक आदि)।
नागरिक अधिकार वे हैं जो मनुष्य के समाज का एक सदस्य होने से सम्बन्धित
हैं। – (पृष्ठ 44)³
- टॉमस पेन की कृति, द राइट्स ऑफ़ मैन; अंग्रेज़ लेखक और प्रचारक टॉमस पेन
(1737-1809) अमेरिकी स्वतन्त्रता-संग्राम और फ्रांसीसी क्रान्ति में अपनी अविस्मरणीय
भूमिका के लिए सारी दुनिया में विख्यात है; उसका परचा कामन सेंस तथा यह कृति राइट्स
ऑफ़ मैन, इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। अमेरिकी स्वतन्त्रता-संग्राम के दौरान लिखा गया
राइट्स ऑफ़ मैन अमेरिकी संविधान का मुख्य आधार बना। - द राइट्स ऑफ़ मैन से
- वही
568 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पृष्ठ 16 (13)
राजा की एक व्यक्ति के भरण-पोषण के लिए, किसी देश के
तनख़्वाह : सार्वजनिक टैक्सों में से, दस लाख स्टर्लिंग सालाना देने
की बात करना अमानवीय है, जबकि हज़ारों लोग जो इसमें
योगदान करने के लिए मजबूर किये जाते हैं, अभाव से त्रस्त और बदहाली से जूझ
रहे हैं। सरकार जेलों और राजमहलों के बीच, या कंगाली और शान-शौक़त
के बीच किसी समझौते के रूप में नहीं होती; यह इसलिए नहीं गठित की जाती
कि ज़रूरतमन्द से उसकी दमड़ी भी लूट ली जाये और ख़स्ताहालों की दुर्दशा और
बढ़ा दी जाये।
— (पृष्ठ 204)¹
“मुझे आज़ादी दो या मौत”
“...मामले को हलका बनाना बेकार है, महाशय। शरीफ लोग शान्ति, शान्ति
चिल्ला सकते हैं – लेकिन कोई शान्ति नहीं है। युद्ध तो वास्तव में शुरू ही हो
चुका है। अब अगला झंझावात जो उत्तर से उठकर...हमारे कानों तक पहुँच रहा है,
गुंजायमान हथियारों की टकराहटों का है। हमारे बन्धु-बान्धव तो पहले ही से लड़ाई
के मैदान में हैं। हम यहाँ बेकार क्यों खड़े हैं? आख़िर शरीफ लोग चाहते क्या हैं?
वे क्या करेंगे? क्या जीवन इतना प्यारा या शान्ति इतनी मीठी है कि उसे बेड़ियों
और गुलामी की क़ीमत पर भी ख़रीद लिया जाये?
रोको इसे, हे सर्वशक्तिमान ईश्वर। मैं नहीं जानता कि और लोग कौन-सा रास्ता
अख़्तियार करेंगे। लेकिन जहाँ तक मेरी बात है, मुझे “आज़ादी” दो या “मौत”।
— पैट्रिक हेनरी²
मज़दूर का अधिकार :
‘जो कोई भी कठिन श्रम से कोई चीज़ पैदा करता है उसे यह बताने के लिए
किसी खुदाई पैग़ाम की ज़रूरत नहीं कि पैदा की गयी चीज़ पर उसी का अधिकार
है।”
— राबर्ट जी. इंगरसोल³
- वही
- पैट्रिक हेनरी (1736-1790) : अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम के नेताओं में से एक, प्रखर
वक्ता और सांसद - रॉबर्ट जी. इंगरसोल (1832-1899) : अमेरिकी वकील, वक्ता और लेखक
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 569
पृष्ठ 17 (14)
“लोगों के सिर कलम कर दिये जाने को तो हम भयंकर मानते हैं, पर हमें
जीवन-पर्यन्त बरक़रार रहने वाली मृत्यु की उस भयंकरता को देखना नहीं सिखाया
गया है जो ग़रीबी और अत्याचार द्वारा व्यापक आबादी पर थोप दी गयी है।”
– मार्क ट्वेन¹
अराजकतावादी : “...साहित्य के चयन में अराजकतावादियों और विद्रोह
भड़काने वालों को भी स्थान मिल जाता है; और यदि उसकी
कुछ चीजें पाठक को महज आक्रोश का उद्गार ही लगें, तो भी मैं कहना चाहूँगा
कि इसके लिए साहित्य के समर्पित चयनकर्ता को दोष नहीं देना चाहिए, यहाँ तक
कि रचनाकार को भी दोष नहीं देना चाहिए – उसे (यानी पाठक को – स.) को
स्वयं अपनेआप को ही दोष देना चाहिए, कि उसने उन परिस्थितियों की मौजूदगी
में चुप्पी साध ली है, जिनके चलते उसके देश-समाज के लोग पागलपन और
निराशा की चरम सीमा पर जा पहुँचे हैं।”
– अप्टन सिंक्लेयर², भूमिका, 19, क्राइ फ़ॉर जस्टिस
बूढ़ा मज़दूर : “...वह (बेरोज़गार बूढ़ा मज़दूर) उम्र से, प्रकृति से, और
परिस्थितियों से जूझ रहा था; समाज, क़ानून और व्यवस्था का
सारा बोझ उसके ऊपर भारी पड़ता हुआ, उसे अपना आत्मसम्मान और आज़ादी खो
देने पर मजबूर कर रहा था...। उसने फार्मों के दरवाज़े खटखटाये और वह सिर्फ़
मनुष्य में ही अच्छाई पा सका – क़ानून और व्यवस्था में नहीं, बल्कि सिर्फ़ मनुष्य
में ही।”
– रिचर्ड जेफ़रीज़ (80)³
पृष्ठ 18 (15)
ग़रीब मज़दूर : “...और हम लोग, जिन्होंने इस काम को अंजाम देने का
बीड़ा उठाया, इस दुनिया में कुजात ही रहे। एक अन्धी
क़िस्मत, एक विराट निर्मम तन्त्र ने काट-छाँटकर हमारे अस्तित्व का ढांचा निर्धारित
- असली नाम सैमुअल लैंगहॉर्न क्लीमेंस (1835-1910) : मशहूर अमेरिकी उपन्यासकार
और व्यंग्यकार - मशहूर अमेरिकी उपन्यासकार और समाजवादी-सुधारक (1878-1968)। क्राइ फ़ॉर
जस्टिस सामाजिक प्रतिरोध के साहित्य का एक अनूठा संकलन है जो सिंक्लेयर के सम्पादन
में 1915 में प्रकाशित हुआ था। आगे कई पृष्ठों तक के नोट्स इसी पुस्तक से लिये गये हैं। - अंग्रेज़ प्रकृतिवादी और उपन्यासकार (1848-1887)
570 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
कर दिया। हम उस वक़्त तिरस्कृत हुए, जब हम सबसे अधिक उपयोगी थे, हमें
उस वक़्त दुत्कार दिया गया, जब हमारी ज़रूरत नहीं थी, और हमें उस वक़्त भुला
दिया गया, जब हमारे ऊपर विपत्तियों का पहाड़ टूटा हुआ था। हमें बीहड़-बंजर
साफ़ करने के लिए, उसकी सारी आदिम भयंकरताओं को दूर करने के लिए, तथा
उसके विश्व-पुरातन अवरोधों को छिन्न-भिन्न कर डालने के लिए भेज दिया
जाता। हम जहाँ भी काम करते, वहाँ एक दिन एक नया शहर जन्म ले लेता; और
जब यह जन्म ले ही रहा होता, तब यदि हममें से कोई वहाँ चला जाता, तो उसे
‘बिना निश्चित पते का आदमी’ कहकर पकड़ लिया जाता और सिरफिरा-आवारा
कहकर उस पर मुक़दमा चलाया जाता।”
– (पैट्रिक मैकगिल की कृति,
चिल्ड्रेन ऑफ़ द डेड एण्ड, सी.जे. 48 से)¹
नैतिकता : “नैतिकता और धर्म उस व्यक्ति के लिए महज शब्दभर
हैं जो आजीविका का जुगाड़ करने के लिए गन्दे नाले में मछली
मारता है, और जाड़े की रात में कड़ाके की शीतलहरी से बचने के लिए सड़कों
पर पीपों के पीछे पनाह लेता है।”
– होरेस ग्रीले (128)²
भूख : “शासक के लिए उचित यही है कि उसके शासन में कोई भी आदमी
ठण्ड और भूख से पीड़ित न रहे। आदमी के पास जब जीने के मामूली
साधन भी नहीं रहते, तो वह अपने नैतिक स्तर को बनाये नहीं रख सकता।”
– कोंको होशी
(जापान का बौद्ध भिक्षु, 14वीं सदी, पृष्ठ 135)
पृष्ठ 19 (16)
मुक्ति
अरे मनुष्यो! करते हो गर्वोक्ति
कि तुम सन्तति हो मुक्त और वीर पितरों की,
पर यदि लेता साँस एक भी दास धरा पर,
तो क्या सचमुच तुम हो मुक्त और वीर?
- पैट्रिक मैकगिल (1889-1963) : आइरिश पत्रकार, कवि और उपन्यासकार। (सी.जे.
– क्राइ फ़ॉर जस्टिस का संक्षिप्त) - अमेरिकी पत्रकार और राजनीतिज्ञ (1811-1872)
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 571
यदि तुमको अहसास नहीं जब
बेड़ी पीड़ा देती एक भाई को,
तो क्या सचमुच तुम नहीं अधम दास
जो क़ाबिल नहीं मुक्त होने के?
क्या है वह सच्ची मुक्ति, जो तोड़े
ज़ंजीरें बस अपनी ख़ातिर,
और भुला दे संगदिल होकर
कि मानवता का क़र्ज़ है हम पर?
नहीं, सच्ची मुक्ति तभी जब हम बाँटें
सब ज़ंजीरें, जो पहने हैं अपने भाई,
और भाव औ' कर्म से लगकर
हाँ औरों की मुक्ति में तत्पर!
दास तो वे जो भय खाते हैं स्वर देने में
गिरे हुए और दुर्बल की ख़ातिर;
दास तो वे जो नहीं चुनेंगे
घृणा, डाँट और गाली
और दुबककर मुँह मोड़ेंगे
सच से, इस पर सोच ज़रूरी;
दास तो वे जो हिम्मत न करें
दो या तीन भी हों गर सच के हक़ में।
– “जेम्स रसेल लॉवेल” (पृष्ठ 189)¹
पृष्ठ 20 (17)
भरे पड़े हैं शुभ्र और निर्मल आभा के रत्न घनेरे
सागर के गहन अगाध गह्वर में,
खिलते हैं बहुतेरे फूल अनदेखे लज्जारुण होते,
और लुटा देते अपनी सुगन्ध निर्जन बयार में।²
—o—
आविष्कार : अब तक यह सवाल क़ायम है कि क्या अब तक किये
गये सारे के सारे आविष्कार किसी भी आदमी की रोज़मर्रा की
कड़ी मशक़्क़त भरी ज़िन्दगी को आसान बना पाये हैं।
– जे.एस. मिल³, 199
- अमेरिकी कवि, निबन्धकार और सम्पादक (1819–91)
- अंग्रेज़ कवि टॉमस ग्रे (1716–7) की रचना एलिजी रिटेन इन एक कण्ट्री चर्चयार्ड से
- जॉन स्टुअर्ट मिल, अंग्रेज़ निबन्धकार और उदारवादी दार्शनिक (1808–73)
572 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
भीख : “धरती पर उस आदमी से अधिक घृणास्पद और
अरुचिकर और कोई नहीं है जो भीख देता है। और, वैसे ही उस
आदमी से अधिक दयनीय और कोई नहीं है जो उसे स्वीकार करता है।
मक्सिम गोर्की¹, पृष्ठ 204
स्वतन्त्रता
वे मृत शरीर नवयुवकों के,
वे शहीद जो झूल गये फाँसी के फन्दे से –
वे दिल जो छलनी हो गये भूरे सीसे से,
सर्द और निष्पन्द जो वे लगते हैं, जीवित हैं और कहीं
अबाधित ओज के साथ।
वे जीवित हैं अन्य युवा-जन में, ओ राजाओ।
वे जीवित हैं अन्य बन्धु-जन में, फिर से तुम्हें चुनौती देने को तैयार।
वे पवित्र हो गये मृत्यु से –
शिक्षित और समुन्नत।
पृष्ठ 21 (18)
दफ़न न होते आज़ादी पर मरने वाले
पैदा करते हैं मुक्ति-बीज, फिर और बीज पैदा करने को।
जिसे ले जाती दूर हवा और फिर बोती है और जिसे
पोषित करते हैं वर्षा जल और हिम।
देहमुक्त जो हुई आत्मा उसे न कर सकते विच्छिन्न
अस्त्र-शस्त्र अत्याचारी के
बल्कि हो अजेय रमती धरती पर, मरमर करती,
बतियाती, चौकस करती।
(वाल्ट हिटमैन², पृष्ठ 268)
मुक्त चिन्तन : “यदि कोई ऐसी चीज़ हो जो मुक्त चिन्तन को बरदाश्त न
कर सके, तो वह भाड़ में जाये।”
– विण्डेल फिलिप³, पृष्ठ 271
- मक्सिम गोर्की (1868-1936) : प्रसिद्ध रूसी सर्वहारा क्रान्तिकारी लेखक
- वाल्ट व्हिटमैन (1819-92): प्रसिद्ध अमेरिकी कवि; उनकी विख्यात कविता लीव्ज़
ऑफ़ ग्रास से - विण्डेल फिलिप्स (1811-1884) : अमेरिकी वक्ता, सुधारक, और दासता विरोधी
आन्दोलन के सक्रिय कार्यकर्ता
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 573
राज्य : “राज्य दफ़ा हो जाये! मैं ऐसी क्रान्ति में भाग लूँगा। राज्य की समूची
अवधारणा का मूलोच्छेदन कर दो, मुक्त चयन और आत्मिक बन्धुता को
ही किसी एकता की एकमात्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शर्तें होने की घोषणा करो, और
तभी तुम एक ऐसी आज़ादी की शुरुआत करोगे जिसकी कोई सार्थकता होगी।”
– हेनरिक इब्सन¹, पृष्ठ 273
———o———
उत्पीड़न : “उत्पीड़न निश्चय ही एक समझदार आदमी को पागल बना देता है।”
– *(पृष्ठ 278)*²
———o———
<u>पृष्ठ 22 (19)</u>
शहीद : जो आदमी अपने साथी मनुष्यों द्वारा किये जाने वाले अत्याचार का विरोध
करने के प्रयास में, अपनी जान पर खेलते हुए, अपनी सारी ज़िन्दगी
निछावर कर देता है, वह अत्याचार और अन्याय के सक्रिय और निष्क्रिय समर्थकों
की तुलना में एक सन्त है, भले ही उसके विरोध से उसकी अपनी ज़िन्दगी के
साथ-साथ अन्य ज़िन्दगियाँ भी क्यों न नष्ट हो जाती हों। ऐसे व्यक्ति पर पहला
पत्थर वही मारने का हक़दार हो सकता है जिसने कभी कोई पाप न किया हो।
(पृष्ठ 287)³
———o———
जब तक कोई निचला वर्ग है, मैं उसमें ही हूँ।
निचला वर्ग : जब तक कोई अपराधी तत्त्व है, मैं उसमें ही हूँ।
जब तक कोई जेल में क़ैद है, मैं आज़ाद नहीं हूँ।
– यूजीन बी. डेब्स ⁴(144)
———o———
सबके विरुद्ध एक *(चार्ल्स फ़ूरिए : 1772-1837)*⁵
वर्तमान सामाजिक व्यवस्था एक हास्यास्पद तन्त्र है, जिसमें सम्पूर्ण के अंश, इस
- हेनरिक इब्सन (1828-1906) : नार्वे के प्रसिद्ध नाटककार, आधुनिक गद्य नाटक की शुरुआत करने वाले माने जाते हैं।
- एक्लेज़िआस्तिज़ (हिब्रू बाइबिल का एक हिस्सा) अध्याय 7, पद 7
- अमेरिकी अराजकतावादी एमा गोल्डमान (1869-1940) के एक निबन्ध से
- यूजीन बी. डेब्स (1855-1926) : अमेरिकी समाजवादी नेता, 1918 में प्रथम विश्वयुद्ध विरोधी एक भाषण के कारण हुई दस वर्ष क़ैद की सज़ा सुनाये जाते वक़्त अदालत में बयान
- फ्राँस्वा मेरी चार्ल्स फ़ूरिये (1772-1837) : फ्रांसीसी समाजवादी लेखक; उद्धरण का स्रोत अज्ञात
574 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सम्पूर्ण के विरुद्ध एक टकराव में सक्रिय हैं। हम देखते हैं कि समाज का प्रत्येक वर्ग,
सार्वजनिक हित के स्थान पर हर तरह से, अपने निजी हित को आगे रखते हुए, दूसरे
वर्गों के दुर्भाग्य की क़ीमत पर, अपने हित की कामना करता है। वकील, ख़ासतौर
से धनिकों के बीच, मुक़दमेबाज़ी और मुक़दमों की कामना करता है; डॉक्टर बीमारी
की कामना करता है। (यदि हर कोई बिना बीमारी के मरने लगे तो ये (डॉक्टर) वैसे
ही बरबाद हो जायेंगे, जैसे यदि सारे झगड़े बातचीत से हल होने लगें तो (वकील)
हो जायेंगे। सैनिक लड़ाई चाहता है, ताकि उसके आधे साथी मर जायें और उसकी
तरक़्क़ी सुनिश्चित हो जाये; अन्त्येष्टि कराने वाला कफ़न-दफ़्न की कामना करता
है; इज़ारेदार और जमाखोर, अनाज की क़ीमत दुगुनी या तिगुनी करने के लिए, अकाल
चाहते हैं, वास्तुकार, बढ़ई, राजगीर आगजनी चाहते हैं, ताकि सैकड़ों घर जलकर भस्म
हो जायें और उनकी अपनी-अपनी शाखाओं का कारोबार चलता रहे।
– (पृष्ठ 202)
पृष्ठ 23 (20)
नया सिद्धान्त : समाज हत्या, व्यभिचार या ठगी को नज़रअन्दाज़ कर सकता है;
पर वह एक नये सिद्धान्त के प्रचार को कभी माफ़ नहीं करता।
– फ़्रेडरिक हैरिसन¹ (पृष्ठ 327)
——————o——————
आज़ादी आज़ादी के बिरवे का समय-समय पर देशभक्तों और
का बिरवा : अत्याचारियों के ख़ून से सींचा जाना आवश्यक है। यही इसकी
कुदरती खाद है। – थॉमस जेफ़रसन² (पृष्ठ 332)
——————o——————
शिकागो के शहीद :
अब कोई भले ही यह कहे कि उसने भारी ग़लती की, परन्तु यदि उनकी
ग़लती दस गुना भी अधिक बड़ी होती, तो भी इसे उसकी कुर्बानी मानव-स्मृति
पटल से पोंछ ही डालेगी...
चलिए हम यह पूरी तरह मान लेते हैं कि उन्होंने अपनी नज़र में विरोध का
जो सबसे अच्छा तरीक़ा अपनाया, उसकी धारणा पूरी तरह ग़लत और असम्भव थी,
मान लिया कि उन्होंने कार्रवाई का सबसे अच्छा रास्ता नहीं अपनाया। लेकिन वह
क्या चीज़ थी जिसने उन्हें अपनी मौजूदा सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध धावा बोलने
- फ़्रेडरिक हैरिसन (1831-1923) : प्रसिद्ध विधिवेत्ता; इतिहास, राजनीति और साहित्य
पर कई पुस्तकों के लेखक - थॉमस जेफरसन (1743-1826): अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति, अमेरिकी स्वतन्त्रता
संग्राम के अग्रणी नेता और संविधान निर्माताओं में प्रमुख
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 575
के लिए उकसाया? वे और हज़ारों लोग जो उनके साथ उठ खड़े हुए, बुरे आदमी
नहीं थे, भ्रष्ट नहीं थे, ख़ून के प्यासे नहीं थे, संगदिल नहीं थे, अपराधी नहीं थे,
और न ही स्वार्थी या पागल थे। तब वह क्या चीज़ थी जिसने इतने तीखे और गहरे
प्रतिवाद को उकसावा दिया...?
किसी ने भी इस सरल-सीधी बात पर गौर नहीं किया कि मनुष्य अपनेआप
को किसी विरोध के लिए बिना इस विश्वास के एकजुट नहीं करते कि कोई न
कोई चीज़ ऐसी है जिसका उन्हें विरोध करना है और कि किसी भी संगठित समाज
में व्यापक विरोध एक ऐसी चीज़ है जो गहरी छानबीन की दरकार रखती है।
– चार्ल्स एडवर्ड रसेल¹ (333)
<u>पृष्ठ 24 (21)</u>
क्रान्तिकारी की वसीयत
“मैं अपने दोस्तों से यह भी कहना चाहूँगा कि वे मेरे बारे में कम से कम चर्चा
करेंगे या बिल्कुल ही चर्चा नहीं करेंगे, क्योंकि जब आदमी की तारीफ़ होने लगती
है तो उसे इन्सान के बजाय देवप्रतिमा-सा बना दिया जाता है और यह मानवजाति
के भविष्य के लिए बहुत बुरी बात है...। सिर्फ़ कर्मों पर ही गौर करना चाहिए, उन्हीं
की तारीफ़ या निन्दा होनी चाहिए, चाहे वे किसी के द्वारा किये गये हों। अगर लोगों
को इनसे सार्वजनिक हित के लिए प्रेरणा मिलती दिखायी दे, तो वे इनकी तारीफ़
कर सकते हैं, लेकिन अगर ये सामान्य हित के लिए हानिकर लगें, तो वे इनकी
निन्दा भी कर सकते हैं, ताकि फिर इनकी पुनरावृत्ति न हो सके।
“मैं चाहूँगा कि किसी भी अवसर पर, मेरी क़ब्र के निकट या दूर, किसी भी
क़िस्म के राजनीतिक या धार्मिक प्रदर्शन न किये जायें, क्योंकि मैं समझता हूँ कि
मरे हुए के लिए ख़र्च किये जाने वाले समय का बेहतर इस्तेमाल उन लोगों की
जीवन-दशाओं को सुधारने में किया जा सकता है, जिनमें से बहुतों को इसकी
भारी आवश्यकता है।”
– फ़्रांसिस्को फेरेर² की वसीयत
स्पेनी शिक्षक (1859-1909), जिसे धर्म-पुरोहितों द्वारा बार्सिलोना दंगों के
बाद दुश्मनीवश एक षड्यन्त्र के तहत फाँसी दे दी गयी।
- चार्ल्स ई. रसेल (1860-1941) : मकरेकर्स नाम से प्रसिद्ध अमेरिकी लेखकों, पत्रकारों
के समूह के प्रमुख सदस्य थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं में पूँजीवादी व्यवस्था की बुराइयों का
भण्डाफोड़ किया। - पूरा नाम फ्रांसिस्को फेरेर गुआर्दिया (1859-1909) : स्पेनी शिक्षाशास्त्री, जो बाद में
समाजवादी बन गये; यद्यपि उन्होंने हिंसा का विरोध किया था, फिर भी उन पर मुक़दमा चलाया
गया, और फाँसी दे दी गयी, जिसे बाद में चलकर “अदालती हत्या” नाम दिया गया।
576 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
दान : “मेरे पीछे आओ”, ईसा मसीह ने धनी युवक को कहा।
लेकिन अपने व्यवसाय में लगे रहना और अपनी कुछ दौलत को
दान-कर्म में लगाना तुलनात्मक रूप से आसान था। परोपकार हरेक युग का चलन
रहा है। दान ग़रीबी के विद्रोही तेवर को नष्ट कर देता है। अतः परोपकारी धनी
आदमी अपने सरीखे दौलतमन्दों का ही हितैषी होता है, और उन्हीं की एहसानमन्दी
महसूस करता है; उसके लिए सभ्य समाज के सारे दरवाज़े खुले होते हैं। इसीलिए
उन्होंने (यानी ईसा मसीह ने – स.) भिक्षा-दान को सामाजिक काया के गहरे घावों
की मरहम-पट्टी के रूप में स्वीकार्यता देने से इन्कार कर दिया...। परोपकार को
न्याय के एक विकल्प के रूप में उन्होंने कतई तरजीह नहीं दी।
[पृष्ठ 25 (22) पर जारी]
दान दोहरा अभिशाप है – यह दाता को संगदिल और प्राप्तकर्ता को
नरमदिल बनाता है। यह ग़रीबों का शोषण से कहीं अधिक नुक़सान करता है,
क्योंकि यह उन्हें शोषित होने का इच्छुक बनाता है। यह दास भावना को जन्म
देता है, जो नैतिक आत्महत्या ही है। ईसा मसीह ने अथाह दौलत के लिए सिर्फ़
एक ही इजाज़त दी थी और वह यह थी कि उसे क्रान्तिकारी प्रचार के लिए
समर्पित कर दिया जाये, ताकि बाद में अथाह दौलत का जमा होना ही हमेशा के
लिए असम्भव हो जाये...।
– बक ह्वाइट, पादरी, जन्म 1870, यू.एस.ए. पृष्ठ(353)¹
मुक्ति-युद्ध
फ़ौजों की ताक़त एक दिखायी देने वाली चीज़ है
सुस्पष्ट, और देश काल में आबद्ध,
लेकिन कौन खोज सकता उस शक्ति की सीमाओं को
जिसे एक बहादुर जनता ही प्रकट कर सकती है
या चाहे तो, छिपा सकती है – मुक्ति-युद्ध में।
भड़क उठे न्यायसंगत प्रतिरोध का – कोई पाँव पीछा नहीं कर सकता,
कोई आँख नहीं देख सकती उस जानलेवा जगह को,
यह ताक़त चाहे तो उड़ान भरे पंख लगाकर
प्रचण्ड वायु की भाँति, या सोये मन्द वायु की भाँति
अपनी डरावनी गुफाओं में – साल दर साल
फैलाती मिट्टी से जन्मे इस विचार को – निकट और दूर,
- बक ह्वाइट (1874-1951) : अमेरिकी समाजवादी और लेखक
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 577
नहीं बाँध सकती कोई भी कला – इस सूक्ष्म ताक़त को
जो फूटती ज़मीन से जलधारा की भाँति,
और पा लेती हर कोने में एक होंठ
जो इसकी क़द्र करे।
– डब्ल्यू. वर्ड्सवर्थ $^1$
पृष्ठ 26 (23)
लाइट ब्रिगेड का धावा
आधा लीग आधा लीग,
आधा लीग और,
मौत की घाटी में
बढ़ चले छः सौ वीर।
‘बढ़े चलो लाइट ब्रिगेड!
भर लो बन्दूकें!’ वह बोला,
मौत की घाटी में
बढ़ चले छः सौ वीर।
‘बढ़े चलो लाइट ब्रिगेड!’
क्या कोई था घबराया?
नहीं, गोकि मालूम था सैनिकों को
किसी न कर दी थी भारी भूल,
उनका काम नहीं था उत्तर देना,
उनका काम नहीं था सवाल पूछना,
उन्हें था बस लड़ना और मर जाना
मौत की घाटी में
बढ़ चले छः सौ वीर।
तोपें उनके दायें बाजू,
तोपें उनके बायें बाजू,
तोपें उनके ठीक सामने,
दगतीं और गरजतीं,
गोलाबारी की आँधी में,
बढ़ चले निडर वे सीधे
- विलियम वर्ड्सवर्थ (1750-1850) : प्रसिद्ध अंग्रेज़ कवि, जो अपनी युवावस्था में रैडिकल और गणतन्त्र समर्थक रहे।
578 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
मौत के जबड़ों के भीतर,
नर्क के मुँह के भीतर,
बढ़ चले छः सौ वीर।
चमकाते सब नंगी तलवारें,
हवा में जब उनको लहराते
काटते जाते तोपचियों को,
हमला करते सेना पर, जबकि
सारी दुनिया चकराती,
<u>पृष्ठ 27 (24)</u>
पिल पड़े तोप के धुएँ में
बढ़ चले तोड़कर मोर्चा
कज़्ज़ाक और रूसी सिपाही
खाकर तलवार की चोटें
छिन्न-भिन्न हो जाते।
तोपें उनके दायें बाजू,
तोपें उनके बायें बाजू,
तोपें उनके पीछे से,
दगतीं और गरजतीं,
गोलाबारी की आँधी में,
भले गिरे अश्व और नायक
फिर भी वे इतना अच्छा जूझे
कि होकर मौत के जबड़ों से
लौटे वे नर्क के मुँह से,
जो भी थे बचे रह गये
छः सौ में से बचे रह गये।
कब हो सकता धूमिल उनका यश?
अरे वह उनकी विकट चढ़ाई!
सारी दुनिया चकराती।
आदर, उस हमले को
आदर, लाइट ब्रिगेड को!
श्रेष्ठ छः सौ वीरों को।
— लॉर्ड टेनीसन¹
- लॉर्ड अल्फ्रेड टेनीसन (1809-1897) : प्रसिद्ध अंग्रेज़ राष्ट्रवादी कवि
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 579
دل دے تو اِس مزاج کا پروردگار دے
جو غم کی گھڑی کو بھی خوشی سے گزار دے +
سجا کر میّتِ امید ناکامی کے پھولوں سے
کسی ہمدرد نے رکھ دی مِرے ٹوٹے ہوئے دل میں +
چھیڑ نہ اے فرشتے تو ذکرِ غمِ جاناں
کیوں یاد دلاتے ہو بھولا ہوا افسانہ +
नोट : पृष्ठ 27 (24) के अन्त में ये तीन शे'र उर्दू में लिखे हुए हैं। ये किस शायर के हैं,
यह स्पष्ट नहीं है। नीचे ये शे'र देवनागरी में प्रस्तुत हैं :
दिल दे तू इस मिज़ाज का परवरदिगार दे
जो ग़म की घड़ी को भी खुशी से गुज़ार दे।
सज़ा कर मय्यत-ए-उम्मीद नाकामी के फूलों से
किसी हमदर्द ने रख दी मेरे टूटे हुए दिल में।
छेड़ ना ऐ फ़रिश्ते! तू ज़िक्रे ग़मे-जानाँ।
क्यों याद दिलाते हो भूला हुआ अफ़साना।
580 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पृष्ठ 28 (25 )
जन्मसिद्ध अधिकार :
हम बेटे हैं उन पितरों के जिन्होंने मात दी थी
तख़्तो-ताज और पुरोहितों¹ के अत्याचार को;
उन्होंने दी थी चुनौती मैदाने-जंग में और फाँसी के तख़्ते से
अपने जन्मसिद्ध अधिकार के लिए – हम भी यही करेंगे!
(टी. कैम्पबेल)²
———o———
लक्ष्य की महिमा :
अरे! बेकार की नफ़रत के लिए नहीं,
न सम्मान के लिए, न ही अपनी शाबासी के लिए
बल्कि लक्ष्य की महिमा के लिए,
किया जो तुमने, भुलाया नहीं जायेगा।
(आर्थर क्लॉग)³
———o———
आत्मा की अमरता :
यदि तुम्हें कभी एक ऐसा आदमी मिल जाये जो अमरता में विश्वास रखता
हो, तो बस समझ लो कि अब तुम्हारी कोई भी कामना शेष नहीं रह जायेगी; तुम
उसकी सारी की सारी चीज़ें ले सकते हो – अगर तुम चाहो तो जीते-जी उसकी
खाल उतार सकते हो – और वह इसे एकदम खुशी-खुशी उतार लेने देगा।
(अपटन सिंक्लेयर 403) सी.जी.
———o———
खुदाई अत्याचारी
एक अत्याचारी शासक के लिए ज़रूरी है कि वह ज़ाहिरा तौर पर धर्म में
असाधारण आस्था दिखाये। जनता एक ऐसे शासक के दुर्व्यवहार के प्रति कम सचेत
- अंग्रेज़ी में शब्द स्पष्ट नहीं
- टॉमस कैम्पबेल (1777-1844) : स्कॉट कवि के गीत मैन ऑफ़ इंग्लैण्ड की अन्तिम
पंक्तियाँ। नोटबुक के पिछले संस्करणों में त्रुटिवश ‘टी’ को ‘जे’ पढ़ा जाने के कारण इनका
परिचय आइरिश कवि जोज़ेफ़ कैम्पबेल के रूप में दिया गया था। - आर्थर ह्यू क्लो (1819-61) : अंग्रेज़ कवि की कविता पेस्चिएरा की पंक्तियाँ। जिसमें
इटली के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान पेस्चिएरा नामक स्थान पर 1848 में हुई लड़ाई
का वर्णन है।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 581
होती है, जिसे वह ईश्वर से डरने वाला और पवित्र मानती है। दूसरे, वह आसानी
से उसके विरोध में भी नहीं जाती, क्योंकि उसे विश्वास रहता है कि देवता भी
शासक के साथ हैं।¹
पृष्ठ 29 (26)
सैनिक और चिन्तन :
“यदि मेरे सैनिक सोचना शुरू कर दें, तब तो उनमें से कोई भी सेना में नहीं
रहेगा।”
(फ़्रेडरिक महान²) 562
मरे जो सर्वश्रेष्ठ वीर :
मारे गये हैं सर्वश्रेष्ठ वीर। दफ़ना दिये गये वे
चुपचाप, एक निर्जन भूमि में,
कोई आँसू नहीं बहे उन पर
अजनबी हाथों ने उन्हें पहुँचा दिया क़ब्र में,
कोई सलीब नहीं, कोई घेरा नहीं, कोई समाधि-लेख नहीं
जो बता सके उनके गौरवशाली नाम।
घास उग रही है उन पर, एक दुर्बल पत्ती
झुकी हुई, जानती है इस रहस्य को,
बस एकमात्र साक्षी थीं उफनती लहरें,
जो प्रचण्ड आघात करती हैं तट पर,
लेकिन वे प्रचण्ड लहरें भी नहीं ले जा सकतीं
अलविदा के सन्देश
उनके सुदूर घर तक।
(वी.एन. फ़िग्नर)³
कारागार :
“तारे नहीं, देश नहीं, काल नहीं,
ठहराव नहीं, बदलाव नहीं, नेकी नहीं, बदी नहीं,
- अरस्तू, पॉलिटिक्स
- प्रशा का फ़्रेडरिक (1712-1786): प्रबुद्ध निरंकुश शासक के रूप में प्रसिद्ध
- वेरा निकोलायेव्ना फ़िग्नर (1852-1942) रूसी महिला क्रान्तिकारी और शहीद,
ज़ारशाही के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करने वाली प्रथम रूसी महिलाओं में एक
582 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
बल्कि ख़ामोशी, और एक निष्पन्द साँस
जो न जीवन की, न मृत्यु की।
(द प्रिज़नर ऑफ़ चिलोन)¹
पृष्ठ 30 (27)
आरोप-सिद्धि के बाद :
अपनी सज़ा सुन लेने के तुरन्त बाद के क्षणों में सज़ा के लिए अभिशप्त व्यक्ति
का दिमाग़ कई मायनों में उस आदमी के दिमाग़ जैसा हो जाता है जो मौत के कगार
पर झूल रहा होता है। चुपचाप, और मानो अन्तःप्रेरित होकर, अब वह उन सभी
चीज़ों से विरक्त हो जाता है जिन्हें उसे छोड़ जाना है, और वह, दृढ़भाव से, अपने
सामने देखता हुआ, उस सच्चाई के प्रति पूरी तरह सचेत हो जाता है, जो
अपरिहार्यतः घटित होने वाली होती है।
(वी.एन. फ़िग्नर)
क़ैदी :
“घुटन होती है इस नीची, गन्दी छत के नीचे;
निचुड़ती जा रही है मेरी ताक़त साल दर साल;
उत्पीड़ित करते हैं मुझे — यह पथरीला फ़र्श,
यह लौह-ज़ंजीरों से बँधी मेज
यह खाट, यह कुर्सी, बँधी हुई ज़ंजीर से
दीवारों के साथ, ताबूत के पटरों की भाँति,
इस चिरस्थायी, मूक, मुर्दा ख़ामोशी में
खुद को बस एक लाश ही समझा जा सकता है।”
“एन.ए. मोरोज़ोव” ²
- प्रसिद्ध अंग्रेज़ कवि लॉर्ड बायरन (1788-1824) की इस कविता में जेनेवा झील के पास
चिलोन के क़िले में क़ैद एक देशभक्त फ्राँस्वा दि बोनिवार के जेल-जीवन का वर्णन किया
गया है। - निकोलाई अलेक्सान्द्र मोरोज़ोव (1854-1946) : रूसी क्रान्तिकारी, लेखक, कवि और
वैज्ञानिक; 1880 में लन्दन में मार्क्स से मुलाक़ात और मेनिफ़ेस्टो ऑफ़ द कम्युनिस्ट पार्टी के
रूसी में अनुवाद का जिम्मा, 1875 से 1878 तक, तथा 1881 से 1905 तक, क़रीब 25 वर्षों
तक जेल की सज़ा के दौरान, रसायन विज्ञान, भौतिकी, गणित और खगोल विज्ञान पर 28
पुस्तकों के अलावा कविताएँ और कहानियाँ भी लिखीं।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 583
नंगी दीवारें, जेल के ख़यालात,
कितने अँधियारे और उदास हो तुम,
कितना मुश्किल है कि बन्दी हो निष्क्रिय रहना
और देखना सपने आज़ादी के दिनों के।
(मोरोज़ोव)
———o———
تجھے ذبح کرنے کی خوشی اور مجھے مرنے کا شوق
میری بھی مرضی وہی جو میرے صیاد کی ہے۔ 1
पृष्ठ 31 (28)
“हर चीज़ यहाँ है कितनी ख़ामोश, बेजान, फीकी
वर्षों गुज़र जाते हैं यों ही, कुछ पता नहीं चलता,
हफ़्ते और दिन कटते हैं बड़ी मुश्किल से,
देता है सिर्फ़ बोरियत इनका यह सिलसिला।
(मोरोज़ोव)
———o———
लम्बी क़ैद से हमारे ख़्याल हो जाते हैं मनहूस;
भारीपन महसूस होता है हमारी हड्डियों में;
यन्त्रणा की पीड़ा से, लम्हे लगते हैं अन्तहीन
चार डग चौड़ी इस कोठरी में।
———o———
हमें जीना है पूरी तरह अपने हमसफ़र भाइयों के लिए,
हमें देना होगा अपना सर्वस्व उनके लिए,
और उन्हीं की ख़ातिर लड़ना होगा बदनसीबी के ख़िलाफ़!
... ... ...
(मोरोज़ोव)
- मूल में उर्दू में यह शे'र लिखा हुआ है :
तुझे जबह करने की खुशी, मुझे मरने का शौक़,
मेरी भी मर्ज़ी वही है, जो मेरे सैयाद की है।
584 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़